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कक्षा 9 से 12 के विद्यार्थियों के लिए एनसीईआरटी का नया शैक्षणिक मॉड्यूल: कम्प्यूटेशनल थिंकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की स्कूली शिक्षा में शुरुआत
एनईपी 2020 के तहत आलोचनात्मक सोच, डेटा गोपनीयता और अनप्लग्ड शिक्षण पर मुख्य जोर

भारतीय स्कूली शिक्षा प्रणाली को भविष्य की डिजिटल आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने और छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने एक युगांतरकारी कदम उठाया है। परिषद ने माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर यानी कक्षा 9वीं से 12वीं तक के छात्र-छात्राओं के लिए कम्प्यूटेशनल थिंकिंग (Computational Thinking – CT) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence – AI) पर एक व्यापक प्रारंभिक मॉड्यूल आधिकारिक तौर पर जारी किया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के मूलभूत विजन के तहत तैयार किया गया यह नया पाठ्य-संसाधन पारंपरिक रटंत विद्या से हटकर बच्चों में गहन समस्या-समाधान क्षमता, रचनात्मकता और तकनीक के नैतिक व जिम्मेदार उपयोग की व्यावहारिक नींव तैयार करने के उद्देश्य से पेश किया गया है। इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह छात्रों को महज एआई टूल्स का निष्क्रिय उपभोक्ता बनाने के बजाय उन्हें यह समझने के लिए प्रेरित करती है कि यह तकनीक कैसे कार्य करती है, इसकी सीमाएं क्या हैं, और किसी स्वचालित उत्तर पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय मानवीय विवेक का उपयोग करना क्यों अपरिहार्य है।
परिषद द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, यह पाठ्यक्रम केवल कंप्यूटर साइंस के विशेष छात्रों के लिए नहीं है, बल्कि इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि सामान्य पृष्ठभूमि का कोई भी विद्यार्थी बिना किसी पूर्व कोडिंग या तकनीकी ज्ञान के इसे आसानी से समझ सके। शिक्षाविदों का मानना है कि इक्कीसवीं सदी की सूचना-आधारित अर्थव्यवस्था में डेटा, एल्गोरिदम और मशीन लर्निंग दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। सर्च इंजन पर जानकारी खोजने से लेकर सोशल मीडिया फीड, भाषा अनुवाद और ई-कॉमर्स की सिफारिशों तक, सब कुछ कृत्रिम बुद्धिमत्ता के एल्गोरिदम द्वारा संचालित हो रहा है। ऐसे समय में यदि नई पीढ़ी को केवल इन एप्लिकेशनों का इस्तेमाल करना सिखाया जाए और उनके अंतर्निहित तंत्र व नैतिक प्रभावों से अनभिज्ञ रखा जाए, तो यह डिजिटल दासता को जन्म दे सकता है। इसी खाई को पाटने के लिए एनसीईआरटी ने तकनीक को आलोचनात्मक विश्लेषण के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति को स्कूली पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बनाया है।
इस मॉड्यूल का मुख्य आधार यह सिद्धांत है कि मशीनें केवल उदाहरणों और डेटा से सीखती हैं, वे इंसानों की तरह चेतना या अंतरात्मा नहीं रखतीं। इसलिए जब कोई छात्र किसी जनरेटिव एआई मॉडल या चैटबॉट से संवाद करता है, तो उसे यह पहचानने में सक्षम होना चाहिए कि मशीन द्वारा दिया गया उत्तर सटीक तथ्यों पर आधारित है या फिर वह केवल शब्दों का एक ऐसा आकर्षक संयोजन है जो सुनने में तो बहुत प्रामाणिक लगता है किंतु वास्तव में भ्रामक या पूर्णतः असत्य हो सकता है। एनसीईआरटी ने पाठ्यक्रम में इस बात पर विशेष बल दिया है कि तकनीक सीखने का अर्थ मानव निर्णय और रचनात्मकता को तिलांजलि देना नहीं है। पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने वाली विशेषज्ञ समिति ने छात्रों के नाम अपने संदेश में स्पष्ट लिखा है कि यह कोई ऐसा विषय नहीं है जिसे परीक्षा पास करने के लिए कंठस्थ किया जाए, बल्कि यह एक ऐसी मानसिक आदत और जीवन-कौशल है जिसका दैनिक जीवन में निरंतर अभ्यास किया जाना चाहिए।
एनसीईआरटी ने इस नए शिक्षण मॉड्यूल को पांच परस्पर जुड़े हुए और सुनियोजित चरणों में विभाजित किया है, जो विद्यार्थियों को सरल उदाहरणों से लेकर जटिल नैतिक अवधारणाओं तक का सफर तय कराते हैं। पहले चरण में छात्रों को यह अवलोकन करना सिखाया जाता है कि एआई किस प्रकार पहले से ही उनके आसपास के परिवेश में मौजूद है। इसमें एक विशिष्ट व्यावहारिक गतिविधि ‘एआई डायरी’ रखी गई है, जहां विद्यार्थी अपने दैनिक जीवन में आने वाले उन सभी उदाहरणों को दर्ज करते हैं जो स्वचालित प्रणालियों या स्मार्ट सुझावों से जुड़े हैं। इस चरण का उद्देश्य छात्रों को यह अंतर समझाना है कि कौन सी प्रणाली केवल पूर्व-निर्धारित नियमों का पालन करने वाला सामान्य ऑटोमेशन है और कौन सी प्रणाली वास्तविक रूप से डेटा के आधार पर निर्णय लेने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता है।
पाठ्यक्रम के दूसरे चरण में मशीन लर्निंग के बुनियादी सिद्धांतों को अत्यंत सरल और सहज भाषा में समझाया गया है। इसमें गणितीय या कोड की जटिलताओं में उलझने के बजाय यह बताया गया है कि कंप्यूटर किस तरह बड़े डेटा सेट से पैटर्न की पहचान करते हैं और उदाहरणों के माध्यम से नए निष्कर्षों तक पहुंचते हैं। तीसरे चरण में उन परिस्थितियों का विश्लेषण किया गया है जब एआई गलतियां करता है। इस भाग में डीपफेक, फेक न्यूज, सूचनाओं का हेरफेर और एल्गोरिदम के पूर्वाग्रह (एआई बायस) जैसे समकालीन ज्वलंत मुद्दों को शामिल किया गया है। छात्रों को सिखाया जाता है कि यदि कोई एल्गोरिदम पक्षपातपूर्ण ऐतिहासिक डेटा पर प्रशिक्षित किया गया है, तो उसके द्वारा दिए जाने वाले परिणाम भी भेदभावपूर्ण हो सकते हैं। इसके अंतर्गत ‘फाइव चेक्स’ यानी पांच-चरणीय सत्यापन प्रणाली पेश की गई है, जिसके माध्यम से छात्र सूचना के स्रोत, दावे की प्रकृति, साक्ष्यों की तुलना, व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के प्रभाव और तकनीकी भाषा के पीछे छिपे वास्तविक तथ्यों की निष्पक्ष जांच करना सीखते हैं।
मॉड्यूल का चौथा चरण नागरिक अधिकारों, डेटा गोपनीयता और व्यक्तिगत सुरक्षा पर केंद्रित है। आज के युग में जब युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और विभिन्न मोबाइल ऐप्स पर अत्यधिक सक्रिय है, उनकी व्यक्तिगत जानकारी, तस्वीरें, लोकेशन और ब्राउजिंग हिस्ट्री लगातार एकत्र की जा रही है। इस चरण के तहत विद्यार्थियों को व्यावहारिक अभ्यास कराया जाता है कि वे अपने द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोकप्रिय ऐप्स की प्राइवेसी पॉलिसी को पढ़ें और समझें। उन्हें यह पड़ताल करना सिखाया जाता है कि कोई ऐप उनसे किस प्रकार का डेटा मांग रहा है, उस डेटा का व्यावसायिक उपयोग क्या है, क्या वह डेटा किसी तीसरे पक्ष को बेचा जा रहा है, और यदि वे चाहें तो उस प्लेटफॉर्म से अपना खाता और व्यक्तिगत डेटा हमेशा के लिए कैसे हटा सकते हैं। यह समझ छात्रों को डिजिटल युग में अपने विधिक अधिकारों और डिजिटल पदचिह्नों के प्रति जागरूक बनाती है।
पांचवां और अंतिम चरण आधुनिक एआई उपकरणों के साथ कार्य करने की व्यावहारिक पद्धतियों पर आधारित है। इसमें प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग की बुनियादी समझ दी गई है कि किसी तकनीक से सही उत्तर पाने के लिए सटीक और स्पष्ट प्रश्न कैसे पूछे जाएं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एनसीईआरटी ने यहां दो दृष्टिकोणों के बीच स्पष्ट रेखा खींची है—पहला ‘सहायक दृष्टिकोण’ और दूसरा ‘प्रतिस्थापन दृष्टिकोण’। सहायक दृष्टिकोण के तहत छात्र अपना मौलिक चिंतन स्वयं करते हैं और एआई का उपयोग केवल अपने शोध को समृद्ध करने, नए विचार खोजने या प्रूफरीडिंग जैसी सहायता के लिए करते हैं। इसके विपरीत, प्रतिस्थापन दृष्टिकोण में विद्यार्थी अपनी सोचने की क्षमता को दरकिनार कर एआई को अपना गृहकार्य या प्रोजेक्ट बनाने का पूरा ठेका दे देते हैं। मॉड्यूल छात्रों को चेतावनी देता है कि प्रतिस्थापन का मार्ग उनके बौद्धिक विकास और सीखने की प्रक्रिया को पूरी तरह कुंद कर देता है, इसलिए तकनीक को केवल सहयोगी के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
इस पूरी शैक्षणिक पहल का सबसे समावेशी और व्यावहारिक पहलू इसका शिक्षण मॉडल है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जहां एक ओर अत्याधुनिक कंप्यूटर लैब और हाई-स्पीड इंटरनेट से लैस आधुनिक निजी व केंद्रीय विद्यालय हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में बुनियादी डिजिटल ढांचे की भारी कमी है। इस व्यापक डिजिटल विभाजन को पाटने के लिए एनसीईआरटी ने इस पाठ्यक्रम को पूरी तरह ‘अनप्लग्ड’ यानी बिना किसी डिजिटल उपकरण या कंप्यूटर के भी पढ़ाए जाने योग्य बनाया है। इसके तहत कक्षा में शिक्षक बोर्ड गेम्स, कार्ड्स, पहेलियों, रोल-प्ले और कागज-पेंसिल की सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से कम्प्यूटेशनल थिंकिंग के स्तंभों—जैसे डीकंपोजिशन, पैटर्न रिकॉग्निशन, एब्स्ट्रैक्शन और एल्गोरिदम डिजाइन—को सरलता से सिखा सकते हैं।
जहाँ डिजिटल संसाधन उपलब्ध हैं, वहाँ शिक्षक ‘फुल मोड’ या ‘टीचर डेमोंस्ट्रेशन मोड’ में स्क्रीन और सॉफ्टवेयर का उपयोग करके प्रैक्टिकल डेमोंस्ट्रेशन दे सकते हैं। किंतु जहां केवल ब्लैकबोर्ड उपलब्ध है, वहां भी शिक्षक विद्यार्थियों को यह समझा सकते हैं कि किसी जटिल समस्या को छोटे तार्किक हिस्सों में कैसे बांटा जाता है और किसी निश्चित लक्ष्य तक पहुंचने के लिए क्रमबद्ध निर्देश कैसे तैयार किए जाते हैं। इस पद्धति से यह सुनिश्चित होता है कि देश के सबसे अंतिम छोर पर स्थित सरकारी प्राथमिक या माध्यमिक विद्यालय का विद्यार्थी भी अपनी आर्थिक और ढांचागत सीमाओं के बावजूद तार्किक और विश्लेषणात्मक चिंतन की उस मुख्यधारा से वंचित न रहे, जो भविष्य के रोजगारों के लिए आवश्यक होने जा रही है।
इसके अलावा, छात्रों को अपनी सीखने की यात्रा को दर्ज करने के लिए एक ‘क्यूरियस नोटबुक’ बनाने के लिए प्रेरित किया गया है। यह नोटबुक केवल नोट्स लिखने की सामान्य कॉपी नहीं है, बल्कि यह एक तरह का विचारशील पोर्टफोलियो है जहां विद्यार्थी कक्षा की गतिविधियों के बाद अपने अंतर्मन में उपजे सवालों, नई तकनीकी खोजों, संदेहों और नैतिक दुविधाओं को दर्ज करते हैं। इस प्रकार का स्व-मूल्यांकन छात्रों में आत्म-चिंतन की आदत को पुष्ट करता है और उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि कक्षा में सवाल पूछना किसी भी तकनीक की अंधी स्वीकार्यता से कहीं अधिक मूल्यवान है।
शिक्षा और बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञों ने एनसीईआरटी के इस समयोचित कदम का व्यापक स्वागत किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब से चैटजीपीटी और अन्य जनरेटिव एआई टूल्स आम जनमानस तक पहुंचे हैं, तब से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में साहित्यिक चोरी (Plagiarism), गृहकार्य में नकल और छात्रों की स्वतंत्र लेखन क्षमता में गिरावट को लेकर गहरी चिंताएं जताई जा रही थीं। कई अंतरराष्ट्रीय स्कूलों ने जहां इन टूल्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का रास्ता चुना था, वहीं भारत ने प्रतिबंध के बजाय जागरूकता और जिम्मेदारी की राह चुनी है। तकनीक को प्रतिबंधित करना कभी भी एक स्थायी समाधान नहीं हो सकता क्योंकि छात्र घर पर या मोबाइल के जरिए इसका उपयोग कर ही लेते हैं। ऐसे में सबसे विवेकपूर्ण रणनीति यही है कि उन्हें कक्षा में ही यह सिखाया जाए कि इस दोधारी तलवार का उपयोग अपनी बौद्धिक क्षमता को निखारने के लिए कैसे किया जाए और इसके संभावित खतरों से कैसे सुरक्षित रहा जाए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मूल ध्येय भारतीय युवाओं को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी बनाना और उन्हें बहुविषयक सोच से लैस करना है। कम्प्यूटेशनल थिंकिंग केवल कंप्यूटर साइंस के क्षेत्र तक सीमित कौशल नहीं है; यह एक ऐसी संज्ञानात्मक विधा है जो गणित, भौतिकी, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और यहां तक कि भाषा शिक्षण में भी समस्याओं का तार्किक समाधान ढूंढने में समान रूप से सहायक सिद्ध होती है। जब एक छात्र किसी भी समस्या को व्यवस्थित रूप से वर्गीकृत करना और उसकी विसंगतियों को पहचानना सीख जाता है, तो वह जीवन के हर क्षेत्र में एक परिपक्व और संतुलित निर्णयकर्ता बनता है।
आने वाले महीनों में इस मॉड्यूल के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एनसीईआरटी और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषदों (SCERTs) द्वारा शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यशालाएं और ओरिएंटेशन प्रोग्राम आयोजित किए जाएंगे। शिक्षकों को इस बात के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाएगा कि वे कक्षा में व्याख्यान देने वाले पारंपरिक गुरु के बजाय एक मार्गदर्शक और सूत्रधार की भूमिका निभाएं, जो छात्रों के मन में कौतूहल जगाए और उन्हें खुद प्रयोग करके निष्कर्ष तक पहुंचने का अवसर दे।



