
हरियाणा के हिसार में आगामी 26 नवंबर को होने वाला संयुक्त किसान मोर्चा का प्रदर्शन, 2020-21 के किसान आंदोलन के पांच साल पूरे होने की याद दिलाता है। यह आंदोलन केवल तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के वापस लेने की मांग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह किसानों की गहरी कठिनाइयों और समस्याओं की ओर भी इशारा करता है, जिनका हल अभी तक नहीं निकला है। किसान इस आंदोलन के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), गन्ने की उचित कीमत, बीमा व्यवस्था, और कर्ज माफी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर फिर से सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।
यह विरोध प्रदर्शन इस बात की गवाही है कि किसानों के मसलों में अभी भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है, जो केवल कागजी कानूनों से कहीं ज्यादा है। इसे सामाजिक-आर्थिक नीतियों, कृषि तंत्र की गहन पुनर्समीक्षा और किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण की चुनौती के रूप में देखना होगा।
भारत के ग्रामीण क्षेत्र में कृषि सदियों से आत्मनिर्भरता का आधार रही है, लेकिन बदलते जैव-प्राकृतिक, वैश्विक बाजारों और राजनीतिक संदर्भों ने किसानों को एक जटिल स्थिति में ला खड़ा किया है। 2020-21 के किसान आंदोलन ने किसानों के जीवन की व्यथा को देश-दुनिया के सामने रखा था। हालांकि सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस ले लिया, लेकिन किसानों की आर्थिक सुरक्षा, फसल की कीमत, ऋण माफी और सामाजिक सुरक्षा जैसे सवाल ज्यों के त्यों हैं।
किसान अभी तक “पूरे तंत्र में सुधार” की मांग करते आ रहे हैं जिसमें कृषि विपणन, संसाधन प्रबंधन, वित्तीय सहायता और सामाजिक कल्याण की गहरी भूमिका शामिल है। यह आंदोलन सिर्फ़ कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि जीवन यापन की लड़ाई है।
हरियाणा में किसान आंदोलन की ऐतिहासिक पहचान भी है। यहाँ के किसान संयुक्त मोर्चा के माध्यम से योग्यता से अपनी आवाज़ उठाते हैं। हिसार के 26 नवंबर के प्रदर्शन को राजनीतिक दृष्टी से देखा जाए तो यह सरकारों के लिए चेतावनी है कि किसानों को एक समूह के रूप में देखना और उनकी असल जरूरतों को समझे बिना कोई नीति नहीं बनानी चाहिए। साथ ही यह आंदोलन संकेत करता है कि किस प्रकार किसानों की भूमिका भारतीय समाज और राजनीति में निर्णायक बनी हुई है। किसान अपनी एकजुटता से न केवल संघर्ष कर रहे हैं, बल्कि लोकतंत्र के सबसे बुनियादी स्तंभ को मजबूत कर रहे हैं।
किसानों की समस्याओं का समाधान केवल नए कानूनों द्वारा नहीं किया जा सकता। पूरे कृषि तंत्र को बहुआयामी सुधारों की जरूरत है कृषि उत्पादों की उचित कीमत सुनिश्चित करने के लिए व्यापक मार्केट सुधार। ऋण से मुक्ति के लिए बेहतर वित्तीय मॉडल और सुविधा।फसल बीमा के प्रभावी कार्यान्वयन से किसानों की सुरक्षा। सिंचाई, भंडारण, और कृषि तकनीक में तकनीकी नई तरीकों का विस्तार।ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का विकास। यहां तक कि छोटे किसानों को भी संगठित करना और उन्हें समुचित नेतृत्व देना इनके सशक्तिकरण के लिए जरूरी है।
खेती को टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकों का संयोजन जरूरी है। जल संरक्षण, जैविक खेती और फसल-बदल की योजनाओं को बढ़ावा देकर ही कृषि क्षेत्र की स्थिरता लाई जा सकती है। एक सतत कृषि प्रणाली ग्रामीण जीवन को संबल देती है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद करती है।
हरियाणा के किसानों का यह आन्दोलन एक सशक्त अपील है कि सिर्फ़ कानून वापस लेना ही नहीं बल्कि गहरी नीति सुधार और ग्रामीण कल्याण पर फोकस होना चाहिए। सरकार, किसान और समाज को मिलकर कृषि क्षेत्र को स्थायी, समृद्ध और संतुलित बनाना होगा। जब तक यह नहीं होगा, तब तक किसान आंदोलनों की जरूरत बनी रहेगी। इसलिए हमें किसानों की आवाज़ को गंभीरता से सुनकर उनके लिए ठोस समस्याओं के स्थायी समाधान खोजने होंगे।



