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चकाचौंध के पीछे की दरारें: विजय और संगीता के संबंधों के अंत का विधिक एवं सामाजिक विश्लेषण

27 वर्षों का सफर और आधुनिक वैवाहिक चुनौतियां

तमिल सिनेमा के शीर्ष अभिनेता और ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ (TVK) के संस्थापक-अध्यक्ष विजय और उनकी पत्नी संगीता सोरनालिंगम के बीच 27 वर्ष पुराने वैवाहिक जीवन के अंत की खबर ने न केवल दक्षिण भारतीय फिल्म जगत, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी एक बड़ी चर्चा छेड़ दी है। यह मामला केवल दो व्यक्तियों के अलग होने का नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक छवि, वैवाहिक संस्था की जटिलताओं और आधुनिक भारत में ‘विशेष विवाह अधिनियम’ (Special Marriage Act) के कानूनी प्रावधानों के संगम का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

25 अगस्त, 1999 को जब विजय और संगीता का विवाह हुआ, तो इसे एक ‘आदर्श विवाह’ (Fairytale Marriage) के रूप में देखा गया था। एक प्रशंसक और एक सुपरस्टार की प्रेम कहानी ने दशकों तक लोगों को प्रेरित किया। उनके दो बच्चे, जेसन संजय और दिव्या शाशा, उनके इस सफर के साक्षी रहे। लेकिन अब, 27 वर्षों के लंबे साथ के बाद, संगीता सोरनालिंगम द्वारा दायर तलाक की याचिका यह संकेत देती है कि पर्दे पर ‘हैप्पी एंडिंग’ दिखाने वाले सितारों के अपने जीवन में भी ऐसी चुनौतियां आती हैं जिनका समाधान केवल ‘विच्छेद’ (Dissolution) में ही मिलता है।

संगीता सोरनालिंगम द्वारा दायर याचिका विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत है। भारत में यह अधिनियम उन जोड़ों के लिए बनाया गया है जो अपनी शादी को धार्मिक रीति-रिवाजों से परे नागरिक प्रक्रिया के माध्यम से पंजीकृत करना चाहते हैं या जो अलग-अलग धार्मिक/सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आते हैं। इस कानून की धारा 27 तलाक के आधारों (Grounds for Divorce) को परिभाषित करती है। याचिका में जिन आधारों का उल्लेख किया गया है, वे अत्यंत गंभीर और व्यक्तिगत हैं हालाँकि भारत में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यभिचार को एक ‘अपराध’ (Section 497 IPC) के रूप में समाप्त कर दिया है, लेकिन यह अभी भी तलाक के लिए एक वैध ‘नागरिक आधार’ (Civil Ground) बना हुआ है। कानून की नजर में क्रूरता केवल शारीरिक नहीं होती। ‘मानसिक क्रूरता’ जिसमें अपमान, उपेक्षा, या ऐसा व्यवहार शामिल है जिससे दूसरे साथी का साथ रहना असंभव हो जाए तलाक के सबसे मजबूत आधारों में से एक है।

एक अभिनेता और एक उभरते हुए राजनेता के रूप में, विजय का जीवन ‘सबकी संपत्ति’ (Public Property) बन चुका है। ऐसे में, उनके व्यक्तिगत जीवन की कोई भी हलचल उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता और सामाजिक प्रभाव पर असर डालती है। विजय ने हाल ही में अपनी पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ (TVK) के माध्यम से तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय कदम रखे हैं। अक्सर भारत में राजनेताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि उनका पारिवारिक जीवन “आदर्श” हो। संगीता द्वारा लगाए गए आरोप उनके विरोधियों को राजनीतिक मौका दे सकते हैं।

दक्षिण भारत में अभिनेता केवल कलाकार नहीं, बल्कि ‘देवता’ की तरह पूजे जाते हैं। जब विजय जैसा सितारा व्यक्तिगत विवादों में घिरता है, तो उनके लाखों प्रशंसकों के लिए यह एक भावनात्मक झटका होता है। यह प्रशंसक अक्सर यह भूल जाते हैं कि उनका ‘थलापति’ (Thalapathy) भी एक मनुष्य है, जो मानवीय त्रुटियों और संघर्षों से मुक्त नहीं है।

इस हाई-प्रोफाइल मामले में सबसे बड़ी चुनौती ‘निजता के अधिकार’ (Right to Privacy) की रक्षा करना है। मीडिया में अक्सर यह दलील दी जाती है कि चूंकि जनता अभिनेता को प्यार और पैसा देती है, इसलिए उन्हें उनके जीवन के बारे में जानने का ‘हक’ है। लेकिन संविधान का अनुच्छेद 21 स्पष्ट रूप से हर नागरिक को निजता का अधिकार देता है। ‘व्यभिचार’ और ‘क्रूरता’ जैसे शब्दों का उपयोग मीडिया में ‘क्लिकबेट’ के रूप में किया जा रहा है। एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह किसी के दुखद वैवाहिक अलगाव को मनोरंजन का साधन न बनाए।

यह तलाक इस बात का भी परिचायक है कि आधुनिक समय में विवाह की परिभाषा और उसकी सहनशक्ति की सीमाएं बदल रही हैं।पहले के समय में शादियों को 25-30 साल बीत जाने के बाद ‘अटूट’ माना जाता था। लोग बच्चों के लिए या सामाजिक लोकलाज के कारण समझौता कर लेते थे। लेकिन आज, संगीता सोरनालिंगम जैसी महिलाएं व्यक्तिगत गरिमा और मानसिक शांति को ‘समझौते’ से ऊपर रख रही हैं। अक्सर बड़ी सफलताओं के बाद सितारों के जीवन में खालीपन और दूरियां आ जाती हैं। विजय की व्यस्तता, उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और फिल्मी व्यस्तताओं ने शायद इस रिश्ते के तार को कमजोर कर दिया हो।

तलाक की प्रक्रिया में सबसे अधिक प्रभावित बच्चे होते हैं। हालाँकि जेसन संजय और दिव्या शाशा अब बच्चे नहीं रहे, लेकिन माता-पिता का सार्वजनिक रूप से अलग होना और उन पर लगे आरोपों का बाजार में चर्चा होना किसी भी संतान के लिए पीड़ादायक होता है। 27 साल के विवाह के बाद संपत्ति का बँटवारा और बच्चों के भविष्य की योजनाएं कानूनी रूप से बहुत जटिल हो जाती हैं। विजय की भारी संपत्ति और संगीता का अपना व्यक्तिगत आधार इस कानूनी लड़ाई को और लंबा खींच सकता है।

विजय और संगीता का मामला हमें यह सिखाता है कि रिश्ते की लंबाई (Quantity) हमेशा उसकी गहराई (Quality) की गारंटी नहीं होती। यदि दो लोग दशकों तक साथ रहने के बाद भी शांति नहीं पा सकते, तो कानूनी रूप से अलग होना ही एकमात्र स्वस्थ विकल्प बचता है। एक समाज के रूप में, हमें विजय और संगीता को वह स्थान (Space) देना चाहिए जहाँ वे अपनी समस्याओं को गरिमा के साथ सुलझा सकें। आरोप चाहे जो भी हों, वे न्यायालय के विचाराधीन हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम उनकी कला और उनके सामाजिक योगदान को उनके निजी जीवन के संकट से अलग करके देखें।

किसी भी घर का टूटना केवल दो लोगों का अलग होना नहीं है, बल्कि एक साझा इतिहास का अंत है। हमें इस अंत पर सहानुभूति रखनी चाहिए, न कि जिज्ञासा। विजय का राजनीतिक भविष्य और संगीता का निजी जीवन अब एक नई दिशा में मुड़ेगा, और इस संक्रमण काल में उनकी निजता का सम्मान करना ही उनके प्रति प्रशंसकों का असली सम्मान होगा।

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