
दुनिया आज तकनीकी क्रांति और लोकतांत्रिक संवाद के युग में है, जहां हर आवाज़ के सुने जाने की संभावना पहले से कहीं अधिक है। इसके बावजूद, महिलाओं की आवाज़ और उपस्थिति वैश्विक राजनीतिक नेतृत्व के सर्वोच्च स्तरों पर अभी भी सीमित है। शीर्ष पदों, संसदों और मंत्रिमंडलों में महिलाओं की संख्या बढ़ी जरूर है, लेकिन यह बढ़ोतरी न तो समानता दर्शाती है और न ही लिंग-निरपेक्ष अवसरों की पूरी गारंटी देती है। असल चुनौती आंकड़ों से परे जाकर उन अदृश्य बाधाओं को समझने में है, जो महिलाओं के आगे बढ़ने के रास्ते में खड़ी हैं।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों की नवीनतम रिपोर्टें बताती हैं कि वर्तमान समय में दुनिया के केवल लगभग 25 देशों में ही महिला राज्याध्यक्ष या सरकार की प्रमुख हैं। यह संख्या पिछली कुछ दशकों में मामूली बदलाव दिखाती है, लेकिन समान प्रतिनिधित्व से बहुत दूर है। मंत्रीमंडलों में महिलाओं की औसत हिस्सेदारी वैश्विक स्तर पर करीब 23% के आस-पास है। कुछ देशों में प्रगति धीमी होने के बजाय पीछे भी गई है।
भारत समेत कई विकासशील देशों में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्रिपरिषद में महिला प्रतिनिधित्व 6% से भी कम है। इसका सीधा मतलब है कि बदलाव केवल नीतियों के स्तर पर नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में भी लाना होगा।
अभी भी बहुत से समाजों में यह धारणा मौजूद है कि राजनीति ‘पुरुषों का क्षेत्र’ है। महिलाओं को अक्सर गृहस्थी और बच्चों की परवरिश तक सीमित अपेक्षाओं में बांधा जाता है। यह विचारधारा शहरों और पढ़े-लिखे वर्ग में भी पाई जाती है।ज्यादातर राजनीतिक दल चुनावी टिकट या महत्वपूर्ण पद देने में पुरुषों को प्राथमिकता देते हैं। महिलाओं को अक्सर ‘कम प्रभावशाली’ समझकर सामाजिक कल्याण जैसे विभाग सौंप दिए जाते हैं, जबकि वित्त, रक्षा, अवसंरचना जैसे अहम क्षेत्रों में उनकी संख्या गिनी-चुनी है।
चुनावी राजनीति में धन, संगठित सपोर्ट और निजी संपर्क बहुत मायने रखते हैं। आर्थिक संसाधनों और मजबूत राजनीतिक नेटवर्क की कमी महिलाओं को बराबरी से प्रतिस्पर्धा करने से रोकती है।राजनीति में सक्रिय महिलाओं को ऑनलाइन ट्रोलिंग, धमकियों, उत्पीड़न और कभी-कभी शारीरिक हमलों का सामना करना पड़ता है। यह असुरक्षा का माहौल कई होनहार महिलाओं को प्रतियोगी राजनीति से दूर कर देता है।कई देशों में अब भी महिलाओं के लिए नेतृत्व विकास, सार्वजनिक बोलने और प्रशासनिक प्रशिक्षण के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं होते, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और वंचित समुदायों में।
कुछ देशों ने महिला नेतृत्व को प्रोत्साहन देने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। स्कैंडिनेवियाई देशों, न्यूजीलैंड, बारबाडोस, फिनलैंड और फिलीपींस में संसद और मंत्रिमंडल में महिलाओं की संख्या वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। यह सफलता स्पष्ट करती है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, आरक्षण नीतियां, और समान अवसर वाले ढांचे से फर्क संभव है।
कई जगह आरक्षण, जेंडर-सेन्सिटिव कानून, और महिला उम्मीदवारों के प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुए हैं। इससे एक नया नेतृत्व उभर रहा है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और पर्यावरण जैसे जनहित के विषयों पर गहरी संवेदनशीलता के साथ काम कर रहा है।
महिलाओं को राजनीति और नेतृत्व में आगे लाने के लिए बहुआयामी प्रयास जरूरी हैं राजनीतिक दलों की चयन प्रक्रिया में सुधार और महिलाओं के लिए संगठनात्मक स्तर पर नेतृत्व विकास कार्यक्रम। संसाधनों और वित्तीय सहयोग को महिलाओं के लिए सुलभ बनाना। सुरक्षा और कानूनी सहायता के मजबूत तंत्र, ताकि उत्पीड़न और हिंसा की घटनाएं कम हों। बालिकाओं की शिक्षा और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए विद्यालय स्तर से ही नेतृत्व और सार्वजनिक वक्तृत्व के अवसर। महिला मेंटरशिप नेटवर्क का निर्माण, जो नई पीढ़ी की राजनीतिज्ञों को मार्गदर्शन और समर्थन दे सके।
वैश्विक राजनीति में महिला नेतृत्व का अर्थ केवल कोटा या संख्या नहीं है। यह उन दृष्टिकोणों, विचारों और मूल्यों को आगे लाने का अवसर है, जो समाज में संतुलन और समावेशिता को बढ़ाते हैं। महिलाओं की भागीदारी लोकतांत्रिक स्वास्थ्य को मजबूत करने के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक प्रगति में भी सहायक सिद्ध होती है।
चुनौतियों का होना स्वाभाविक है, लेकिन यदि नीति-निर्माताओं, समाज और राजनीतिक संस्थाओं का सहयोग मिले, तो महिला नेतृत्व दुनिया में एक नयी संवेदनशील और दूरदर्शी राजनीति की शुरुआत कर सकता है। यह केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए आगे बढ़ने का मौका है।



