ओपिनियनसंपादकीय

अनुच्छेद 356 : राजनीतिक हथियार या संवैधानिक प्रावधान?

 

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ केंद्र और राज्य सरकारें संविधान द्वारा परिभाषित सीमाओं के भीतर काम करती हैं। परंतु जब भी केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 का उपयोग किया है, तब लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा हुआ है। अनुच्छेद 356 जिसे “राष्ट्रपति शासन” का प्रावधान कहा जाता है, का उद्देश्य आपात स्थिति में राज्य प्रशासन को संभालना था, परंतु वास्तविकता में यह अक्सर केंद्र की राजनीतिक इच्छा का उपकरण बन गया है।

अनुच्छेद 356 क्या है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि यदि किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए, तो राष्ट्रपति उस राज्य में शासन संभाल सकता है। इसका अर्थ है कि राज्य सरकार को बर्खास्त कर दिया जाता है और राज्य की सभी शक्तियाँ राष्ट्रपति के अधीन आ जाती हैं, जो वास्तव में केंद्र सरकार के माध्यम से शासन करता है।

संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि यह अनुच्छेद “केवल असाधारण परिस्थितियों में” प्रयोग किया जाना चाहिए। परंतु व्यवहार में इसे राजनीतिक हथियार के रूप में अधिक इस्तेमाल किया गया है।

अनुच्छेद 356 का उद्देश्य

इस अनुच्छेद को संविधान सभा में इसलिए जोड़ा गया था ताकि यदि किसी राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो जाए या सरकार संविधान का पालन न करे, तो केंद्र हस्तक्षेप कर सके।
मुख्य उद्देश्य था—

देश की एकता और अखंडता बनाए रखना।

संवैधानिक व्यवस्था को पुनः स्थापित करना।

नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना।

परंतु, जिस प्रावधान का उद्देश्य लोकतंत्र की रक्षा था, वही आगे चलकर लोकतंत्र पर खतरे का कारण बन गया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और दुरुपयोग

स्वतंत्रता के बाद से अब तक अनुच्छेद 356 का प्रयोग 100 से अधिक बार किया जा चुका है। यह आंकड़ा स्वयं इस बात का प्रमाण है कि यह प्रावधान अपवाद नहीं, बल्कि राजनीतिक परंपरा बन गया है।

पहली बार इसका प्रयोग 1951 में पंजाब (तब का पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य) में किया गया था।
इसके बाद 1959 में केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया गया — यह केंद्र द्वारा राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में देखा गया।

1977 में जब जनता पार्टी सत्ता में आई, तब उसने इंदिरा गांधी द्वारा संचालित राज्यों की कांग्रेस सरकारों को बर्खास्त किया।
1980 में इंदिरा गांधी ने सत्ता में लौटते ही जनता पार्टी की राज्य सरकारों को हटाया।

यह सिलसिला दिखाता है कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग लोकतंत्र की रक्षा नहीं, बल्कि राजनीतिक बदले की भावना से किया गया।

न्यायालयों का हस्तक्षेप: एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)

यह मामला भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ।
कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई की सरकार को केंद्र ने बर्खास्त कर दिया था। मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, और सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग न्यायिक समीक्षा के अधीन है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि—

राज्य सरकार को केवल बहुमत खोने की आशंका पर नहीं हटाया जा सकता।

विधानसभा में बहुमत की परीक्षा (फ्लोर टेस्ट) अनिवार्य है।

राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय की न्यायालय समीक्षा कर सकता है।

यह निर्णय लोकतंत्र के पक्ष में एक ऐतिहासिक सुरक्षा कवच सिद्ध हुआ, जिसने केंद्र के मनमाने रवैये पर रोक लगाई।

लोकतंत्र के लिए खतरा क्यों?

राजनीतिक हथियार बन जाना:
अनुच्छेद 356 का प्रयोग अक्सर विपक्षी दलों की सरकारों को गिराने के लिए किया गया है। इससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होती है।

संघीय ढांचे पर प्रहार:
भारतीय संविधान संघीय ढांचे पर आधारित है, जहाँ केंद्र और राज्य दोनों की अपनी-अपनी भूमिकाएँ हैं। लेकिन अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग से यह संतुलन बिगड़ जाता है।

जनमत का अनादर:
जब किसी राज्य में चुनी हुई सरकार को बर्खास्त किया जाता है, तो यह जनता के निर्णय का अपमान होता है। इससे लोकतंत्र की जड़ों में संदेह और असंतोष फैलता है।

राजनीतिक अस्थिरता:
बार-बार राष्ट्रपति शासन लगने से प्रशासनिक निरंतरता टूट जाती है और जनता का विश्वास घटता है।

केंद्र की अत्यधिक शक्ति:
यह अनुच्छेद केंद्र को इतना अधिकार देता है कि वह राज्यों के लोकतांत्रिक निर्णयों को भी नकार सके — जो कि लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है।

कुछ प्रमुख उदाहरण

केरल (1959): पहली कम्युनिस्ट सरकार बर्खास्त, यह पहला बड़ा राजनीतिक प्रयोग था।

उत्तर प्रदेश (1992): बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद केंद्र ने भाजपा सरकार को हटाया।

बिहार (2005): विधानसभा भंग कर दी गई, जबकि सरकार बनाने का अवसर विपक्ष को नहीं दिया गया।

अरुणाचल प्रदेश (2016) और उत्तराखंड (2016): दोनों राज्यों में अनुच्छेद 356 का प्रयोग किया गया, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक बताया।

इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 356 का उपयोग प्रायः राजनीतिक समीकरणों के अनुसार किया जाता है, न कि संविधानिक संकट के कारण।

सकारात्मक पक्ष भी हैं

हालांकि इसके दुरुपयोग से इनकार नहीं किया जा सकता, परंतु कुछ परिस्थितियों में अनुच्छेद 356 ने व्यवस्था को बचाया भी है —

जब किसी राज्य में हिंसा या प्रशासनिक अराजकता ने शासन को असंभव बना दिया हो।

जब कोई राज्य सरकार संविधान का उल्लंघन करे या राष्ट्रीय एकता को खतरे में डाले।

उदाहरण के तौर पर, पंजाब में आतंकवाद के दौर (1987) में राष्ट्रपति शासन आवश्यक था, क्योंकि कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी।

इससे स्पष्ट है कि अनुच्छेद 356 स्वयं में बुरा नहीं, बल्कि उसका राजनीतिक उपयोग ही लोकतंत्र के लिए खतरा है।

लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के उपाय

सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन अनिवार्य हो।

राज्य सरकार को हटाने से पहले विधानसभा में बहुमत परीक्षण अनिवार्य किया जाए।

राष्ट्रपति शासन की अवधि को केवल आवश्यक परिस्थितियों तक सीमित रखा जाए।

केंद्र और राज्य के बीच सहयोगात्मक संघवाद की भावना को मजबूत किया जाए।

राजनीतिक प्रतिशोध के बजाय संवैधानिक दायित्वों को प्राथमिकता दी जाए।

निष्कर्ष

अनुच्छेद 356 भारतीय संविधान का एक संवेदनशील प्रावधान है — यह लोकतंत्र को बचाने के लिए बनाया गया था, परंतु इसका दुरुपयोग लोकतंत्र को कमजोर करने का माध्यम बन गया।

लोकतंत्र की असली शक्ति जनता के हाथ में होती है, और जब जनता द्वारा चुनी गई सरकारों को राजनीतिक कारणों से हटाया जाता है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार होता है।

अतः यह कहा जा सकता है कि —
अनुच्छेद 356 तभी तक उपयोगी है, जब तक इसका प्रयोग संविधान की भावना के अनुरूप किया जाए।
परंतु जब यह राजनीतिक हथियार बन जाता है, तब यह न केवल संघीय ढांचे को कमजोर करता है, बल्कि भारत के लोकतंत्र के लिए एक गंभीर खतरा बन जाता है।

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button