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शिशु आहार और न्यूट्रिशनल ड्रिंक्स विज्ञापनों पर एफएसएसएआई की सख्त कार्रवाई: नेस्ले इंडिया, एबॉट, न्‍यूट्रीशिया, मीड जॉनसन और जाइडस को कारण बताओ नोटिस

'इम्युनिटी' व 'पाचन' के दावों पर मांगा वैज्ञानिक प्रमाण; सोशल मीडिया रील्स पर शिकंजा

भारत के शीर्ष खाद्य नियामक, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने नवजात और शिशु पोषण (Infant Nutrition) से जुड़े संवेदनशील उत्पादों के भ्रामक विज्ञापनों, अप्रमाणित स्वास्थ्य दावों और सोशल मीडिया पर अवैध प्रचार पर एक व्यापक विनियामक प्रहार किया है।
नियामक ने बहुराष्ट्रीय खाद्य दिग्गज नेस्ले इंडिया (Nestlé India), एबॉट हेल्थकेयर (Abbott Healthcare), न्यूट्रीशिया इंटरनेशनल (Nutricia International), मीड जॉनसन न्यूट्रिशन इंडिया (Mead Johnson) और जाइडस वेलनेस (Zydus Wellness) सहित संबंधित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं।
एफएसएसएआई ने शिशु फॉर्मूला उत्पादों में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) और पाचन सुगमता (Digestibility) को लेकर किए जा रहे दावों के समर्थन में प्राथमिक स्तर का सत्यापन योग्य वैज्ञानिक डेटा और क्लिनिकल प्रमाण मांगा है। इसके साथ ही इंस्टाग्राम रील्स (Instagram Reels) के माध्यम से शीर्ष-5 शिशु आहार उत्पादों की सिफारिश करने वाले अनधिकृत डिजिटल अभियानों को भी सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया गया है।
नियामक ने स्पष्ट किया है कि भारत में शिशु दुग्ध विकल्प, फीडिंग बॉटल और शिशु खाद्य (उत्पादन, आपूर्ति और वितरण विनियमन) अधिनियम (IMS Act) तथा खाद्य सुरक्षा और मानक (विज्ञापन एवं दावे) विनियम के तहत दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए स्तनपान के किसी भी विकल्प के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विज्ञापन पर पूर्ण कानूनी रोक है।
नोटिस प्राप्त करने वाली कंपनियों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपने वैज्ञानिक दस्तावेज और अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है। हालांकि प्राधिकरण ने यह भी रेखांकित किया है कि वर्तमान नोटिस जांच और साक्ष्य एकत्र करने की वैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और ये अपने आप में किसी अंतिम विधिक दोष या दायित्व (Final Liability) को सिद्ध नहीं करते हैं।
नेस्ले के इस उत्पाद के लेबल और विज्ञापनों पर यह वाक्य प्रमुखता से लिखा जाता है कि इसमें वे प्रोटीन (Whey Protein) शामिल है जो दूध के प्रोटीन का ऐसा भाग है जिसे पचाना आसान होता है। नियामक ने कहा है कि ऐसे शब्दों का उपयोग माता-पिता के मन में यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है कि यह उत्पाद सामान्य स्तनपान या अन्य प्राकृतिक विकल्पों की तुलना में शिशु के पेट के लिए अधिक अनुकूल है। एफएसएसएआई ने नेस्ले से पूछा है कि इस दावे को प्रमाणित करने के लिए कौन से डबल-ब्लाइंड क्लिनिकल परीक्षण और पाचन अवशोषण अध्ययन (Bio-availability Studies) किए गए हैं।
शिशु पोषण में ह्यूमन मिल्क ऑलिगोसैकराइड्स (HMOs) के उपयोग को लेकर किए जा रहे दावों पर नियामक ने गंभीर विनियामक चिंता जताई है। लेबल पर दावा किया गया है कि “5 HMOs सामान्य इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करने में मदद करते हैं”। नियामक के अनुसार, यह दावा खाद्य सुरक्षा और मानक (विज्ञापन एवं दावे) विनियमों के उन प्रावधानों के दायरे में आ सकता है जो किसी बीमारी, शारीरिक दुर्बलता या विशिष्ट शारीरिक स्थिति (Physiological Condition) के उपचार या रोकथाम से जुड़े अप्रमाणित दावों पर प्रतिबंध लगाते हैं।
बच्चों के न्यूट्रिशनल ड्रिंक कॉम्प्लान को लेकर जाइडस वेलनेस को भी नोटिस भेजा गया है। वर्षों से टेलीविजन और प्रिंट विज्ञापनों में दिखाया जा रहा “2X फास्टर ग्रोथ” (दो गुना तेज शारीरिक वृद्धि) का दावा अब विनियामक की बारीक वैज्ञानिक कसौटी पर है। नियामक ने पूछा है कि किस तुलनात्मक आधार, आयु वर्ग और नियंत्रित आहार के सापेक्ष यह दो गुना विकास मापा गया है।
भारत का कानून स्पष्ट करता है कि किसी भी व्यक्ति, संस्थान या विनिर्माता को शिशु दुग्ध विकल्पों का किसी भी दृश्य, श्रव्य या डिजिटल माध्यम पर विज्ञापन करने की अनुमति नहीं है। इन्फ्लुएंसर द्वारा बनाई गई रील में जब इन 5 ब्रांड्स के नाम लिए गए और उन्हें “बच्चों के बेहतर विकास और सुपाच्यता” के लिए अनुशंसित किया गया, तो यह सीधे तौर पर आईएमएस एक्ट, 1992 (संशोधित 2003) और एफएसएस (Foods for Infant Nutrition) रेगुलेशंस, 2020 का प्रत्यक्ष उल्लंघन पाया गया।
विनियामक ने केवल इन्फ्लुएंसर पर ही कार्रवाई नहीं की, बल्कि उन सभी पांच कंपनियों (Abbott, Nestlé, Nutricia, Mead Johnson) को भी नोटिस थमाया है जिनके उत्पाद उस रील में दिखाए गए थे, ताकि यह जांचा जा सके कि क्या यह एक प्रायोजित (Sponsored/Paid) पीआर अभियान था।
1970 और 80 के दशक में वैश्विक स्तर पर यह देखा गया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा फॉर्मूला दूध के आक्रामक प्रचार के कारण विकासशील देशों में माताओं ने स्तनपान कराना कम कर दिया था। अशुद्ध पानी और गलत अनुपात में पाउडर मिलाने से लाखों नवजात कुपोषण, डायरिया और असमय मृत्यु के शिकार हुए। इसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 1981 में इंटरनेशनल कोड ऑफ मार्केटिंग ऑफ ब्रेस्ट-मिल्क सब्स्टीट्यूट्स अपनाया।
भारत ने 1992 में इस दिशा में कानून बनाया और 2003 में इसे और अधिक सख्त बनाते हुए 2 वर्ष तक के बच्चों के सभी खाद्य विकल्पों के प्रचार पर पूर्ण पाबंदी लगा दी। भारतीय कानून के तहत आईएमएस एक्ट का उल्लंघन एक गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की श्रेणी में आता है जिसमें कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
पहले खाद्य नियामक के नोटिस केवल कंपनियों तक सीमित रहते थे। किंतु अब एफएसएसएआई ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स (जैसे एक्स और इंस्टाग्राम) पर इन उल्लंघनों और कंपनियों को भेजे गए नोटिसों की जानकारी सीधे उपभोक्ताओं के साथ साझा करनी शुरू की है, जिससे कॉर्पोरेट ब्रांड्स पर नैतिक और जन-दबाव भी बढ़ रहा है।
एफएसएसएआई द्वारा नेस्ले, एबॉट और जाइडस जैसी शीर्ष उद्योग कंपनियों को जारी किए गए ये नोटिस भारत में उपभोक्ता संरक्षण और शिशु स्वास्थ्य संप्रभुता की दिशा में एक बेहद साहसिक कदम हैं। शिशु पोषण कोई साधारण व्यावसायिक वस्तु नहीं है; यह सीधे तौर पर देश की भावी पीढ़ी के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की नींव से जुड़ा विषय है। जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां वैज्ञानिक शब्दों (जैसे HMOs, वे प्रोटीन, 2X ग्रोथ) का इस्तेमाल कर अपने उत्पादों को मां के प्राकृतिक दूध या संतुलित पोषण से बेहतर या अपरिहार्य सिद्ध करने का प्रयास करती हैं, तो यह सीधे तौर पर आम परिवारों के विश्वास के साथ खिलवाड़ होता है।
इस विनियामक हस्तक्षेप ने सोशल मीडिया के दौर में चल रहे ‘इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग’ के उस अनियंत्रित खेल पर भी लगाम लगाई है जहां चंद व्यूज और स्पॉन्सरशिप के लिए दवाओं और शिशु आहार की अंधाधुंध सिफारिशें की जा रही थीं। यह मामला आने वाले दिनों में यह तय करेगा कि भारत में खाद्य सुरक्षा कानून केवल कागजों पर बने नियम हैं या फिर वे शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी जवाबदेह बनाने की वास्तविक शक्ति रखते हैं।

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