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जंतर-मंतर कूच से पहले दिल्ली-एनसीआर में बड़ा पुलिस ऑपरेशन: यूट्यूबर ध्रुव राठी गुरुग्राम से हिरासत में
फ्लाइट में घुसकर सीजेपी संस्थापक अभिजीत दिपके, सौरभ दास व आशुतोष रांका को पकड़ा

राजधानी दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) में कथित विसंगतियों के खिलाफ प्रस्तावित ‘जंतर-मंतर महा-घेराव’ से पहले शनिवार को कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने एक राष्ट्रव्यापी प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) अभियान चलाया।
दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की औपचारिक अनुमति निरस्त किए जाने और समूचे नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्ववर्ती धारा 144) लागू होने के बावजूद कार्यकर्ताओं के कूच को देखते हुए पुलिस ने 150 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया।
शनिवार सुबह का घटनाक्रम उस समय अत्यंत नाटकीय और तनावपूर्ण हो गया जब कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने दो हाई-प्रोफाइल ऑपरेशन्स को अंजाम दिया। पहला, लोकप्रिय यूट्यूबर और राजनीतिक टिप्पणीकार ध्रुव राठी (Dhruv Rathee) को दिल्ली पुलिस की टीम ने गुरुग्राम पुलिस के सहयोग से उनके गुरुग्राम स्थित आवास से एहतियातन हिरासत में ले लिया।
दूसरा, मुंबई से राष्ट्रीय राजधानी पहुंचे सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके (Abhijeet Dipke), राष्ट्रीय प्रवक्ता सौरभ दास (Saurav Das) और वरिष्ठ नेता आशुतोष रांका (Ashutosh Ranka) को इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGI Airport) पर विमान के भीतर दाखिल होकर यात्रियों के उतरने से पहले ही हिरासत में ले लिया गया।
इसके अलावा, पार्टी की लीगल अफेयर्स हेड रत्ना सिंह को उनके तीन सहयोगी वकीलों के साथ उस समय हिरासत में लिया गया जब वे हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं को कानूनी सहायता देने जा रही थीं। इस सघन पुलिस कार्रवाई के बाद विपक्षी दलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकार और दिल्ली पुलिस पर लोकतांत्रिक अधिकारों, आवागमन की स्वतंत्रता (Freedom of Movement) और असहमति के अधिकार के हनन का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला है।
जैसे ही विमान का इंजन बंद हुआ और ‘सीट बेल्ट’ का साइन हटा, आम यात्रियों के उठने से पहले ही दिल्ली पुलिस की साउथ-वेस्ट जिले की टीम विमान के मुख्य द्वार से भीतर दाखिल हो गई। पुलिस अधिकारियों ने सीधे आगे बढ़कर अभिजीत दिपके, सौरभ दास और आशुतोष रांका की सीटों को घेर लिया और उन्हें तुरंत अपने साथ चलने को कहा।
अभिजीत दिपके ने इस कार्रवाई का कड़ा प्रतिवाद करते हुए अपने मोबाइल से वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू किया। उन्होंने सवाल किया:
“आप एक वाणिज्यिक उड़ान के अंदर किस अधिकार से घुसे हैं? क्या हमारे खिलाफ कोई गैर-जमानती वारंट है? क्या हम आतंकवादी हैं? अगर आपके वरिष्ठ अधिकारियों में हिम्मत है तो वे कैमरे के सामने आएं। अरेस्ट अस! (हमें गिरफ्तार करो!) हम तो गिरफ्तारी देने ही दिल्ली आए हैं। लेकिन पूरी दुनिया देख रही है कि भारत में लोकतंत्र की क्या स्थिति हो गई है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को फ्लाइट से घसीटा जा रहा है। यह तानाशाही नहीं तो और क्या है?”
पुलिस अधिकारियों ने अत्यंत शांति से उत्तर दिया कि दिल्ली में कानून-व्यवस्था की असाधारण स्थिति है और उनके खिलाफ प्रिवेंटिव डिटेंशन के निर्देश हैं। इसके बाद तीनों नेताओं को अन्य यात्रियों से अलग करते हुए आपात निकास/टरमैक सीढ़ियों से नीचे उतारकर पुलिस वैन में बैठाया गया।
गुरुग्राम पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उन्हें दिल्ली पुलिस से औपचारिक इनपुट मिला था कि ध्रुव राठी जंतर-मंतर पर गैर-अनुमति प्राप्त प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे हैं, जिससे वहां हजारों की अनियंत्रित भीड़ जमा हो सकती है। पुलिस ने सुबह उनके घर जाकर उन्हें दिल्ली न जाने की सलाह दी। किंतु जब उन्होंने इस सलाह को मानने से इनकार किया और सोशल मीडिया पर लाइव संदेश जारी किए, तो सार्वजनिक शांति की रक्षा के लिए उन्हें एहतियातन हिरासत में ले लिया गया। ध्रुव राठी की लीगल टीम ने दावा किया कि यह कार्रवाई असहमति की आवाज को दबाने का प्रयास है। किसी भी नागरिक को शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने से पहले ही घर में नजरबंद या हिरासत में लेना संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का उल्लंघन है।
सीजेपी की लीगल अफेयर्स प्रमुख रत्ना सिंह तीन अन्य वकीलों के साथ कानूनी दस्तावेजों की फाइलें लेकर हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए पटियाला हाउस कोर्ट और डिटेंशन सेंटरों की ओर जा रही थीं। पुलिस ने उनकी गाड़ी को अशोका रोड के पास रोक लिया और उन्हें भी हिरासत में ले लिया। रत्ना सिंह ने आरोप लगाया कि वकीलों को उनके मुवक्किलों से मिलने से रोकना न्याय प्रणाली की मूल भावना पर हमला है। छत्रसाल स्टेडियम और त्यागराज स्टेडियम में हिरासत में रखे गए 150 से अधिक प्रदर्शनकारियों ने वहां भी नारेबाजी शुरू कर दी। कार्यकर्ताओं ने हाथों में चप्पलें उठाकर ‘सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो’ और ‘वोट चोरी बंद करो’ के नारे लगाए। पुलिस ने इन सभी परिसरों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हुए थे।
सीजेपी का दावा है कि आयोग द्वारा चलाए गए मतदाता पुनरीक्षण अभियान में लाखों वास्तविक मतदाताओं के नाम काट दिए गए, जबकि नए नामों को जोड़ने में पक्षपात किया गया। पार्टी का कहना है कि जब तक वर्तमान सीईसी अपने पद पर बने रहेंगे, तब तक किसी भी आगामी चुनाव की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए उनका इस्तीफा ही इस गतिरोध का एकमात्र समाधान है।
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि एयरपोर्ट से लेकर सड़कों तक, हर कार्रवाई की उच्च-गुणवत्ता वाली वीडियो रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी गई है। इसमें स्पष्ट दिखता है कि पुलिसकर्मियों ने किसी भी प्रदर्शनकारी पर लाठीचार्ज नहीं किया और अत्यधिक संयम बरतते हुए केवल कानून के तहत उन्हें हिरासत में लिया।
कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने पुलिस कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की। विपक्ष ने कहा कि एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने के लिए हवाई जहाज के अंदर पुलिस भेजना और पत्रकारों व यूट्यूबरों को घर से उठाना दर्शाता है कि सरकार असहमति से कितनी डरी हुई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि राजधानी के अति-संवेदनशील राजनयिक और प्रशासनिक क्षेत्र (Lutyens’ Delhi) की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। किसी भी संगठन को कानून हाथ में लेने या संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज को पंगु बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली की धरती पर जो कुछ घटा, वह केवल 150 लोगों की हिरासत या कुछ लोकप्रिय चेहरों की गिरफ्तारी की कहानी नहीं है। यह 21वीं सदी के भारतीय लोकतंत्र के उस नाजुक मोड़ को रेखांकित करता है जहां संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठते सवाल और कानून-व्यवस्था के नाम पर की जाने वाली राज्य की सख्त कार्रवाइयां आमने-सामने आ खड़ी हुई हैं।
हवाई जहाज के केबिन से लेकर संसद मार्ग के नुकीले बैरिकेड्स तक, इस पूरे घटनाक्रम ने यह सिद्ध कर दिया है कि कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन अब एक व्यापक राजनीतिक विमर्श का रूप ले चुका है। जहां पुलिस और प्रशासन अपनी कार्रवाई को शांति और व्यवस्था की बहाली के लिए अनिवार्य बता रहे हैं, वहीं नागरिक समाज और विपक्षी दल इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार मान रहे हैं। 11 अक्टूबर को प्रस्तावित अगले प्रदर्शन और सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर सीजेपी के अड़े रहने के रुख ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि आने वाले दिनों में यह कानूनी और राजनीतिक संग्राम और अधिक तीखा होने वाला है।



