क्या भारत विकास और रोज़गार के बीच तालमेल खो रहा है?
कम रोज़गार की हकीकत: अनौपचारिकता और असुरक्षा

जब भी आधिकारिक आंकड़े सामने आते हैं, हम खुशी से झूम उठते हैं भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हमारा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 7%, 8%, या इससे भी अधिक की दर से बढ़ रहा है। यह गति देश के उज्जवल भविष्य का संकेत देती है। लेकिन इस जश्न के बीच, एक गहरी, असहज करने वाली हकीकत मौजूद है नौकरियाँ कहाँ हैं?
आज हर युवा के मन में यही सवाल है। हमारे कॉलेज उच्च डिग्री वाले लाखों इंजीनियर, एमबीए और स्नातक पैदा कर रहे हैं, लेकिन उन्हें वह वेतन, सुरक्षा और करियर की प्रगति नहीं मिल रही है जिसके वे हकदार हैं। अर्थशास्त्री इसे “विकास और रोज़गार का तालमेल टूटना” या सीधे शब्दों में, “रोज़गार रहित विकास” कहते हैं।
क्या हमारा विकास इंजन एक ऐसी सुंदर, तेज़ कार की तरह है, जिसके पहिए ही नहीं हैं जो ज़मीन पर दौड़ तो रही है, पर आम आदमी को आगे नहीं ले जा पा रही है। यह समस्या केवल आर्थिक नहीं है; यह एक सामाजिक, राजनीतिक और जनसांख्यिकीय संकट है जो हमारी राष्ट्रीय स्थिरता और भविष्य को चुनौती दे रहा है।
सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत का जीडीपी विकास आकस्मिक नहीं है। यह कुछ मजबूत स्तंभों पर टिका है सरकार सड़कों, बंदरगाहों, रेलवे और डिजिटल बुनियादी ढांचे पर भारी पूंजीगत व्यय कर रही है। यह निवेश स्टील, सीमेंट और निर्माण जैसे क्षेत्रों को सीधे बढ़ावा देता है। यह विकास तात्कालिक रूप से जीडीपी को तो बढ़ाता है, लेकिन निर्माण क्षेत्र में रोज़गार अक्सर अस्थायी और निम्न वेतन वाला होता है।
आईटी, वित्तीय सेवाएँ, और डिजिटल कॉमर्स भारत के जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान देते हैं। यह क्षेत्र अत्यधिक कुशल और उच्च वेतन वाली नौकरियाँ पैदा करता है, लेकिन इसकी संख्या सीमित होती है। यह क्षेत्र हमारी विशाल अर्ध-कुशल या ग्रामीण आबादी को अवशोषित नहीं कर सकता।
जीएसटी और डिजिटलीकरण ने अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से को औपचारिक बना दिया है, जिससे आंकड़े बेहतर दिखते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नई नौकरियाँ पैदा हुई हैं, बल्कि यह है कि पुरानी, अनौपचारिक नौकरियाँ अब रिकॉर्ड पर आ गई हैं और कई छोटी अनौपचारिक नौकरियाँ खत्म भी हो गई हैं।
जीडीपी की चकाचौंध के नीचे रोज़गार के आंकड़े देश की असली तस्वीर पेश करते हैं। भारत में युवा बेरोज़गारी दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है, खासकर शिक्षित युवाओं में। एक इंजीनियर या एमबीए स्नातक के लिए अपनी योग्यता से कम वेतन वाली या असंबद्ध नौकरी करना अल्प-रोज़गार कहलाता है। यह केवल आय की हानि नहीं है, यह प्रतिभा और आत्मविश्वास की हानि है।
दुनिया के कई विकासशील देशों के विपरीत, भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर चिंताजनक रूप से कम रही है। यह न केवल आर्थिक असमानता को बढ़ाता है, बल्कि देश की आधी क्षमता को अर्थव्यवस्था से बाहर रखता है। महिलाओं के लिए सुरक्षित, लचीले और सम्मानजनक रोज़गार के अवसरों की कमी इस विफलता का एक बड़ा कारण है।
स्विगी, ज़ोमैटो, ओला, उबर इन प्लेटफॉर्म्स ने लाखों लोगों को ‘गिग वर्कर’ के रूप में रोज़गार दिया है। यह तेज़ी से बढ़ती नौकरियों का स्रोत है। लेकिन ये नौकरियाँ अक्सर अस्थायी, असुरक्षित होती हैं, जिनमें सामाजिक सुरक्षा का अभाव होता है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जो व्यक्ति को रोज़गार तो देती है, पर उसे आर्थिक स्थिरता नहीं देती।
दुनिया भर में, बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन का एकमात्र सिद्ध इंजन विनिर्माण क्षेत्र रहा है। चीन और दक्षिण कोरिया ने लाखों लोगों को खेती से निकालकर फैक्ट्रियों में लगाकर ही गरीबी दूर की। भारत की ‘मेक इन इंडिया’ पहल के बावजूद, विनिर्माण क्षेत्र हमारी ज़रूरत के हिसाब से नौकरियाँ पैदा करने में विफल रहा है। यह जीडीपी में तो योगदान देता है, लेकिन नौकरियाँ अभी भी सेवा या कृषि क्षेत्र से आती हैं।
विकास और रोज़गार के बीच तालमेल टूटने के कारण गहरे और संरचनात्मक हैं, जो हमारी शिक्षा, औद्योगिक नीति और श्रम कानूनों में निहित हैं। आज का विकास पुरानी पद्धतियों से अलग है। नई फैक्ट्रियाँ और सेवा केंद्र, पहले की तुलना में कम लोगों के साथ अधिक काम कर सकते हैं। AI, रोबोटिक्स और डेटा एनालिटिक्स उत्पादन और सेवाओं को तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन श्रम की मांग को कम कर रहे हैं। यह “प्रौद्योगिकी प्रेरित बेरोज़गारी” एक वैश्विक घटना है, लेकिन भारत जैसे श्रम-अधिशेष देश के लिए यह एक बड़ा खतरा है।
हमारी शिक्षा प्रणाली उद्योग की ज़रूरतों के अनुरूप कौशल प्रदान करने में विफल रही है। इंजीनियरिंग या आर्ट्स की डिग्री वाले लाखों युवा नौकरी के लिए आवेदन करते हैं, लेकिन कंपनियों का कहना है कि वे ‘रोज़गार योग्य’ नहीं हैं। उन्हें नौकरी के लिए आवश्यक विशेष कौशल नहीं आते। यह कौशल अंतर ही रोज़गार रहित विकास के लिए ज़िम्मेदार है।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम भारत में सबसे बड़े रोज़गार प्रदाता हैं। वे कुल रोज़गार का लगभग 80% हिस्सा संभालते हैं। लेकिन वे नोटबंदी, जीएसटी के जटिल अनुपालन और कोविड महामारी जैसे झटकों से उबर नहीं पाए हैं। बड़े कॉर्पोरेट्स को तो सरकारी समर्थन और आसान कर्ज मिल जाता है, लेकिन MSMEs को पूंजी, क्रेडिट और नियामक राहत की सख्त ज़रूरत होती है, जो उन्हें पर्याप्त रूप से नहीं मिल पाती।
भारत में श्रम कानून अक्सर जटिल होते हैं, जिससे बड़ी कंपनियाँ बड़े पैमाने पर औपचारिक कर्मचारियों को नियुक्त करने से कतराती हैं। वे स्थायी कर्मचारियों को रखने के बजाय अस्थायी, संविदा या गिग वर्कर्स पर निर्भर रहना पसंद करती हैं। ये जटिल कानून छोटे व्यवसायों के लिए एक बड़ी बाधा हैं और औपचारिक, गुणवत्तापूर्ण रोज़गार सृजन को हतोत्साहित करते हैं।
यह ‘विकास-रोज़गार डिस्कनेक्ट’ केवल सांख्यिकीय समस्या नहीं है; इसके दूरगामी और विनाशकारी सामाजिक परिणाम हैं। भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी आर्थिक संपत्ति है। लेकिन अगर हम इस युवा शक्ति को गुणवत्तापूर्ण रोज़गार नहीं दे पाए, तो यह लाभांश जल्दी ही जनसांख्यिकीय अभिशाप बन जाएगा यानी, बड़ी संख्या में निराश, हताश और बेरोजगार युवा, जो सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का कारण बनेंगे।
रोज़गार रहित विकास से लाभ केवल पूंजीपतियों और उच्च-कुशल श्रमिकों तक ही सीमित रहता है। इससे देश में आर्थिक असमानता तेज़ी से बढ़ती है। जीडीपी बढ़ रही है, लेकिन उसका लाभ आम आदमी तक नहीं पहुँच रहा है। यह स्थिति सामाजिक सद्भाव के लिए खतरनाक है। जब उच्च शिक्षित युवाओं को देश में अवसर नहीं मिलते, तो वे बेहतर वेतन, करियर की संभावनाओं और जीवन की गुणवत्ता की तलाश में विदेशों की ओर रुख करते हैं। यह ‘प्रतिभा पलायन’ भारत की सबसे अच्छी मानव पूंजी को बर्बाद करता है।
भारत को कपड़ा, जूते, खिलौने और हल्के इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे श्रम-सघन विनिर्माण क्षेत्रों को बढ़ावा देना चाहिए। ये क्षेत्र बड़ी संख्या में महिला श्रमिकों को औपचारिक रोज़गार प्रदान कर सकते हैं। हमें वियतनाम, बांग्लादेश और चीन के सफल मॉडलों का अध्ययन करना होगा, जिन्होंने निर्यात-आधारित विनिर्माण के माध्यम से लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला।
सरकार को उद्योग की भागीदारी के साथ कौशल विकास कार्यक्रमों को फिर से डिज़ाइन करना होगा। ‘स्किल इंडिया’ को केवल प्रमाणपत्र बाँटने के बजाय, उद्योगों की मांग के अनुसार प्रशिक्षण देने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। कॉलेज और यूनिवर्सिटी पाठ्यक्रम को उद्योग इंटर्नशिप और व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश न केवल मानव पूंजी में सुधार करता है, बल्कि ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ की नौकरियाँ स्थानीय और गैर-निर्यात योग्य होती हैं। इन क्षेत्रों में निवेश से स्थायी और गुणवत्तापूर्ण रोज़गार सृजित होते हैं। भारत आज एक चौराहे पर खड़ा है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति है, और हमारे पास एक शक्तिशाली आर्थिक इंजन भी है। लेकिन अगर ये दोनों आपस में नहीं जुड़ते हैं, तो हमारा भविष्य जोखिम में है।



