
पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर देने वाले और वैवाहिक विश्वासघात की पराकाष्ठा बने बहुचर्चित ‘ब्लू ड्रम मर्डर केस’ (Blue Drum Murder Case) में मेरठ की जिला एवं सत्र अदालत ने बुधवार को एक ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है।अदालत ने पूर्व मर्चेंट नेवी अधिकारी सौरभ राजपूत (Saurabh Rajput) की नृशंस हत्या, उनके शव के टुकड़े करने और साक्ष्य छिपाने के उद्देश्य से शव को नीले ड्रम में सीमेंट से सील करने के जुर्म में मृतक की पत्नी मुस्कान रस्तोगी (Muskan Rastogi) और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला (Sahil Shukla) को मृत्युदंड (Death Penalty – फांसी की सजा) की सजा सुनाई है।
जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा (District Judge Arvind Kumar Mishra) ने इस जघन्य हत्याकांड को कानून की नजर में ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) श्रेणी का अपराध करार दिया। अदालत ने फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि जिस ठंडे दिमाग, योजनाबद्ध क्रूरता और अमानवीय तरीके से एक पति की हत्या कर उसके शव को सीमेंट के ब्लॉक में तब्दील करने का प्रयास किया गया, वह सभ्य समाज में किसी भी प्रकार की दया या नरमी के सर्वथा अयोग्य है।
मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को 30 सितंबर 2026 को ही अदालत द्वारा हत्या (भारतीय दंड संहिता/BNS की धारा 302/103(1)) और साक्ष्य नष्ट करने (धारा 201/238A) का दोषी ठहराया जा चुका था। बुधवार को सजा पर अंतिम बहस के बाद अदालत ने दोनों दोषियों को फांसी की सजा के साथ-साथ आर्थिक दंड भी लगाया। अदालत ने दोनों पर धारा 302 के तहत ₹50,000 और धारा 238A के तहत ₹20,000 का जुर्माना ठोका है। सुरक्षा कारणों के चलते दोनों दोषियों को मेरठ की चौधरी चरण सिंह जिला जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए अदालत में पेश किया गया था, जहां मौत की सजा सुनते ही दोनों सन्न रह गए और फूट-फूटकर रोने लगे।
सौरभ राजपूत मर्चेंट नेवी में कार्यरत थे और उन्होंने मुस्कान रस्तोगी से प्रेम विवाह किया था। दंपती की एक बेटी भी थी। सौरभ अपनी नौकरी के सिलसिले में अक्सर महीनों तक समुद्र में जहाजों पर रहते थे। इसी दौरान मुस्कान की नजदीकी साहिल शुक्ला से हुई और दोनों के बीच अवैध संबंध स्थापित हो गए। जब सौरभ ने नौकरी छोड़कर घर पर रहने और अपना व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लिया, तो मुस्कान और साहिल को लगा कि सौरभ उनके संबंधों के बीच सबसे बड़ा अवरोध बन चुका है।
3 मार्च 2025 की रात, योजना के मुताबिक मुस्कान ने सौरभ के रात के भोजन में भारी मात्रा में नशीली गोलियां (Sedatives) मिला दीं।सौरभ जैसे ही गहरी बेहोशी में चला गया, मुस्कान ने अपने प्रेमी साहिल शुक्ला को घर के अंदर बुला लिया। दोनों ने मिलकर पहले धारदार हथियार से सौरभ का गला रेता और यह सुनिश्चित किया कि उसकी मौत हो चुकी है।
हत्या के बाद सबसे बड़ी चुनौती 6 फीट लंबे सौरभ के शव को ठिकाने लगाने की थी। दोनों ने शव को टुकड़ों में काटने का फैसला किया। सौरभ के हाथ, पैर और धड़ को अलग-अलग टुकड़ों में काटा गया। इसके बाद उन्होंने पहले से खरीदकर रखे गए एक बड़े नीले प्लास्टिक ड्रम में शव के इन टुकड़ों को एक के ऊपर एक ठूंस दिया। दुर्गंध को बाहर आने से रोकने और शव को पूरी तरह छुपाने के लिए साहिल ने सीमेंट की बोरियों से कंक्रीट और पानी का घोल तैयार किया और पूरे ड्रम को ऊपर तक भर दिया ताकि वह सूखकर पत्थर बन जाए।
बचाव पक्ष के वकीलों ने मुख्य रूप से यह दलील दी थी कि इस हत्याकांड का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह (Eye-witness) नहीं है और पूरा मामला केवल पुलिस की बनाई गई परिस्थितियों पर आधारित है। किंतु वरिष्ठ सरकारी अधिवक्ता और विशेष लोक अभियोजक ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘शरद बिरधीचंद सारदा’ मामले के सिद्धांतों का हवाला देते हुए परिस्थितियों की ऐसी अटूट शृंखला पेश की जिसमें किसी तीसरे व्यक्ति के अपराध करने की रत्ती भर भी संभावना नहीं बची थी सौरभ को अंतिम बार अपनी पत्नी मुस्कान के साथ जीवित देखा गया था। प्लास्टिक ड्रम और सीमेंट बेचने वाले दुकानदार ने अदालत में खड़े होकर साहिल शुक्ला की शिनाख्त की। हत्या में प्रयुक्त हथियार पर मिले खून के धब्बे और ड्रम के भीतर मिले अवशेषों की डीएनए प्रोफाइलिंग ने अपराध को 100% वैज्ञानिक रूप से पुष्ट कर दिया।
बचाव पक्ष ने सजा पर बहस के दौरान अदालत से रहम की गुहार लगाई थी। वकीलों ने दलील दी कि मुस्कान रस्तोगी एक महिला है और जेल में रहने के दौरान उसने नवंबर 2025 में एक बच्ची को जन्म दिया था (जिसका नाम उसने राधा रखा), जबकि उसकी एक 8 वर्षीय बेटी पहले से है।
जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने अपने विस्तृत आदेश में कहा:
“यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक व्यवस्था और विश्वास की नींव पर प्रहार है जिस पर हमारा समाज टिका है। एक पत्नी द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही पति को धोखे से नशा देना, फिर उसका गला काटना और साक्ष्य मिटाने के लिए उसके शव के टुकड़े कर सीमेंट के ड्रम में जमा देना यह क्रूरता की ऐसी पराकाष्ठा है जो किसी भी सभ्य समाज की कल्पना से परे है।
यदि ऐसे मामलों में नरमी बरती गई, तो न्याय व्यवस्था से आम जनता का विश्वास उठ जाएगा।
दोषियों के पास छोटी बेटियां होना या उनका युवा होना इस जघन्य कृत्य की गंभीरता को कम नहीं कर सकता।
यह मामला ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। अतः दोनों दोषियों को मृत्युदंड (फांसी) के अलावा अन्य कोई सजा न्यायोचित नहीं हो सकती।”
बुधवार दोपहर जैसे ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग स्क्रीन पर जज साहब ने फैसला पढ़ा, अदालत कक्ष और जेल दोनों जगह का माहौल पूरी तरह बदल गया जेल सूत्रों के मुताबिक, मुस्कान रस्तोगी फैसले से पहले बेहद बेचैन थी। उसने सुबह जेल अधिकारियों से अपनी नवजात बच्ची और बड़ी बेटी के बारे में पूछा था। जैसे ही जज ने ‘हैंडेड डाउन डेथ पेनल्टी’ (फांसी की सजा) का ऐलान किया, मुस्कान स्क्रीन के सामने ही बैठ गई और फफक-फफक कर रोने लगी। वहीं साहिल शुक्ला पूरी तरह स्तब्ध और पथराया हुआ खड़ा रहा। अधिवक्ताओं के अनुसार, मौत की सजा सुनते ही दोनों गहरे सदमे (State of Shock) में चले गए। अदालत परिसर में मौजूद सौरभ राजपूत की वृद्ध मां और भाई फैसला सुनकर रो पड़े।
हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखते हुए मां ने कहा:
“आज मेरे बेटे की आत्मा को शांति मिली है। 19 महीनों तक हमने जो नरक झेला है, वह हम ही जानते हैं। उस डायन ने मेरे हंसते-खेलते बेटे को टुकड़ों में काटकर सीमेंट में चुनवा दिया था। आज कानून ने यह साबित कर दिया कि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। हम अदालत के इस फैसले को नमन करते हैं।”
कानून के अनुसार, सत्र अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा पर अमल से पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा ‘डेथ रेफरेंस’ (Death Reference) की पुष्टि होना आवश्यक है। दोषियों के वकीलों ने संकेत दिया है कि वे इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील करेंगे। हालांकि, जिस प्रकार के वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य पुलिस ने जुटाए हैं, उसे देखते हुए विधिक जानकारों का मानना है कि ऊपरी अदालत में भी दोषियों के लिए राहत पाना अत्यंत कठिन होगा।
मेरठ का ‘ब्लू ड्रम मर्डर केस’ केवल एक अपराध कथा नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज में मानवीय मूल्यों, रिश्तों की मर्यादा और नैतिक पतन की एक डरावनी चेतावनी है। जिस रिश्ते को समाज में जीवनभर का साथ माना जाता है, उसी रिश्ते की आड़ में रची गई इस खौफनाक साजिश का अंत अदालत के इस कड़े फैसले से हुआ है।
126 सुनवाइयों और 13 महीने के गहन विचार-विमर्श के बाद जिला अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अपराध कितना भी शातिराना क्यों न हो, और साक्ष्यों को सीमेंट के चाहे जितने भारी ब्लॉक में क्यों न दबा दिया जाए, कानून के हाथ आखिरकार मुजरिम के गिरेबान तक पहुंच ही जाते हैं।
सौरभ राजपूत को न्याय मिल चुका है, और मुस्कान रस्तोगी व साहिल शुक्ला को मिली फांसी की सजा यह कड़ा संदेश देती है कि जब कोई व्यक्ति क्रूरता की सारी मानवीय सीमाएं लांघ जाता है, तो कानून की किताब में उसके लिए केवल और केवल मृत्युदंड ही शेष बचता है।



