
दिसंबर और जनवरी की सर्दियाँ उत्तर भारत के लिए सिर्फ कड़ाके की ठंड नहीं, बल्कि एक डरावनी धुंध लेकर आती हैं। सुबह जब हम अपनी खिड़की से बाहर देखते हैं, तो सब कुछ एक सफेद मखमली चादर में लिपटा हुआ बहुत खूबसूरत लगता है। लेकिन यह ‘सफेद चादर’ उन लाखों यात्रियों के लिए एक बुरे सपने जैसी है जो रेलवे स्टेशनों पर रातें काट रहे हैं, उन हजारों लोगों के लिए है जिनकी उड़ानें आखिरी वक्त पर रद्द हो गई हैं, और उन करोड़ों लोगों के लिए है जो सड़कों पर अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हैं।
हर साल कोहरा आता है, और हर साल हमारा परिवहन तंत्र ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। सवाल यह है कि जब कोहरा एक ‘पूर्वानुमानित’ प्राकृतिक घटना है, जिसका हमें महीनों पहले से पता होता है, तो हमारी तैयारी हमेशा ‘जीरो’ क्यों रहती है?
मौसम विभाग अक्सर भारी कोहरे के लिए ‘ऑरेंज’ या ‘रेड’ अलर्ट जारी करता है। लेकिन समस्या यह है कि यह अलर्ट तब आता है जब अराजकता शुरू हो चुकी होती है। प्रशासन की आदत ‘प्रतिक्रिया’ देने की है, ‘योजना’ बनाने की नहीं। जब कोहरा गहराता है और एक्सीडेंट होने लगते हैं, तब जाकर एडवाइजरी जारी की जाती है। क्या यह संभव नहीं है कि नवंबर में ही कोहरे से निपटने का एक मुकम्मल ‘विंटर एक्शन प्लान’ तैयार हो और उस पर काम शुरू हो जाए?
हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को अक्सर अंतिम समय में सूचना दी जाती है। एक यात्री जो दो घंटे की यात्रा करके एयरपोर्ट पहुँचता है, उसे वहां जाकर पता चलता है कि उसकी फ्लाइट रद्द है। डिजिटल इंडिया के युग में क्या यह मुमकिन नहीं कि सटीक जानकारी घंटों पहले यात्री के मोबाइल पर हो?
कोहरा कोई भूकंप या सुनामी नहीं है जो अचानक आ जाए। यह हर साल इसी वक्त आता है। फिर भी, हमारा सिस्टम इसे एक ‘अत्याचार’ की तरह देखता है। कोहरे से निपटने के लिए हमारे पास कोई दीर्घकालिक नीति नहीं है। हम हर साल ‘जुगाड़’ से काम चलाते हैं। सड़कों पर रिफ्लेक्टर लगाना, पेंट करना या लाइटों को ठीक करना ये काम साल भर क्यों नहीं होते?
भारतीय रेलवे और एयरलाइंस ने तकनीक में सुधार तो किया है, लेकिन वह अभी भी ऊँट के मुँह में जीरा के समान है। जब तक हम आधुनिक सिग्नलिंग और लैंडिंग सिस्टम में बड़े पैमाने पर निवेश नहीं करेंगे, प्रकृति हमें ऐसे ही थकाती रहेगी।
कोहरा हमारे आधुनिक होने के दावों की पोल खोल देता है। दिल्ली एयरपोर्ट दुनिया के व्यस्ततम हवाई अड्डों में से एक है, और यहाँ CAT-III (लो विजिबिलिटी लैंडिंग सिस्टम) मौजूद है। इसके बावजूद, हर साल सैकड़ों उड़ानें रद्द होती हैं। इसका कारण यह है कि या तो रनवे का रखरखाव चल रहा होता है, या पायलट इस सिस्टम के लिए प्रशिक्षित नहीं होते। क्या यह प्रबंधन की विफलता नहीं है?
रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन कोहरे में यह जीवनरेखा ‘सुस्त’ हो जाती है। ‘फॉग पास’ (Fog Pass) डिवाइस के दावों के बावजूद, ट्रेनें 10-10 घंटे की देरी से चलती हैं। यात्रियों के लिए स्टेशनों पर बुनियादी सुविधाओं की कमी इस समस्या को और भी कष्टदायक बना देती है।
कोहरे का असर केवल आंकड़ों और रद्दीकरण (Cancellations) पर नहीं पड़ता, बल्कि इंसानी जानों पर पड़ता है। कोहरे के कारण एक्सप्रेस-वे पर गाड़ियों के आपस में टकराने की खबरें अब आम हो गई हैं। हर साल कोहरे के कारण होने वाले सड़क हादसों में सैकड़ों लोग अपनी जान गँवाते हैं। क्या उन मौतों का ज़िम्मेदार सिर्फ ‘कोहरा’ है या वे खराब सड़कें और कमज़ोर कानून भी हैं? उड़ानों और ट्रेनों की देरी से व्यापारिक बैठकों से लेकर मेडिकल इमरजेंसी तक प्रभावित होती हैं। करोड़ों रुपयों का आर्थिक नुकसान इस धुंध के पीछे छिपा होता है।
दिल्ली-एनसीआर में समस्या केवल कोहरा नहीं है, बल्कि ‘स्मॉग’ (Smog) है। कोहरा जब प्रदूषण के कणों के साथ मिलता है, तो वह और भी घना और ज़हरीला हो जाता है। यह ज़हरीली धुंध न केवल सड़क पर दिखाई देना बंद कर देती है, बल्कि फेफड़ों को भी नुकसान पहुँचाती है। प्रदूषण कम करने में हमारी नाकामी ने कोहरे की समस्या को और भी विकराल बना दिया है।
कोहरे को हम रोक नहीं सकते, लेकिन उसके प्रभाव को ज़रूर कम कर सकते हैं। रेलवे को ‘कवच’ और आधुनिक ‘फॉग सेंसिंग’ तकनीक को हर ट्रेन में अनिवार्य करना चाहिए। हाईवे पर ‘फॉग लाइट्स’ और ‘स्मार्ट डिस्प्ले बोर्ड’ होने चाहिए जो ड्राइवरों को रीयल-टाइम जानकारी दे सकें। एयरलाइनों को मजबूर किया जाना चाहिए कि वे केवल ‘CAT-III प्रशिक्षित’ पायलटों को ही सर्दियों के दौरान तैनात करें। एक ऐसा एकीकृत ऐप होना चाहिए जो सड़क, रेल और हवाई यात्रा की पल-पल की जानकारी एक ही जगह दे सके।
सर्दियों का कोहरा हमें हर साल याद दिलाता है कि हमारा विकास अभी भी कितना कच्चा है। हम मंगल ग्रह पर पहुँचने की बात करते हैं, लेकिन ज़मीन पर जमी धुंध हमें हफ्तों तक पंगु बना देती है। तैयारी ‘ज़ीरो’ इसलिए रहती है क्योंकि हम समस्याओं के आने का इंतज़ार करते हैं। हमें ‘रिएक्टिव’ (Reactive) होने के बजाय ‘प्रोएक्टिव’ (Proactive) होना होगा। कोहरा तो चला जाएगा, लेकिन वह जो सवाल पीछे छोड़ जाता है, उनके जवाब हमें अगली सर्दियों के आने से पहले ढूँढने होंगे।



