
यह एक अत्यंत गंभीर और हृदयविदारक विषय है। देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, IIT कानपुर में हो रही छात्रों की निरंतर आत्महत्याएं केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि हमारी पूरी उच्च शिक्षा व्यवस्था के भीतर गहरी पैठी हुई सड़ांध का संकेत है।
भारत के ‘टेक्नोलॉजी पावरहाउस’ के रूप में विख्यात IIT कानपुर की दीवारों के भीतर से इन दिनों सफलता की कहानियों के बजाय सिसकियों की आवाजें सुनाई दे रही हैं। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि जिस संस्थान को 22 जनवरी को मानवाधिकार आयोग (NHRC) के समक्ष पिछले दो वर्षों में हुई छात्रों की मौतों पर अपनी सफाई पेश करनी थी, उसी सुनवाई से मात्र कुछ दिन पहले एक और शोध छात्र (Research Scholar) ने मौत को गले लगा लिया। इसके साथ ही, पिछले 24 महीनों में आत्महत्या करने वाले छात्रों का आंकड़ा बढ़कर नौ हो गया है। यह केवल एक सांख्यिकीय डेटा नहीं है; यह नौ उन युवाओं की कहानी है जो अपने घर-परिवार की उम्मीदें और देश का भविष्य थे।
जब किसी संस्थान में एक के बाद एक नौ मेधावी छात्र आत्महत्या करते हैं, तो वह ‘निजी समस्या’ नहीं रह जाती। मानवाधिकार आयोग ने दिसंबर 2024 में हुई एक छात्र की मृत्यु को पहले से ही 2024 की एक लंबित रिट याचिका के साथ जोड़ दिया था। अब, इस ताज़ा घटना ने आयोग को और अधिक सख्त कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। आयोग अब इस नवीनतम मृत्यु को भी अपनी जांच के दायरे में शामिल कर रहा है, जो IIT कानपुर के ‘मानसिक स्वास्थ्य सहायता तंत्र’ (Mental Health Support System) पर गंभीर कानूनी और नैतिक प्रश्न खड़े करता है।
इन नौ मौतों में शोध छात्रों की संख्या अधिक होना एक विशेष पैटर्न की ओर इशारा करता है। पीएचडी (PhD) का सफर एक लंबी और अकेली यात्रा होती है। यहाँ छात्र कई तरह के दबावों के बीच पिसता है अक्सर शोध छात्र अपनी लैब और डेटा के बीच इतने उलझ जाते हैं कि उनका सामाजिक जीवन शून्य हो जाता है। शोध छात्र पूरी तरह से अपने गाइड या प्रोफेसर पर निर्भर होता है। यदि यह संबंध तनावपूर्ण हो जाए, तो छात्र के पास कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं बचता। कई बार शोध में होने वाली देरी या ‘पब्लिकेशन’ का दबाव छात्र को मानसिक रूप से तोड़ देता है। 25 से 30 वर्ष की आयु में, जब साथी कॉर्पोरेट जगत में नाम कमा रहे होते हैं, शोध छात्र अपनी फेलोशिप और भविष्य की अनिश्चितता से लड़ रहा होता है।
मानवाधिकार आयोग का इस मामले में हस्तक्षेप यह स्पष्ट करता है कि अब इसे केवल ‘अकादमिक दबाव’ कहकर टाला नहीं जा सकता। आयोग की जांच अब इस बात पर केंद्रित होगी कि क्या संस्थान ने उन सुधारों को लागू किया जो पिछले साल की मौतों के बाद सुझाए गए थे?
कानूनी रूप से, अब संस्थान को यह साबित करना होगा कि उनके परिसर में मौजूद परामर्श केंद्र (Counseling Centers) केवल कागजों पर नहीं, बल्कि वास्तव में सक्रिय हैं। क्या वहां पर्याप्त काउंसलर्स हैं? क्या छात्रों की गोपनीयता सुनिश्चित की जाती है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या प्रशासन छात्रों की शिकायतों को सुनने के प्रति संवेदनशील है?
हमारी शिक्षा व्यवस्था ने ‘सफलता’ की एक ऐसी परिभाषा गढ़ दी है जिसमें ‘असफलता’ या ‘धीमी गति’ के लिए कोई स्थान नहीं है। IIT जैसे संस्थानों में प्रवेश पाना ही एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है, लेकिन वहां पहुँचने के बाद शुरू होती है एक ऐसी दौड़ जहाँ हर कोई एक-दूसरे को पछाड़ने में लगा है। छात्रों में यह डर रहता है कि यदि उन्होंने मानसिक तनाव की बात की, तो उन्हें ‘कमजोर’ समझा जाएगा या उनके करियर पर इसका असर पड़ेगा। अक्सर छात्र और प्रोफेसर के बीच केवल ‘काम’ का रिश्ता होता है, ‘संवाद’ का नहीं।
हर मौत के बाद संस्थान एक समिति बनाता है, कुछ दिनों तक कैंडल मार्च निकलते हैं, और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन नौ मौतें यह चीख-चीख कर कह रही हैं कि बुनियादी बदलाव नहीं हुए हैं। सुधारों के नाम पर केवल ‘योग सत्र’ या ‘मोटिवेशनल लेक्चर’ काफी नहीं हैं। हमें अपनी पूरी शैक्षणिक संस्कृति को बदलना होगा। प्रोफेसरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। छात्रों के लिए ‘गाइड’ बदलने का विकल्प आसान और बिना किसी डर के होना चाहिए। छात्रों के बीच ऐसे समूह होने चाहिए जहाँ वे बिना किसी झिझक के अपनी बात कह सकें। शोध के दौरान छात्रों के लिए अनिवार्य छुट्टियां और मनोरंजन के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
IIT कानपुर की ये घटनाएं पूरे देश के लिए एक चेतावनी हैं। यदि भारत के सबसे होनहार छात्र अपने ही परिसरों में सुरक्षित और खुश महसूस नहीं कर रहे हैं, तो हमारी डिग्रियों और रैंकिंग का कोई मूल्य नहीं है। मानवाधिकार आयोग की जांच और कानूनी दबाव शायद प्रशासन को कुछ कदम उठाने पर मजबूर करें, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब हम ‘छात्र’ को एक ‘इंसान’ की तरह देखना शुरू करेंगे, न कि केवल एक ‘रोल नंबर’ या ‘रैंक’ की तरह।



