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भारतीय परिवार: बीते कल का ‘संयुक्त’, आज का ‘स्वतंत्र’

व्यक्तिगत स्वतंत्रता युवा सोच और आर्थिक आत्मनिर्भरता

भारत में परिवार को हमेशा ही प्यार, संस्कार और जिम्मेदारी वाली जगह माना गया है। लेकिन 2025 तक आते-आते वह पारंपरिक संयुक्त परिवार, जिसमें तीन पीढ़ियाँ साथ रहती थीं, अब तेजी से छोटा, अलग-थलग हो रहा है। आज न्यूक्लियर फैमिली, लिव-इन रिलेशनशिप, सिंगल रहना और तलाक जैसी चीजें पहले की तुलना में सामान्य हो गई हैं। NFHS के नए आंकड़ों के मुताबिक, शहरों में लगभग 74% घर अब न्यूक्लियर हैं यानि पति, पत्नी और बच्चे, जबकि संयुक्त परिवारों का आंकड़ा दो दशकों में आधे से भी कम रह गया है।​

सरल शब्दों में कहें तो शहरों का फैलाव, नए करियर, शिक्षा का महत्व और लड़कियों में आत्मनिर्भरता ने लोगों को खुद सोचने, खुद फैसले लेने और खुद अपनी जिंदगी जीने का हौसला दिया। पुराने जमाने में परिवार एक ही घर में, एक ही रसोई और एक ही बजट में जीता था। अब युवा जोड़े नौकरी, बच्चों की पढ़ाई, या निजी पसंद की वजह से अलग रहना पसंद करने लगे हैं। बाहर जाने, अपने फैसले खुद करने और लाइफस्टाइल को पूरी तरह बदलने का चलन बड़ा है।

पुरानी सोच में हमेशा माना जाता था कि महिलाएँ घर या परिवार के लिए ही बनी हैं। लेकिन अब जीवन के हर फैसले में वे खुद आगे हैं पढ़ाई, नौकरी, शादी का समय, बच्चों की प्लानिंग और अपने लिए फैसले। लिव-इन, तलाक या सिंगल रहना भी समाज में सामान्य हो गया है। अदालतें भी अब मान चुकी हैं कि जो महिला आर्थिक रूप से सक्षम हो, उसे “गुज़ारा भत्ता” जैसे परंपरागत अधिकारों की ज़रूरत नहीं। जिससे महिलाओं को भी आत्म-निर्भर और जिम्मेदार होने का संदेश मिलता है।​

सोशल मीडिया, मोबाइल और डेटिंग ऐप्स ने रिश्तों की परिभाषा ही बदल दी है। अब दोस्ती, शादी, या संबंध जोड़ना पहले की तरह माता-पिता या समाज के सब नियमों में नहीं, बल्कि खुद की मर्जी से और अक्सर डिजिटल स्क्रीन पर तय होने लगे हैं। इससे रिश्तों में फुर्सत, दूरी और कभी-कभी कमजोरी भी देखने को मिली है।

संयुक्त परिवार का मतलब था सुरक्षा, मदद, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों का अनुभव और सामाजिक सहारा। मगर जब परिवार छोटा होता है, तो व्यक्ति को आज़ादी, अपने फैसले लेने की शक्ति और फुर्सत तो मिलती है, मगर बुजुर्गों की देखभाल, बच्चों की जिम्मेदारी और अपनापन धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाता है। पढ़ाई, नौकरी या अकेले रहना आसान लगता है, लेकिन अकेलापन, तनाव और परेशानी बढ़ती है।​

कुछ लोग कहते हैं, “यह बदलाव तरक्की है बराबरी, आज़ादी और पुराने जख्मों को खत्म करता है।” मगर पुराने लोग सोचते हैं, “संयुक्त परिवार टूटेगा तो संवेदना, संस्कार और समाज की मजबूती टूटती है।” असल बहस स्वतंत्रता और जिम्मेदारी, अकेलेपन और अपनत्व के बीच है। जरूरी नहीं कि हर बदलाव खतरनाक हो। समाज हमेशा नए तरीके अपनाकर ही आगे बढ़ा है। असली चुनौती है, क्या हम नए परिवारों और रिश्तों में भी प्यार, जिम्मेदारी और एक-दूसरे का ध्यान रखने की संस्कृति जिंदा रख पाएंगे?

आज परिवार का मतलब सिर्फ़ एक छत में रहना नहीं, बल्कि अपनापन, आदर, ध्यान और संवाद साझा रखना है। जो पीढ़ी आज अपने फैसले खुद कर रही है, वह परिवार को सिर्फ़ बंधन नहीं बल्कि स्वतंत्रता मानती है। असली सवाल है क्या हम नया परिवार उस संस्कार और सम्मान के साथ बना रहे हैं, जिसमें संवेदना और विश्वास हो? भारतीय परिवार का असली रंग साझा होने में है, न कि सिर्फ एक साथ रहने में। अगर यह अपनापन, समझ और जिम्मेदारी बची रही तो आधुनिकता का डर भी नहीं रहेगा।​

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