
असम के सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य में नया मोड़ तब आया, जब राज्य सरकार ने “बहुविवाह निषेध विधेयक 2025” को विधानसभा में प्रस्तुत किया। इसमें यह प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पहली पत्नी/पति की मौजूदगी में दोबारा विवाह करता है, तो उसे सात साल तक कारावास की सजा और आर्थिक दंड मिल सकता है। साथ ही, पीड़ितों के लिए वित्तीय-मुआवजा कोष भी बनाया जाएगा, ताकि वे कानूनी प्रक्रिया के दौरान खुद को अकेला महसूस न करें।
सरकार का दावा है कि यह कानून महिलाओं की गरिमा, अधिकार और समानता को सुनिश्चित करने के लिए ऐतिहासिक कदम है। लेकिन जब-जब समाज में पारिवारिक या सांस्कृतिक रिवाजों को चुनौती देने वाले कानून लाए जाते हैं, कई परतें, जटिलताएं और संवेदनशील सवाल भी जन्म लेते हैं। असम का यह नया कानून इसीलिए सामान्य विधायी पहल नहीं, बल्कि सामाजिक सोच, कानूनी यथार्थ और सांस्कृतिक विविधता का संगम है।
भारतीय समाज की कई परतों में बहुविवाह की परंपरा रही है। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक अलग-अलग समुदायों, वर्गों और क्षेत्रों में यह अपनी जगह बनाए हुए था। हालांकि, कानूनन इसकी इजाज़त अब काफी जगहों पर नहीं, लेकिन व्यवहार में आज भी कई क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों की प्रगाढ़ हानि होती रही है।
बहुविवाह के चलते महिलाओं को आत्मसम्मान, आर्थिक स्वतंत्रता और पारिवारिक स्थिरता के क्षेत्र में घोर असमानता का सामना करना पड़ता है। बेटे के लालच और पितृसत्ता की जकड़न में महिलाओं से बार-बार विवाह कर लेने की सामाजिक सहमति कई घरों में मौन यातना में बदल जाती है। ऐसे में असम सरकार का यह कानून केवल विवाह की वैधता का सवाल नहीं, बल्कि लैंगिक न्याय की स्थापना की दिशा में भी अहम पहल है।
असम बहुविवाह निषेध विधेयक 2025 प्रस्तावित करता है कि अगर कोई, अपनी पत्नी या पति के जीवित रहते दूसरा विवाह करता है, तो वह अपराधी माना जाएगा। इसके लिए अधिकतम सात साल का कारावास व आर्थिक दंड, आरोपी को जमानत देने में अदालत की विवेकाधिकारिता, शिकायतकर्ता की पहचान की सुरक्षा, पीड़िता के आर्थिक सहायता हेतु विशेष फंड।
इसके पीछे सरकार का मुख्य उद्देश्य है कि बहुविवाह के भय से महिलाएं मुक्त हों, और जिनके साथ यह अपराध हुआ है, वे कानूनी और सामाजिक सहयोग पा सकें। सरकार ने दावा किया है कि विशेष फंड की व्यवस्था से पीड़ित महिलाओं को पदानुक्रमिक, कानूनी और पुनर्वास सहायता मिलेगी।
असम की असंख्य विविधता में जनजातीय क्षेत्रों की सामाजिक संरचना बिलकुल भिन्न है। इन क्षेत्रों में, आदिवासी स्वशासन परिषदें स्थानीय रिवाज, परंपराओं और कानूनों के तहत चलती हैं। बहुविवाह कभी-कभी जनजातीय समाज के लिए मात्र विवाह प्रथा नहीं, बल्कि उनके सांस्कृतिक जीवन और सामाजिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ होता है। राज्य सरकार ने इन्हीं विविधताओं का हवाला देते हुए, ऐसे क्षेत्रों को विधेयक की परिधि से बाहर रखा।
यह फैसला केंद्र सरकार की उस नीति के अनुरूप है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 371 व छठी अनुसूची के तहत जनजातीय स्वायत्तता को संरक्षण दिया गया है। हालांकि, इससे नए सवाल उभरते हैं क्या इस छूट के चलते जनजातीय महिलाओं के अधिकार सुरक्षित रहेंगे? क्या संवैधानिक समानता का आदर्श प्रभावित नहीं होगा?
लोकतांत्रिक समाज में कानून जब किसी रिवाज या परंपरा से टकराता है, सामान्यता प्रारंभ में प्रतिरोध और असहजता होती है। असम जैसे राज्य में बहुविवाह का सवाल केवल धर्म, जाति या कुल की सीमा तक सीमित नहीं; यह कई बार ग्राम-पंचायत से लेकर खेत खलिहान तक फैली सामाजिक सहमति की दीवार से भी टकरा जाता है।
कई जनजातीय समाज, मुस्लिम समुदाय और कुछ इलाकों में बहुविवाह पारंपरिक रूप से प्रचलित रहा। ऐसे में विधेयक के प्रति विरोध, भ्रम अथवा समर्थन तीनों की अभिव्यक्ति के आसार एकसमान हैं। कई बौद्धिक और सामाजिक विशेषज्ञ कहते हैं कि बदलाव लाने के लिए कानून के साथ जन-संवाद, शिक्षा और समुदाय पर भरोसा भी जरूरी है। अन्यथा कानून “पराया” बन जाता है और समाज उसके अनुपालन में चतुराई दिखाता है, असली बदलाव नहीं करता।
कानून का असर तभी होता है जब उसे धरातल पर प्रभावी और संवेदनशील ढंग से लागू किया जाए। असम में प्रशासनिक स्तर पर इसके सामने कई चुनौतियाँ हैं महिलाएं अपराध की शिकायत किस स्तर तक कर पाएंगी, जब परिवार ही सामाजिक दबाव बन जाए? पुलिस या अदालत में जाने की राह असुरक्षित, खर्चीली और जटिल मानी जाती है। ग्रामीण, अशिक्षित क्षेत्र में कानूनी जागरूकता का अभाव है।सामाजिक आचार संहिता के नाम पर महिलाओं के खिलाफ ‘शर्म’ का डर, जो उन्हें रिपोर्टिंग से रोकता है। सरकार को सिर्फ सख्त सजा के डर पर नहीं, बल्कि समाज को सहयोगी, जागरूक और संवेदनशील बनाने की प्रक्रिया में लगना होगा।
बहुविवाह पीड़ित अधिकांश महिलाएं आर्थिक निर्भरता और सामाजिक अलगाव का शिकार होती हैं। उनके पुनर्वास में आर्थिक सहायता, मानसिक परामर्श, कानूनी सलाह तीनों की आवश्यकता है। राज्य सरकार का “विशेष फंड” इन चुनौतियों से निपटने की कोशिश है, लेकिन इसका प्रभाव तभी सकारथ होगा जब फंड का वितरण पारदर्शी हो, लाभार्थियों की सुरक्षा और गरिमा संरक्षित हो, सहायता सिर्फ कागज़ पर न रहकर वास्तविक रूप में महिलाओं तक पहुँचे। प्रशासन, सामाजिक संगठनों और मीडिया का दायित्व होगा कि वे इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाएँ।
पारिवारिक कानून भारतीय संविधान में राज्य सूची का विषय है, लेकिन धर्म-निरपेक्ष नीति, लैंगिक न्याय और समान नागरिक संहिता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका मिलती है। यदि सिर्फ असम यह कानून लागू करता है, और शेष देश में समानान्तर व्यवस्थाएँ हैं, तो इससे एक नया कानूनी-राजनीतिक बहस जन्म ले सकती है। यह सवाल अहम है कि केंद्र सरकार ऐसे विधेयकों को क्षेत्रीय भिन्नताओं के साथ स्वीकारेगी या पूरे देश में समान मानदंड लागू करना चाहेगी।
कानून केवल बाहर से नियम थोप सकता है, लेकिन सामाजिक सोच का बदलाव शिक्षा, संवाद और सामूहिक चेतना से ही आता है। असम में यह जरूरी है कि स्कूल, मीडिया और ग्राम सभाओं में महिला अधिकार, लैंगिक समानता और बहुविवाह के दुष्परिणामों पर चर्चा हो, ग्राम पंचायत, स्व-सहायता समूह और स्थानीय नेता इन मुद्दों पर खुलकर संवाद करें, महिलाओं को कानूनी मदद और आत्मरक्षा की प्रेरणा दी जाए। ऐसा वातावरण बने जिसमें महिलाएं आत्मगौरव महसूस करें, और पुरुष–समाज संस्कारगत परिवर्तन को अपनाए।
कई अनुसंधानों में यह सामने आया है कि बहुविवाह पीड़ित महिलाओं की स्थिति बेहद जटिल होती है। उनकी शिक्षा अधूरी रह जाती है, आर्थिक निर्भरता बढ़ जाती है, बच्चों को दोहरे परिवार में उपेक्षा या हिंसा का भय रहता है। नया कानून उनकी विवशता को दूर कर सके, इसके लिए उन्हें न केवल न्यायपालिका बल्कि समाज, प्रशासनिक संस्थाओं और स्वयंसेवी संगठनों की जरूरत है।
असम बहुविवाह निषेध बिल 2025 क्षेत्रीय कानून होने के बावजूद, राष्ट्रीय विमर्श का भी विषय है। इसके लागू होने पर संवैधानिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर बहस छिड़ना तय है। यह कानून प्रत्यक्ष रूप से लैंगिक न्याय का प्रयास है, लेकिन परोक्ष रूप में यह समाज की अपनी ही जड़ता, आदतों और सोच की परख भी है।



