भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था: मुनाफे की दौड़ में पिसता आम आदमी
जेब पर भारी पड़ता इलाज

आज के समय में अगर किसी मध्यमवर्गीय परिवार से पूछा जाए कि उन्हें सबसे ज्यादा डर किस बात से लगता है, तो जवाब होगा “घर में कोई बड़ी बीमारी न आ जाए।” यह डर बेवजह नहीं है। भारत में आज स्वास्थ्य सेवा एक सेवा कम और एक बड़ा ‘बाजार’ ज्यादा बन गई है। सवाल यह है कि सरकारी अस्पतालों और बड़े-बड़े आलीशान निजी अस्पतालों के बीच चल रही इस जंग में आखिर जीत किसकी हो रही है? और इस दौड़ में आम आदमी कहाँ खड़ा है?
भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को देखें तो यहाँ दो अलग-अलग दुनिया दिखाई देती हैं। एक तरफ वे चमचमाते ‘कॉर्पोरेट’ अस्पताल हैं जो किसी पाँच सितारा होटल जैसे लगते हैं। यहाँ दुनिया की बेहतरीन मशीनें हैं, एयरकंडीशन कमरे हैं और तुरंत इलाज मिलता है। लेकिन यहाँ कदम रखते ही मीटर चालू हो जाता है, जो चंद दिनों में ही एक आम परिवार की बरसों की जमा-पूंजी को खत्म कर सकता है।
दूसरी तरफ हमारे सरकारी अस्पताल हैं। यहाँ इलाज मुफ्त या बहुत सस्ता है, लेकिन यहाँ की हकीकत लंबी कतारें, टूटी हुई मशीनें और बेड की कमी है। एक गरीब आदमी सुबह चार बजे लाइन में लगता है ताकि शायद दोपहर तक उसे डॉक्टर का चेहरा देखने को मिल जाए। यह अंतर बताता है कि हमारे देश में इलाज अब इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आप कितने बीमार हैं, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि आपकी जेब में कितना पैसा है।
भारत में स्वास्थ्य सेवा की सबसे दुखद बात यह है कि यहाँ इलाज का ज्यादातर खर्च लोगों को खुद उठाना पड़ता है। इसे तकनीकी भाषा में ‘आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर’ कहते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में इलाज के कुल खर्च का लगभग 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा आम आदमी अपनी बचत से देता है।
विकसित देशों में सरकारें अपने नागरिकों के स्वास्थ्य का जिम्मा उठाती हैं, लेकिन भारत में एक गंभीर बीमारी किसी हंसते-खेलते परिवार को गरीबी की रेखा के नीचे धकेल देती है। कई बार तो लोग इलाज के लिए अपना घर, ज़मीन या गहने तक बेच देते हैं। यह कैसी तरक्की है जहाँ इंसान को अपनी जान बचाने के लिए अपना भविष्य दांव पर लगाना पड़े?
निजी अस्पतालों का बढ़ता जाल एक तरह से सरकारी तंत्र की विफलता का नतीजा है। चूँकि सरकारी अस्पतालों में भीड़ और अव्यवस्था है, इसलिए लोग मजबूरी में निजी अस्पतालों की ओर भागते हैं। लेकिन यहाँ ‘मुनाफा’ सबसे ऊपर है। अक्सर खबरें आती हैं कि मरीज़ को वेंटिलेटर पर तब तक रखा गया जब तक बिल लाखों में नहीं पहुँच गया, या छोटी सी बीमारी के लिए भी हज़ारों के टेस्ट लिख दिए गए। जब अस्पताल का मकसद सेवा के बजाय शेयरधारकों को मुनाफा देना हो, तो डॉक्टर ‘मसीहा’ कम और ‘सेल्समैन’ ज्यादा लगने लगते हैं। दवाओं की बढ़ती कीमतें और गैर-ज़रूरी सर्जरी इस मुनाफे की मशीन के पहिये हैं।
सरकार की ओर से ‘आयुष्मान भारत’ जैसी योजनाएं ज़रूर शुरू की गई हैं, जो एक अच्छी पहल है। लेकिन केवल बीमा कार्ड बाँट देने से समस्या हल नहीं होगी। असली समस्या बुनियादी ढांचे की है। गाँवों में आज भी स्वास्थ्य केंद्रों पर ताले लटके रहते हैं या वहाँ डॉक्टर नहीं होते।
हमारी सरकारें अपनी जीडीपी (GDP) का बहुत छोटा हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करती हैं। जब तक सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की संख्या, आधुनिक मशीनें और मुफ्त दवाएं नहीं बढ़ेंगी, तब तक आम आदमी निजी अस्पतालों की मनमानी का शिकार होता रहेगा। नीतियों में सबसे बड़ी कमी यह है कि हमने स्वास्थ्य को एक बुनियादी अधिकार के तौर पर नहीं, बल्कि एक सुविधा के तौर पर देखा है।
अगर हम चाहते हैं कि भारत का हर नागरिक स्वस्थ रहे, तो हमें कुछ कड़े कदम उठाने होंगे सरकार को स्वास्थ्य पर अपना खर्च दोगुना करना होगा। निजी अस्पतालों के चार्ज और इलाज के तरीकों के लिए एक सख्त कानून होना चाहिए ताकि वे मरीज़ों की मजबूरी का फायदा न उठा सकें। शहरों के बजाय ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुँचाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देना चाहिए ताकि गरीब से गरीब व्यक्ति भी दवा खरीद सके।
फिलहाल तो ऐसा लगता है कि भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में ‘मुनाफा’ जीत रहा है और ‘मानवता’ हार रही है। बड़े अस्पतालों की ऊँची इमारतें देश की शान तो हो सकती हैं, लेकिन वे देश की सेहत का सही पैमाना नहीं हैं। सही जीत तब होगी जब एक गरीब मज़दूर को भी वही सम्मान और वही इलाज मिले जो एक अमीर आदमी को मिलता है। स्वास्थ्य कोई व्यापार नहीं है, यह एक अधिकार है, और इसे अधिकार ही रहना चाहिए।



