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केंद्र की नई एथेनॉल खरीद नीति से महाराष्ट्र का शुगर उद्योग चिंतित; 40,000 करोड़ रुपए के निवेश पर संकट

देश में चीनी उत्पादन को पर्याप्त स्तर पर बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में लिए गए नीति फैसले ने महाराष्ट्र के चीनी कारखानों और एथेनॉल उत्पादन इकाइयों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। उद्योग जगत का कहना है कि नई खरीद नीति से राज्य में एथेनॉल क्षेत्र में किए गए लगभग 40,000 करोड़ रुपए के निवेश पर संकट मंडराने लगा है।

16 अक्टूबर को जारी नए दिशा-निर्देशों के तहत तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने आगामी एथेनॉल आपूर्ति वर्ष (1 नवंबर से 31 अक्टूबर) के लिए खरीद नीति की घोषणा की है। इसके तहत गन्ने के रस, शुगर सिरप और बी-हेवी शीरे (मोलासेस) से सीधे उत्पादित एथेनॉल की खरीद पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। सरकार के 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीद लक्ष्य में अब गन्ना-आधारित स्रोतों को शामिल नहीं किया गया है। नई व्यवस्था के तहत केवल सी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल की खरीद की जाएगी।

हालांकि उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि मौजूदा बाजार कीमतों पर केवल सी-हेवी मोलासेस से एथेनॉल बनाना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। उद्योग सूत्रों के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल करने और ईंधन आयात पर निर्भरता कम करने के लिए चीनी मिलों और डिस्टिलरी इकाइयों को निवेश के लिए प्रोत्साहित किया था। इसके बाद देशभर में एथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया गया।

महाराष्ट्र की एक प्रमुख सहकारी चीनी मिल के अध्यक्ष ने बताया, “देश की कुल स्थापित एथेनॉल उत्पादन क्षमता लगभग 2,000 करोड़ लीटर है, जिसमें से 848 करोड़ लीटर क्षमता अनाज आधारित संयंत्रों की है। एथेनॉल क्षेत्र में कुल निवेश लगभग 1 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। अकेले महाराष्ट्र में 16 स्वतंत्र और अनाज-आधारित डिस्टिलरियां हैं, जिनकी संयुक्त वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 56 करोड़ लीटर है।” उन्होंने कहा कि 60 किलोलीटर प्रतिदिन क्षमता वाली अनाज-आधारित डिस्टिलरी स्थापित करने में 120 से 135 करोड़ रुपए तक की लागत आती है, जबकि 30 किलोलीटर प्रतिदिन क्षमता वाले छोटे संयंत्र के लिए 50 से 60 करोड़ रुपए के निवेश की आवश्यकता होती है।

महाराष्ट्र राज्य सहकारी चीनी कारखाना महासंघ के आंकड़ों के अनुसार, राज्य की चीनी मिलों की कुल स्थापित एथेनॉल उत्पादन क्षमता लगभग 3,750 मिलियन लीटर है। 2025-26 सीजन में उन्होंने 1,250 मिलियन लीटर एथेनॉल की आपूर्ति की थी, जो उनकी कुल क्षमता का करीब 30 प्रतिशत है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय मंत्रिस्तरीय समिति का अनुमान है कि 2026-27 चीनी सत्र में महाराष्ट्र में लगभग 9.9 करोड़ टन गन्ना पेराई के लिए उपलब्ध होगा।

15 लाख टन चीनी को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने के बाद राज्य में चीनी उत्पादन 96 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है। उद्योग प्रतिनिधियों ने इस नीति बदलाव को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि इससे बैंकिंग क्षेत्र, चीनी मिलों और किसानों पर व्यापक वित्तीय प्रभाव पड़ सकता है। नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के अध्यक्ष और महाराष्ट्र के पूर्व सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटिल ने कहा, “केंद्र सरकार के प्रोत्साहन पर देशभर की चीनी मिलों ने डिस्टिलरी का विस्तार किया और एथेनॉल परियोजनाएं स्थापित कीं, जिससे लगभग 1 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित हुआ।

एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने देश को 2 लाख करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद की और किसानों को 1.75 लाख करोड़ रुपए का लाभ पहुंचाया। अब यह पूरी एथेनॉल-आधारित अर्थव्यवस्था संकट में पड़ सकती है और बैंकों के लिए 1 लाख करोड़ रुपए तक के एनपीए का जोखिम पैदा हो सकता है।” शुगर मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.बी. थोंबरे ने कहा कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने पिछले 25 वर्षों में एथेनॉल-आधारित अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए लगातार प्रयास किए हैं।

उन्होंने कहा कि केंद्र का यह फैसला उस पूरी व्यवस्था को कमजोर कर सकता है, जिसने देश की विदेशी मुद्रा बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। थोंबरे ने आगे कहा, “सूखा और चीनी की कमी जैसी स्थितियां अस्थायी होती हैं। सरकार को देश के एथेनॉल क्षेत्र के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए सहयोगात्मक और प्रोत्साहन-आधारित नीति अपनानी चाहिए थी।” उद्योग का मानना है कि खरीद प्रतिबंधों के कारण महाराष्ट्र सहित देशभर में हाल ही में स्थापित एथेनॉल संयंत्र और चीनी मिलें अस्तित्व के संकट का सामना कर सकती हैं।

भारी पूंजी निवेश के बाद अब उनके सामने ऋण की मूल राशि और ब्याज चुकाने की चुनौती खड़ी हो गई है। इसी कारण सहकारी चीनी मिलों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें अपनी डिस्टिलरियों को मल्टी-फीड इकाइयों में बदलने के लिए सहायता दी जाए, ताकि मक्का और अन्य अनाजों का उपयोग कर पूरे वर्ष उत्पादन जारी रखा जा सके और उद्योग को दीर्घकालिक स्थिरता मिल सके।

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