शांति की नाजुक डोर फिर से टूटी: दिल्ली और इस्लामाबाद धमाकों ने बढ़ाया भारत-पाक तनाव
दिल्ली और इस्लामाबाद में हुए धमाके: दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप

दो दिनों के भीतर ही भारत की राजधानी दिल्ली और पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुए धमाकों ने न केवल दोनों शहरों की सुरक्षा को दहला दिया बल्कि दोनों देशों के रिश्तों को भी गंभीर संकट में डाल दिया। दिल्ली के लालकिले के पास भारती सुरक्षाबलों ने उस दर्दनाक विस्फोट को सहा, जिसमें कई निर्दोष लोगों की जानें गईं। मुंबई की गलियों से लेकर सीमा के पार तक पहुँची सियासी हलचल में पाकिस्तान ने तुरन्त भारत को दोषी ठहराया तो भारत ने इसे “ध्यान भटकाने वाली राजनीति” करार दिया।
इतने संवेदनशील समय में यह धमाके दिल को जकड़ने वाली वेदना के साथ-साथ दोनों देशों के बीच बढ़ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का भी कारण बने। भारत और पाकिस्तान के बीच कई सालों से जारी दुश्मनी में ऐसे अंतराल आते रहे हैं जब रिश्ते सामान्य होने लगते हैं। मगर आतंकवाद और हिंसा की घटनाओं से ये उम्मीदें बार-बार धूमिल होती रही हैं।
यह विस्फोट इस पूरी परिस्थिति में नया ईंधन भरने जैसा है, जो तनाव की आग को बड़ी तेज़ी से भड़काने की क्षमता रखता है। हर तस्वीर में राजनीतिक बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और भीतरघात की भावना झलकती है। यह हमारा वह एशिया है जहाँ दशकों की जटिलताओं के बीच अचानक झगड़े और कटुता फैलती है, जबकि आम लोग असहाय होकर इस तूफान में फंसे होते हैं।
धमाकों के बाद दोनों तरफ जनता में आक्रोश की भावना बढ़ी है। दिल्ली में लोग भयभीत हैं, बच्चों को स्कूलों से घर आने की जल्दी है, वहीं इस्लामाबाद के नागरिक भी अपने शहर की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। इन घटनाओं ने हजारों-लाखों लोगों के दैनिक जीवन में अनिश्चितता पैदा कर दी है। आम नागरिकों के बीच ऐसी घटनाओं के पीछे राजनीतिक और सैन्य कारणों को जानने की इच्छा होती है, मगर वे स्वयं असुरक्षित महसूस करते हैं। शांति की बात कहने वाले न जाने कब सुरक्षित महसूस करेंगे, जब हर क्षण कोई धमाका उनकी दुनिया को हिला सकता है।
यह समय है सोच-समझकर प्रतिक्रिया देने का, न कि भावनाओं के बवंडर में बह जाने का। मीडिया का इस भूमिका में अत्यंत महत्व है कि वह संवाद को भड़काए नहीं, बल्कि संयमित करे। संवेदनशील खबरों को तथ्यपरक, संतुलित और शांति प्रेरित अंदाज़ में रिपोर्ट किया जाए। अफवाहों और मनगढ़ंत खबरों से बचना चाहिए, क्योंकि वे केवल समाज में और दहशत फैलाती हैं। इतिहास से सीख लें जब तक मीडिया जिम्मेदारी से खबरों को प्रस्तुत करता है, तब तक समाज में भय कम होता है, जबकि सनसनीखेज़ रिपोर्टिंग से विरोधाभासी भावनाएं और बढ़ती हैं।
यह घटना इसलिए भी खतरनाक हुई क्योंकि कुछ राजनेताओं और ताकतवर एजेंसियों ने तुरंत इसे अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुसार इस्तेमाल कर लिया। सत्ता पाने या बनाए रखने की राजनीति में अक्सर अंतर्राष्ट्रीय और अंतर-राज्यीय विवादता का सहारा लिया जाता है। इससे सामान्य नागरिकों की सुरक्षा भुला दी जाती है। सेनाएं, खुफिया विभाग और मंत्रालय भी इस पॉलिटिक्स का हिस्सा बन जाते हैं जिससे वास्तविक समाधान का रास्ता बंद होता है। ऐसे दौर में शांति की कोशिशें, शांतिप्रिय आवाजें दब जाती हैं, और विरोधाभास गहरा जाता है।
भारत और पाकिस्तान का इतिहास संघर्षों से भरा है लेकिन भुलाने की भी कुछ झलकें हैं। शांति प्रक्रियाएं, दोस्ती की पहलें, सांस्कृतिक एवं व्यापारिक बढ़त की कोशिशें कई बार नाकाम भी हुई हैं पर उन्होंने उम्मीद जगाई है। परंतु बार-बार की हिंसक घटनाओं ने इन आशाओं को कुचल दिया है। इसीलिए हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि शांति का दायरा बेहद नाजुक है, जिसे मजबूत बनाने की पूरी कोशिश करनी होगी।
भारत- पाकिस्तान के बीच शांति बनी रहे, इसके लिए जरूरी है कि दोनों देश आतंकवाद और हिंसा के स्रोतों पर सामूहिक कार्रवाई करें। राजनीतिक और कूटनीतिक बातचीत को बनाए रखें, न कि खामोशी से पीछे हटें। आम जनता के बीच घृणा और संदेह के बजाए सहिष्णुता और संवाद की भावना जगाएं। मीडिया, कला, खेल और युवाओं के माध्यम से दोनों देशों के बीच सेतु बनाएँ। यदि यह संभव हो जाए तो ही इस उपमहाद्वीप में सच्ची शांति और समृद्धि आ सकेगी।
इतिहास रोज़मर्रा के लोगों की जिंदगी से लिखा जाता है। परिवार, बच्चे, छात्र, व्यापारी सभी चाहते हैं कि उनके घर, स्कूल, बाजार और गलियां सुरक्षित रहें। वे चाहते हैं कि राजनीतिक खेलों की वजह से उनकी जिंदगी बर्बाद न हो। धमाकों की चपेट में आई मासूम जिंदगीयां यही समझाती हैं कि हमें अपने घावों में दवा लगानी होगी, गुस्से को शांति में बदलना होगा, और ऐसी राजनीति से दूर रहना होगा जो युद्ध की आहट को बुलाती है।
दिल्ली और इस्लामाबाद के धमाकों से उपजा तनाव भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूद खाई को और गहरा करने की दुविधा है। लेकिन वहीं अवसर भी है कि दोनों देश यह फैसला करें कि युद्ध नहीं, संवाद, नफ़रत नहीं, सहिष्णुता को बढ़ावा देंगे। संसद में नेताओं से लेकर आम बाजारों के दुकानदारों तक हर कोई इस क्षेत्र की शांति का हिस्सा बन सकता है।



