पीएम मोदी की यात्रा से भारत-स्वीडन संबंधों को मिली नई दिशा, तय लक्ष्यों को धरातल पर उतारना जारी राजदूत अनुराग भूषण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वीडन के गोटेनबर्ग यात्रा के बाद भारत और स्वीडन के बीच रणनीतिक साझेदारी को लागू करने का काम अब पूरी गति से आगे बढ़ रहा है। यह बात भारतीय राजदूत अनुराग भूषण ने आईएएनएस से बात करते हुए बताई। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी का स्वीडन के गोटेनबर्ग का दौरा एक ऐतिहासिक यात्रा थी।
राजदूत अनुराग भूषण ने आईएएनएस को बताया कि दोनों देशों के बीच 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को दोगुना करने का लक्ष्य है। दोनों देश तय किए गए लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। हमारी कोशिश है कि इन लक्ष्यों को कागज से आगे बढ़कर धरातल पर उतारा जाए। प्रधानमंत्री मोदी की स्वीडन के गोटेनबर्ग की ऐतिहासिक यात्रा के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच गर्मजोशी और दोस्ताना माहौल तो हम सबने देखा ही है। इस दौरान कई महत्वपूर्ण और ठोस नतीजे भी सामने आए। इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत और स्वीडन के रिश्तों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया जाना था।
राजदूत अनुराग भूषण ने कहा, “रणनीतिक साझेदारी का मतलब क्या है? दोनों प्रधानमंत्रियों ने एक संयुक्त बयान भी जारी किया था। अगर उस बयान को देखें, तो साफ पता चलता है कि किन-किन क्षेत्रों में दोनों देश अपने सहयोग को आगे बढ़ाना चाहते हैं। सबसे पहला क्षेत्र है रणनीतिक सहयोग, जिसमें स्थिरता, सुरक्षा, रक्षा और राजनीतिक संवाद जैसे मुद्दे शामिल हैं। दूसरा क्षेत्र है आर्थिक साझेदारी। दोनों प्रधानमंत्रियों ने कहा कि आने वाले समय में आर्थिक संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाया जाना चाहिए। इसके अलावा तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है, नई और उभरती तकनीकें तथा भरोसेमंद कनेक्टिविटी। आज के दौर में तकनीक भू-राजनीति का एक बेहद अहम हिस्सा बन चुकी है। तकनीक अब देशों की प्रगति और आपसी संबंधों को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारक बन गई है। चौथा क्षेत्र है लोगों के बीच आपसी संपर्क। इन चार क्षेत्रों में दोनों देश आगे बढ़कर काम करना चाहते हैं।”
उन्होंने कहा कि तकनीक इस कार्य योजना के चार स्तंभों में से एक है। अगर आप ध्यान दें, तो उभरती हुई तकनीकें खासकर आईटी और एआई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही चर्चाओं का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं। स्वीडन और भारत के बीच भी यही स्थिति है। स्वीडन एआई के क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति है। अगर आप नई पीढ़ी के ‘यूनिकॉर्न’ को देखें, तो भारत और स्वीडन दोनों ही देशों से कई यूनिकॉर्न सामने आए हैं। इसलिए, मुझे लगता है कि दोनों देशों के बीच काफी समानताएं हैं। स्वीडन की आबादी एक करोड़ है, इसलिए वहां की कई कंपनियां भारत को एक बड़े बाजार के रूप में और भविष्य के विकास के लिए एक अहम जगह के तौर पर देखेंगी।
इसलिए, मुझे उम्मीद है कि एसआईटीएससी (स्वीडन-भारत तकनीकी सहयोग) के तहत काफी काम होने वाला है।नक्शे देखें उन्होंने कहा, “इसके अलावा दोनों प्रधानमंत्रियों ने एक स्पष्ट लक्ष्य भी तय किया। लक्ष्य यह है कि 2030 तक भारत और स्वीडन के बीच द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को दोगुना किया जाए। यात्रा के बाद से हमारी कोशिश रही है कि इन लक्ष्यों को सिर्फ कागज तक सीमित न रखा जाए, बल्कि जमीन पर उतारा जाए। दोनों प्रधानमंत्रियों ने अगले पांच वर्षों के लिए एक एक्शन प्लान भी अपनाया। इस एक्शन प्लान में यह रोडमैप दिया गया है कि संयुक्त बयान में तय किए गए लक्ष्यों और उद्देश्यों को कैसे लागू किया जाएगा। यानी यह योजना बताती है कि दोनों देशों की साझा सोच को व्यवहारिक रूप में कैसे बदला जाएगा।”
उन्होंने कहा, “अगर अब तक की प्रगति देखें, तो काफी कुछ हासिल किया जा चुका है। हरियाणा के मुख्यमंत्री का दौरा हुआ, उसके बाद रक्षा उत्पादन सचिव और फिर संचार सचिव ने भी दौरे किए। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) और अन्य संगठनों की ओर से कई व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल स्वीडन गए हैं। राज्य स्तर पर भी कई यात्राएं हुई हैं। आंध्र प्रदेश और गोवा इससे जुड़े कदम उठा चुके हैं, जबकि गुजरात की भागीदारी भी जल्द होने वाली है। कुल मिलाकर, भारत और स्वीडन के बीच रणनीतिक साझेदारी को लागू करने का काम अब पूरी गति से आगे बढ़ रहा है और दोनों देश तय किए गए लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।



