शहरी भारत में नशे की समस्या: नीति में रोकथाम क्यों गायब है?
बढ़ती नशाखोरी की अनदेखी

शहरी भारत में नशे की लत एक ऐसी समस्या है जो अब सिर्फ खबरों, फिल्मों या पुलिस की छापेमारी तक सीमित नहीं रह गई है। यह हर गली, स्कूल–कॉलेज, पार्टी और झोपड़पट्टी में सच्चाई बन चुकी है। इन वर्षों में जहां ड्रग्स का चलन तेजी से बढ़ा, वहीं रोकथाम के नाम पर नीति और व्यवस्था अभी बहुत पीछे छूट गई दिखती है। बड़ी-बड़ी योजनाएँ, एनडीपीएस कानून, कड़ी सज़ाएँ और हजारों गिरफ्तारियाँ इन सबके बावजूद, क्या हमारी सरकारें और समाज असल में नशे से बचाव पर उतना ध्यान दे पाए हैं, जितना ज़रूरी है? इसके जवाब में एक बड़ा “नहीं” सामने आता है।
2025 तक भारत में लगभग 10 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में नशे की गिरफ्त में आ चुके हैं, जिनमें शहरी आबादी का प्रतिशत सबसे तेज बढ़ रहा है। पिछले पांच साल में ही नशीली दवाओं का चलन 70% बढ़ गया है। हर साल 74,000 ड्रग्स से जुड़े अपराध दर्ज होते हैं, और 98,000 से ज्यादा लोग हिरासत में लिए जाते हैं लेकिन यह आंकड़े असल संकट की गहराई नहीं दिखाते। दिल्ली में सड़क पर रहने वाले बच्चों में 49% ने बीते साल किसी न किसी नशीले पदार्थ का सेवन किया; केरल और पंजाब, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश, दिल्ली सब जगह मौत, गरीबी, अपराध और परिवार टूटने के पीछे सबसे बड़ा हाथ ड्रग्स का है।
हीरोइन, गांजा, कोडीन वाली दवाइयाँ, सिंथेटिक टैबलेट्स, और इंजेक्शनों के साथ-साथ अब इंटरनेट और डार्कनेट के ज़रिए भी बड़ी संख्या में युवा और किशोर नशे की जाल में फँस रहे हैं। पार्टी कल्चर, सोशल मीडिया, और सस्ती, आसानी से उपलब्ध “डिज़ाइनर ड्रग्स” ने खतरा और बढा़ दिया है।
भारत की NDPS अधिनियम (1985) मुख्य रूप से “अपराध-सज़ा” की सोच पर टिकी है। नशे का सेवन, व्यापार, उत्पादन सब अपराध की श्रेणी में है और जुर्माना जेल सख्त हैं। असल स्थिति यह है कि पुलिस, एनसीबी, और कानून सिर्फ पकड़धकड़, सज़ा, और छापे–मात्र तक सीमित हो गए हैं। नतीजा पीड़ित डर के मारे सामने नहीं आते, पुनर्वास या इलाज के बजाय अपराधी मान लिए जाते हैं। स्कूल-कॉलेजों या युवा मोहल्लों में कोई गंभीर, सतत रोकथाम अभियान दिखाई नहीं देता। समाज में आज भी नशा एक “कलंक”, “अपराध” या “चरित्र की कमजोरी” मान लिया जाता है, बजाय इसके कि इसे बीमारी और जनस्वास्थ्य का प्रश्न माना जाए। इसीलिए पीड़ित मदद मांगने में डरते हैं और रोकथाम के मोर्चे अक्सर सूने पड़े हैं।
देश में रोजाना खबर आती है इतने करोड़ की ड्रग्स जब्त, इतने गिरफ़्तार, इतने शहरों में तगड़ा पुलिस अभियान। लेकिन जमीनी स्तर पर स्कूल-कॉलेजों, युवाओं, माता-पिता, डॉक्टरों और काउंसलर्स की कोई संयुक्त पहल नहीं दिखती, जो बच्चों को सच में नशे से दूर रहने के लिए तैयार करे।
केवल 25% इलाज चाहने वाले मरीज ही किसी सुविधा तक पहुँच पाते हैं। रिकवरी और रिसर्च सेंटर शहरों में केंद्रित हैं; कस्बों, स्लम या स्कूल-मोहल्ला स्तर पर कोई व्यापक नीति नहीं। CSR फंड्स और स्वास्थ्य बजट का नाममात्र हिस्सा ही नशा-मुक्ति और रोकथाम में जाता है।
नशे से बचाव का सबसे असरदार तरीका यही है कि शुरुआत में ही बच्चों-युवाओं को जानकारी, सपोर्ट और आत्मविश्वास मिले। स्कूल पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य-शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और नशे संबंधी जागरूकता जरूरी है। मोहल्ला, पंचायत और क्लीनिक स्तर पर काउंसलिंग, संवाद, और हेल्पलाइन हो ताकि शर्म, डर या कलंक में फँसे लोग खुलकर मदद मांग सकें। खेल, आर्ट, संगीत, वॉलंटियरिंग जैसी रचनात्मक गतिविधियों के ज्यादा मौके, जिससे बच्चों-युवाओं को सकारात्मक आउटलेट मिले। डिजिटल जागरूकता, खासकर सोशल मीडिया और डार्कनेट के ज़रिए फैल रहे ड्रग कारोबार को समझना–रोकना आज की जरूरत है। समाज में पीड़ित और उसके परिवार के लिए सपोर्ट सिस्टम, पुनर्वास और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ ताकि वो सामान्य ज़िन्दगी में लौट सके।
तमिलनाडु, केरल जैसे राज्यों ने स्कूल “एंटी-ड्रग क्लब” और “स्टूडेंट पुलिस कैडेट” जैसी पहलें शुरू की हैं, जहाँ युवा स्वयं जागरूकता अभियान में भाग लेते हैं, खेल या मार्शल आर्ट जैसी सकरात्मक गतिविधियों को अपनाते हैं। नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में समुदाय आधारित इलाज सफल रहा है जिसमें गाँव स्तर पर सहयोग से एडिक्शन से बाहर निकलना आसान बनता है।
इसी तरह केंद्र और राज्य सरकारें, एनजीओ और स्थानीय समाज को चाहिए कि नशे को “बीमारी” माने, “अपराध” नहीं। हर स्कूल व कॉलेज में हेल्पलाइन फैली हो। सार्वजनिक मीडिया में जागरूकता अभियान चलाया जाए, जिससे डर और कलंक टूटे। समुचित बजट रोकथाम और पुनर्वास के लिए सुरक्षित हो। अधिकारी, पुलिस, डॉक्टर और काउंसलर मिलकर संयुक्त नीति अपनाएँ।
शहरों की गलियों, कॉलेज के कैंपस, और झुग्गियों से सभ्रांत इलाकों तक नशा एक बड़ी चुप समस्या बन गया है। जब तक सरकारें केवल अपराध नियंत्रण के दायरे में रहेंगी, तब तक असल जड़ों तक पहुँच नहीं होगी। जरूरत है कि नीति के केंद्र में जागरूकता, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास हो ताकि हर युवा को नशे से बचाने की और फिर सामान्य जीवन की नई पगडंडी दिखाई जा सके।



