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राष्ट्रपति महल से अमेरिकी अदालत तक: ताकत, न्याय और वैश्विक राजनीति का द्वंद्व

जब सुपरपावर 'वैश्विक पुलिस' बन जाता है: मादुरो केस और अमेरिका की पहुँच

इतिहास गवाह है कि सत्ता की कुर्सियां कभी स्थाई नहीं होतीं, लेकिन कुछ नेताओं का पतन इतना नाटकीय होता है कि वह पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन जाता है। निकोलस मादुरो, जिन्होंने वर्षों तक वेनेजुएला पर एकछत्र राज किया, आज कराकस के राष्ट्रपति महल की सुरक्षा को छोड़कर अमेरिका की एक अदालत में ‘मुकदमे’ का सामना कर रहे हैं।

यह घटना केवल एक आपराधिक मामले की सुनवाई नहीं है। यह इस सदी का वह मोड़ है जहाँ ‘वैश्विक पुलिस वाले’ की भूमिका निभा रहा अमेरिका और ‘राष्ट्रीय संप्रभुता’ का दावा कर रहे एक राष्ट्र के बीच सीधी टक्कर हो रही है। क्या यह वास्तव में न्याय की जीत है, या यह दुनिया को यह बताने का एक तरीका है कि “ताकतवर के पास ही न्याय करने का हक है”?

अमेरिका ने मादुरो पर मादक पदार्थों की तस्करी (Narco-terrorism), भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोप लगाए हैं। अमेरिका का तर्क है कि मादुरो ने अपने पद का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी के लिए किया, जिससे अमेरिकी नागरिक प्रभावित हुए। सवाल यह उठता है कि वेनेजुएला के भीतर कथित रूप से किए गए अपराधों के लिए अमेरिका को मुकदमा चलाने का अधिकार कैसे मिला? अमेरिका अक्सर अपने घरेलू कानूनों को ‘एक्स्ट्रा-टेरिटोरियल’ (सीमा पार) लागू करता है। यह “ग्लोबल कॉप” की वह भूमिका है जहाँ वाशिंगटन यह तय करता है कि दुनिया के किस कोने में हो रहा अपराध उसकी सुरक्षा के लिए खतरा है।

जब अमेरिका किसी विदेशी राष्ट्रप्रमुख के सिर पर ‘इनाम’ घोषित करता है और अंततः उसे अपनी अदालत में ले आता है, तो वह दुनिया के बाकी नेताओं को एक कड़ा संदेश दे रहा होता है। यह संदेश है कि अमेरिका की पहुँच से कोई भी राष्ट्रपति महल दूर नहीं है। लेकिन क्या यह न्याय है? या यह केवल छोटे देशों को डराने की एक तकनीक है?

वाशिंगटन और कराकस के बीच सालों से ‘कोल्ड वॉर’ जैसा माहौल रहा है। अमेरिका ने हमेशा मादुरो को एक ‘अवैध तानाशाह’ माना है। ऐसे में मादुरो की गिरफ्तारी को लेकर दो विचारधाराएं आमने-सामने हैं अमेरिका का कहना है कि यह राजनीति नहीं, बल्कि कानून है। अपराध चाहे राष्ट्रपति ने किया हो या आम नागरिक ने, उसे सज़ा मिलनी चाहिए। नार्को-टेररिज्म एक ऐसा अपराध है जो सीमाओं को नहीं मानता। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) का एक नया तरीका है। जब अमेरिका किसी नेता को चुनाव या विद्रोह के ज़रिए नहीं हटा पाता, तो वह ‘कानूनी शिकंजे’ का इस्तेमाल करता है। यह सद्दाम हुसैन और मैनुअल नोरिएगा जैसे मामलों की याद दिलाता है।

यह इस पूरे विवाद का सबसे पेचीदा कानूनी सवाल है। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, किसी भी राष्ट्रप्रमुख को ‘डिप्लोमैटिक इम्यूनिटी’ (राजनायिक छूट) प्राप्त होती है। संप्रभुता का सिद्धांत कहता है कि हर देश अपने आप में स्वतंत्र है और कोई दूसरा देश उसके शासक पर मुकदमा नहीं चला सकता। लेकिन पिछले कुछ दशकों में ‘यूनिवर्सल ज्यूरिसडिक्शन’ (सार्वभौमिक क्षेत्राधिकार) की अवधारणा मज़बूत हुई है। इसके अनुसार, यदि कोई नेता मानवता के खिलाफ अपराध या नार्को-तस्करी जैसे काम करता है, तो उसे मिलने वाली छूट खत्म हो सकती है।

यदि आज अमेरिका वेनेजुएला के राष्ट्रपति पर मुकदमा चला रहा है, तो कल कोई दूसरा ताकतवर देश किसी तीसरे देश के नेता को उठा सकता है। यह ‘कानून के राज’ को ‘जंगल राज’ में बदल सकता है, जहाँ जिसके पास ज़्यादा ताकत होगी, वही तय करेगा कि कौन अपराधी है।

मादुरो को अमेरिका लाने की प्रक्रिया ‘प्रत्यर्पण’ की सामान्य कानूनी प्रक्रिया से कहीं ज़्यादा ‘जबरन ले जाने’ जैसी महसूस होती है। जब किसी देश की सहमति के बिना उसके पूर्व या वर्तमान नेता को किसी दूसरे देश की अदालत में पेश किया जाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन माना जा सकता है।

समर्थकों का कहना है कि यदि कोई अपराधी इतना शक्तिशाली है कि उसका अपना देश उस पर मुकदमा नहीं चला सकता, तो अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप ‘ज़रूरी न्याय’ (Necessary Justice) बन जाता है। लेकिन यह प्रक्रिया ‘सहमति’ के सिद्धांत को खत्म कर देती है। यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों की मर्यादा को तोड़ती है और देशों के बीच अविश्वास की खाई को और चौड़ा करती है।

यह दुनिया के सामने सबसे बड़ा नैतिक सवाल है। क्या अमेरिका के पास यह ‘दैवीय अधिकार’ है कि वह पूरी दुनिया का जज बन जाए? आदर्श रूप में, ऐसे मामलों की सुनवाई ICC जैसे संस्थानों में होनी चाहिए। लेकिन अमेरिका खुद ICC को पूरी तरह नहीं मानता। ऐसे में अमेरिका का अपनी ही अदालतों में विदेशी नेताओं पर मुकदमा चलाना उसकी ‘दोहरी नीति’ को उजागर करता है। क्या वेनेजुएला की जनता को यह हक नहीं था कि वे अपने नेता का फैसला खुद करें? जब न्याय बाहर से थोपा जाता है, तो उसे अक्सर ‘न्याय’ के बजाय ‘उत्पीड़न’ के रूप में देखा जाता है।

मादुरो के कोर्टरूम में पहुँचने से वेनेजुएला की गलियों में क्या बदल रहा है? किसी भी देश के शीर्ष नेता का इस तरह अपमानजनक पतन वहां गृहयुद्ध या बड़ी अराजकता पैदा कर सकता है। वेनेजुएला की जनता पहले से ही आर्थिक प्रतिबंधों और भूख से जूझ रही है। मादुरो पर चल रहा यह मुकदमा वहां की राजनीति को और अधिक ध्रुवीकृत (Polarize) कर सकता है। कुछ उन्हें शहीद मानेंगे, तो कुछ उन्हें अपराधी।

निकोलस मादुरो का मामला न्याय और राजनीति के बीच की उस धुंधली रेखा पर खड़ा है, जहाँ हर पक्ष की अपनी दलीलें हैं। यदि मादुरो वास्तव में ड्रग तस्करी के दोषी हैं, तो उन्हें सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन जिस तरीके से यह कार्रवाई की गई है, वह भविष्य के लिए गंभीर सवाल खड़े करती है।

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