
जब भी हम ‘अवैध प्रवासन’ की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में अक्सर सरहदों पर तैनात जवान और कटीली बाड़ की तस्वीरें आती हैं। लेकिन इस समस्या का एक दूसरा चेहरा भी है, जो हमारे शहरों की गलियों, निर्माण स्थलों और खेतों में काम करता दिखाई देता है। यह समस्या सिर्फ ‘लोग आ रहे हैं’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाती है कि हमारे संसाधनों पर किसका हक है, हमारी सुरक्षा कितनी मजबूत है और हमारा विकास मॉडल कितना समावेशी है।
अवैध प्रवासियों को अक्सर ‘अदृश्य श्रमिक’ कहा जाता है क्योंकि वे बिना किसी कानूनी दस्तावेज के देश की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं। वे वहां काम करते हैं जहां स्थानीय लोग कम मजदूरी के कारण काम नहीं करना चाहते।
अर्थशास्त्र का एक सीधा नियम है मांग और आपूर्ति। जब अवैध प्रवासियों की संख्या बढ़ती है, तो बाजार में ‘सस्ते श्रम’ की बाढ़ आ जाती है। अवैध प्रवासी न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर काम करने को तैयार हो जाते हैं क्योंकि उनके पास कोई कानूनी सुरक्षा नहीं होती। इसका सीधा असर हमारे अपने देश के गरीब और अकुशल मजदूरों (Unskilled Labourers) पर पड़ता है। उनकी सौदेबाजी करने की शक्ति खत्म हो जाती है और उन्हें भी कम मजदूरी पर काम करने को मजबूर होना पड़ता है। बड़े ठेकेदारों और उद्योगों के लिए यह फायदेमंद हो सकता है, लेकिन एक राष्ट्र के तौर पर यह हमारे अपने नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालता है।
भारत जैसे देश में, जहां सरकार अपनी बड़ी आबादी के लिए मुफ्त राशन, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा प्रदान करती है, वहां अनियंत्रित प्रवासन इन संसाधनों पर भारी दबाव डालता है। जब जनसंख्या का डेटा (Data) गलत होता है क्योंकि प्रवासी रजिस्टर्ड नहीं होते, तो सरकारी योजनाएं विफल होने लगती हैं। अस्पतालों में लंबी लाइनें और स्कूलों में सीटों की कमी का एक बड़ा कारण अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि भी है।
प्रवासन केवल एक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक संकेत है कि विकास समान रूप से नहीं हो रहा है। लोग अपना घर छोड़कर किसी दूसरे देश या शहर तभी जाते हैं जब उनके अपने क्षेत्र में ‘उम्मीद’ खत्म हो जाती है। सीमा के दोनों तरफ अगर गरीबी का स्तर एक जैसा होगा, तो प्रवासन की लहर को रोकना नामुमकिन होगा।
प्रवासी अक्सर शहरों के उन इलाकों में बसते हैं जो पहले से ही भीड़भाड़ वाले हैं। इससे गंदी बस्तियों (Slums) का विस्तार होता है, बिजली-पानी की चोरी बढ़ती है और शहरी प्रशासन पूरी तरह चरमरा जाता है। यह दर्शाता है कि हमने अपने ग्रामीण इलाकों को इतना सक्षम नहीं बनाया कि लोग वहीं रुककर आजीविका कमा सकें।
भारत की सीमाएं भौगोलिक रूप से बहुत जटिल हैं। कहीं नदियां हैं, कहीं घने जंगल और कहीं दलदल। ऐसी स्थिति में ‘अभेद्य दीवार’ बनाना तकनीकी रूप से कठिन है। भारत-बांग्लादेश की सीमा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कई जगहों पर लोगों के खेत भारत में हैं और घर दूसरी तरफ। यह ‘ह्यूमन रियलिटी’ सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। अवैध प्रवासन को केवल पुलिसिया कार्रवाई से नहीं रोका जा सकता। इसके लिए पड़ोसी देशों के साथ मजबूत कूटनीतिक संबंधों और आर्थिक सहयोग की जरूरत है ताकि लोग पलायन के लिए मजबूर ही न हों।
अवैध प्रवासन का सबसे गंभीर पहलू राष्ट्रीय सुरक्षा है। सुरक्षा को ‘सेलेक्टिव’ (Selective) नहीं बनाया जा सकता कि हम कुछ को आने दें और कुछ को रोकें। जब लोग बिना किसी पहचान पत्र के देश में घुसते हैं, तो उनके साथ असामाजिक तत्व, तस्कर और आतंकी समूहों के स्लीपर सेल भी प्रवेश कर सकते हैं। बिना रिकॉर्ड के रहने वाले लोग कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन जाते हैं। सीमावर्ती राज्यों में जनसंख्या के अनुपात में बदलाव आने से स्थानीय संस्कृति और भाषा पर खतरा मंडराने लगता है। इससे अक्सर सांप्रदायिक और सामाजिक तनाव पैदा होता है, जैसा हमने असम और उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों में देखा है।
अवैध प्रवासन की समस्या को खत्म करने के लिए हमें भावुकता से हटकर व्यावहारिक (Practical) कदम उठाने होंगे हमें ऐसी सीमाओं की जरूरत है जहां कैमरे, थर्मल सेंसर और ड्रोन के जरिए 24 घंटे निगरानी हो सके। मानवीय चूक को तकनीक से ही कम किया जा सकता है। देश के हर नागरिक का एक स्पष्ट डिजिटल रिकॉर्ड होना चाहिए। जब तक हमारी ‘पहचान प्रणाली’ (Identity System) मजबूत नहीं होगी, तब तक बाहर से आए लोगों को पहचानना मुश्किल रहेगा।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि प्रवासियों को ‘सीमित समय का वर्क परमिट’ दिया जाना चाहिए ताकि वे काम करके वापस चले जाएं और उन्हें नागरिकता या वोट देने का अधिकार न मिले। इससे सुरक्षा का रिकॉर्ड भी रहेगा और श्रम की जरूरत भी पूरी होगी। जब तक हमारे पड़ोसी देशों में भुखमरी और अस्थिरता रहेगी, भारत में घुसपैठ जारी रहेगी। एक क्षेत्रीय शक्ति होने के नाते, भारत को पड़ोसियों के आर्थिक स्थिरीकरण में मदद करनी चाहिए।
अवैध प्रवासन की समस्या कोई ऐसी गांठ नहीं है जिसे एक झटके में खोला जा सके। इसके लिए हमें ‘सख्त नीति’ और ‘मानवीय समझ’ के बीच एक पुल बनाना होगा। हमें अपने नागरिकों के हकों की रक्षा भी करनी है और एक सुरक्षित राष्ट्र का निर्माण भी करना है। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल बाड़ लगाने से नहीं आती, बल्कि वह तब आती है जब देश की कानून व्यवस्था इतनी पारदर्शी हो कि कोई भी व्यक्ति ‘अदृश्य’ रहकर तंत्र का दुरुपयोग न कर सके।



