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जल संकट की दहलीज पर भारत: सूखती नदियाँ और राष्ट्रीय जल नीति की आवाज

कुदरत का वार और इंसान की भूल

भारत एक ऐसा देश जहाँ जल को जीवन, पवित्रता और माँ का दर्जा दिया गया है। गंगा की सौगंध से लेकर कावेरी के विवाद तक, पानी हमारी पहचान का मूल आधार रहा है। लेकिन आज, यह प्राचीन आस्था खतरे में है। हमारी बड़ी-बड़ी नदियाँ, जो सदियों से जीवन का प्रवाह रही हैं, पतली धाराओं, सूखे गड्ढों और रेतीले किनारों में सिमटती जा रही हैं। यह नज़ारा केवल प्रकृति का नहीं, बल्कि हमारी लापरवाही और अदूरदर्शी नीतियों का परिणाम है।

जब देश के मुख्य जलस्रोत सूखने लगें, तो यह केवल सूखा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आपदा की पूर्व सूचना होती है। यह स्थिति हमें मजबूर करती है कि हम खुद से पूछें क्या हम अब भी पानी जैसे जटिल और सीमा रहित मुद्दे को अलग-अलग राज्यों के छोटे-छोटे फैसलों के भरोसे छोड़ सकते हैं? या, क्या अब वह समय आ गया है कि हम इसे एक “राष्ट्रीय मुद्दा” मानकर, एक व्यापक और शक्तिशाली राष्ट्रीय जल नीति तैयार करें?

नदी के घटते जलस्तर के लिए केवल भगवान इंद्र (वर्षा) को दोष देना अब काफी नहीं है। इसके पीछे इंसानों की गैर-जिम्मेदाराना हरकतें और त्रुटिपूर्ण प्रबंधन जिम्मेदार है।

जलवायु परिवर्तन ने नदियों के स्वभाव को पूरी तरह से बदल दिया है। मानसून अब भरोसेमंद नहीं रहा; या तो भयानक बारिश आती है जो सब बहा ले जाती है, या सूखा पड़ता है जो धरती को तपा देता है। हिमालय की नदियाँ, जो ग्लेशियरों के पिघलने से पोषित थीं, अब अस्थायी रूप से उफन रही हैं। लेकिन वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लेशियर तेज़ी से घट रहे हैं, और भविष्य में इन नदियों का मुख्य जलस्रोत कमज़ोर हो जाएगा। प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ, जो मॉनसून पर आश्रित हैं, बारिश की अनिश्चितता के चलते साल के बड़े हिस्से में केवल सूखी रेत बनकर रह जाती हैं।

भारत दुनिया भर में ज़मीन के नीचे के पानी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। हमारी खेती-बाड़ी का बड़ा हिस्सा और हमारे शहरों का पीने का पानी इसी पर निर्भर है। समस्या यह है कि ज़मीन के ऊपर का पानी और ज़मीन के नीचे का पानी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब किसान बिजली की सब्सिडी या मुफ्तखोरी के कारण अंधाधुंध ट्यूबवेल चलाते हैं, तो वे केवल भूजल नहीं खींच रहे होते हैं, बल्कि वे अप्रत्यक्ष रूप से नदियों के पानी को भी कम कर रहे होते हैं। जैसे ही भूजल का स्तर खतरनाक रूप से नीचे जाता है, नदी के बहाव को बनाए रखने वाला प्राकृतिक सहारा खत्म हो जाता है और नदी का तल सूख जाता है।

हमारी कृषि नीतियाँ पानी की बर्बादी को बढ़ावा देती हैं। धान और गन्ना जैसी पानी पीने वाली फसलों को ऐसे इलाकों में भी भारी मात्रा में उगाया जाता है जहाँ पानी की कमी है। इसके अलावा, खेत में पानी भरने की पुरानी तकनीकें पानी की 50% से ज़्यादा बर्बादी करती हैं। सरकार की नीतियाँ, जैसे कि कुछ फसलों पर अधिक एमएसपी और सस्ती या मुफ्त बिजली, किसानों को पानी बचाने के बजाय उसे बेतहाशा खर्च करने के लिए प्रेरित करती हैं।

तेजी से फैलता शहरीकरण नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्रों पर कब्जा कर रहा है। नदियों के किनारे निर्माण, अवैध रेत खनन, और बिना उपचारित औद्योगिक तथा सीवेज कचरे को सीधे नदी में डालना नदियों को एक गंदे नाले में बदल रहा है। पक्की सड़कों और कंक्रीट के फैलाव के कारण बारिश का पानी ज़मीन में सोख नहीं पाता, जिससे नदियाँ और भूजल दोनों रिचार्ज नहीं हो पाते।

आज, हमारे पास जल प्रबंधन के लिए कई मंत्रालय और योजनाएँ हैं, लेकिन वे छोटे-छोटे हिस्सों में बँटकर काम कर रही हैं, जिससे बड़ी तस्वीर का समाधान नहीं हो पा रहा है। भारत के संविधान में ‘पानी’ को राज्य सूची का विषय माना गया है। यह एक प्रशासनिक चुनौती है क्योंकि नदियाँ राजनीतिक सीमाओं का सम्मान नहीं करतीं। कावेरी, कृष्णा, गोदावरी ये नदी बेसिन कई राज्यों से होकर गुज़रते हैं। जब हर राज्य अपने हिस्से का पानी खींचने की होड़ में लग जाता है, तो विवादों का जन्म होता है। ये विवाद अक्सर सालों तक अदालतों में उलझे रहते हैं, जिससे न तो कोई समाधान निकलता है और न ही नदी की सेहत सुधर पाती है। समन्वय और सहमति के बिना, जल का सही प्रबंधन असंभव है।

हमारी वर्तमान व्यवस्था में यह स्पष्ट नहीं है कि पानी का उपयोग पहले किस चीज़ के लिए किया जाए पीने के लिए, खेती के लिए, या उद्योगों के लिए। पीने के पानी की ज़रूरत हर किसी से ऊपर होनी चाहिए, लेकिन अक्सर राजनीतिक दबाव के कारण सिंचाई को पहली प्राथमिकता मिल जाती है, भले ही इसका मतलब शहरों में पानी की कमी हो। जब प्राथमिकताएँ स्पष्ट और कानूनी रूप से तय नहीं होती हैं, तो हर आपदा की स्थिति में सबसे कमजोर तबका पीड़ित होता है।

सबसे बड़ी विफलता यह है कि हम धरती के ऊपर के पानी (नदी, झील) और धरती के नीचे के पानी को अलग-अलग इकाइयों के रूप में प्रबंधित करते हैं। यह वैज्ञानिक रूप से मूर्खतापूर्ण है क्योंकि वे एक ही जलचक्र का हिस्सा हैं। एक एकीकृत नीति के अभाव में, भूजल को निकालने के नियम इतने ढीले हैं कि नदी का पानी निकालने के नियम सख्त होने के बावजूद, नदी सूखती चली जाती है।

एक नई राष्ट्रीय जल नीति केवल मौजूदा नियमों का एक पुलिंदा नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह जल प्रबंधन की पूरी सोच को बदल देने वाली होनी चाहिए। पहला निर्णायक कदम यह होगा कि पानी को देश की साझा धरोहर और राष्ट्रीय संपदा घोषित किया जाए। इससे केंद्र सरकार को जल संसाधनों के तर्कसंगत उपयोग के लिए एक सर्वमान्य, राष्ट्रव्यापी ढाँचा तैयार करने की शक्ति मिलेगी। यह राज्यों के अधिकार को छीनेगा नहीं, बल्कि जल उपयोग के लिए एक समान, वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगा।

नीति का मुख्य आधार बेसिन-आधारित प्रबंधन होना चाहिए। इसका मतलब है कि जल प्रबंधन राज्य की कृत्रिम सीमाओं के बजाय नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र के हिसाब से किया जाए। प्रत्येक प्रमुख नदी बेसिन के लिए एक स्वायत्त नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन किया जाए। यह प्राधिकरण सभी संबंधित राज्यों के साथ मिलकर काम करेगा और वैज्ञानिक डेटा के आधार पर पानी के वितरण, प्रदूषण नियंत्रण और नदी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए निर्णय लेगा।

नई जल नीति में जल उपयोग की प्राथमिकता का सख्त क्रम होना चाहिए जो हर परिस्थिति में लागू हो पीने का पानी और घरेलू ज़रूरतों की पूर्ति। नदी का पारिस्थितिकीय प्रवाह बनाए रखना यानी नदी को जिंदा रहने के लिए ज़रूरी पानी। कृषि और उद्योग की ज़रूरतें। यह कानूनी बाध्यता सुनिश्चित करेगी कि इंसानों और नदी के अपने अस्तित्व के साथ कभी समझौता न हो।

पानी मुफ्त की चीज़ नहीं है; इसे साफ करने और वितरित करने में भारी लागत आती है। NWP को पानी के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए आर्थिक संकेत देने होंगे पानी के पुनर्चक्रण को अनिवार्य किया जाए और पानी बर्बाद करने वाले या दूषित करने वाले उद्योगों पर भारी जुर्माना लगे। पानी की लागत को उसकी आपूर्ति की वास्तविक लागत से जोड़ा जाए, जिससे लोग पानी बचाने के लिए प्रेरित हों। किसानों को पानी की मीटरिंग के लिए प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें आधुनिक, पानी बचाने वाली सिंचाई तकनीकों के लिए बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन दिया जाए।

नीति को जल डेटा के संग्रहण, विश्लेषण और सभी राज्यों के बीच साझा करने को अनिवार्य करना चाहिए। भूजल, वर्षा पैटर्न और नदी प्रवाह का उच्च गुणवत्ता वाला, वास्तविक समय का डेटा उपलब्ध होना चाहिए। इससे जल प्रबंधन के निर्णय राजनीतिक दबाव के बजाय वस्तुनिष्ठ वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होंगे, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी।

कोई भी राष्ट्रीय नीति तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक वह लोगों के व्यवहार और संस्कृति का हिस्सा न बन जाए। हमें जल साक्षरता को एक राष्ट्रीय मिशन बनाना होगा। बच्चों के स्कूल पाठ्यक्रम से लेकर किसानों और उद्योगपतियों के लिए विशेष जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए। हर नागरिक को यह समझना होगा कि पानी एक सीमित संसाधन है, और इसका संरक्षण उसकी नैतिक जिम्मेदारी है।

वर्षा जल संचयन, पारंपरिक तालाबों और जोहड़ों का निर्माण जैसे प्राचीन जल संरक्षण के तरीकों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर एक जनांदोलन बनाना होगा। सरकार को स्थानीय समुदायों और पंचायती राज संस्थाओं को इस कार्य में नेतृत्व देने के लिए सशक्त बनाना चाहिए।

किसानों को जल-गहन फसलों जैसे धान और गन्ने से हटकर बाजरा, दालें और अन्य कम पानी वाली फसलों की ओर जाने के लिए आर्थिक रूप से आकर्षक प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। यह केवल पानी बचाएगा नहीं, बल्कि देश की पोषण सुरक्षा को भी मज़बूती देगा।

भारत की नदियाँ सिकुड़ रही हैं, भूजल स्तर गिर रहा है, और जल विवाद उग्र हो रहे हैं। ये सभी संकेत हमें बता रहे हैं कि जल संकट अब ‘आने वाला’ नहीं, बल्कि ‘आ चुका’ है। हम एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर हैं जहाँ अगर हमने व्यापक नीतिगत बदलाव नहीं किए, तो हमारी आर्थिक प्रगति और सामाजिक स्थिरता दोनों ही खतरे में पड़ जाएंगी।

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