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भारतीय मोबाइल निर्यात और चीन पर बढ़ती पकड़: वैश्विक व्यापार की चुनौती

भारत के मोबाइल निर्यात में जीरो टैरिफ़ का लाभ और चीन के प्रति प्रतिस्पर्धा

भारत के मोबाइल निर्यात ने 2025 में अभूतपूर्व उछाल लगाया है। अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच मोबाइल निर्यात लगभग 13.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष के समान अवधि से 60 फीसदी अधिक है। अमेरिका इस निर्यात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अपने नाम करता है, और इसके निर्यात में वर्ष-दर-वर्ष लगभग 200 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह तेजी भारत के मोबाइल विनिर्माण क्षेत्र की मजबूत बुनियाद, व्यापक दक्षता और विश्वसनीयता का प्रतीक है। भारत ने चीन को भी स्मार्टफोन निर्यात के मामले में पीछे छोड़ दिया है, और यह देश वैश्विक सप्लाई चेन में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभरा है।

भारत को अपनी निर्यात बढ़त बनाये रखने के लिए लागत में कटौती, स्थानीय उपकरण और घटकों के उत्पादन पर केंद्रित होकर अपनी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना आवश्यक है। साथ ही, वैश्विक भू-राजनीति, विशेषकर अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों में उतार-चढ़ाव, भारत की विनिर्माण रणनीति को प्रभावित कर रहा है, जिसे देखते हुए भारत को निरंतर नवाचार, निवेश आकर्षण और उत्पादन क्षमता विस्तार पर ध्यान देना होगा।

अमेरिका में भारतीय मोबाइल निर्यातकों को चीन की तुलना में जीरो-ड्यूटी का स्पष्ट लाभ है, क्योंकि चीन को अमेरिकी बाजार में 20 प्रतिशत टैरिफ का भुगतान करना पड़ता है। यह लाभ भारत के निर्यात को बहुत बड़ा बढ़ावा देता है, लेकिन अमेरिकी-चीनी व्यापार युद्ध के सुलझने और टैरिफ कम होने के कारण यह लाभ धीरे-धीरे कम होने की संभावना है। इस परिवर्तन के मद्देनजर भारत को लागत घटाने और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि वह प्रतिस्पर्धा में आगे बना रहे।

अमेरिका और चीन के व्यापार विवादों ने भारत को मोबाइल उत्पादन और निर्यात में अवसर प्रदान किया। भारत सरकार के उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना ने मोबाइल विनिर्माण को तेज़ी से बढ़ावा दिया है। Apple जैसे वैश्विक ब्रांड ने भारत में अपने उत्पादन को विस्तार दिया है। हालांकि, भारत को अभी भी कच्चे माल की उच्च आयात निर्भरता, अव्यवस्थित लॉजिस्टिक्स और उच्च उत्पादन लागत जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

भारत की उत्पादन लागत अभी भी चीन से लगभग 12 प्रतिशत अधिक है। इसमें कच्चे माल, श्रम, बिजली, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत शामिल है। इसे कम करने के लिए भारत को स्थानीयकरण बढ़ाना, दक्षता सुधारना, और विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करना होगा। यह आवश्यक है ताकि भारत अमेरिका जैसे बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने और न केवल निर्यात मात्रा बल्कि गुणवत्ता में भी शीर्ष पर रहे।

भारत को सेमीकंडक्टर, बैटरी, कैमरा माड्यूल जैसे प्रमुख घटकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना होगा। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स के आधुनिकीकरण, भण्डारण और वितरण तंत्र को अधिक प्रभावी बनाना होगा। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अनिश्चितता के कारण वैकल्पिक स्रोतों की भी तलाश करना आवश्यक होगा। सरकारी और निजी क्षेत्र के मध्य साझेदारी से इसके लिए बेहतर रणनीति बनाई जा सकती है।

भारत के मोबाइल परिधान में निरंतर वृद्धि देखी गई है, खासकर अमेरिका और यूरोप जैसे उन्नत बाजारों में। लेकिन निर्यात के इस संयोग को बनी रखने के लिए तकनीकी नवाचार, उत्पादन क्षमता विस्तार तथा बाजार की जरूरतों के अनुसार लचीली रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ चीन की वापसी की संभावनाओं को देखते हुए भारत को खुद को सतत विकसित रखना होगा।

भारत ने मोबाइल निर्यात क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर ली है, लेकिन इसे बनाए रखने के लिए लागत प्रबंधन, सप्लाई चेन सुधार और निरंतर नवाचार अपरिहार्य हैं। अमेरिका-चीन के व्यापारिक गतिरोध और वैश्विक भू-राजनीतिक माहौल में भारत की विनिर्माण नीति को चतुराई से दिशा देनी होगी ताकि भारत न केवल मोबाइल निर्यात के वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सके, बल्कि सतत प्रतिस्पर्धा में शीर्ष पर भी बना रहे।

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