पर्यावरणस्वास्थ्य
ओडिशा के मयूरभंज में बड़ा मेडिकल व प्रशासनिक घोटाला: जिला मुख्यालय अस्पताल के पास नदी में फेंकी गईं करोड़ों रुपये की एक्सपायर्ड दवाइयां
एंटीबायोटिक्स, सिरिंज और टेस्टिंग किट मिलने से पर्यावरण व सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भारी संकट

ओडिशा के आदिवासी बहुल मयूरभंज जिले में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, दवा खरीद प्रक्रिया और बायो-मेडिकल कचरा प्रबंधन (Bio-Medical Waste Management) से जुड़ा एक सनसनीखेज और चिंताजनक मामला सामने आया है। मयूरभंज जिला मुख्यालय अस्पताल (Mayurbhanj District Headquarters Hospital – DHH) के समीप बहने वाली नदी के किनारे और जलधारा में भारी मात्रा में एक्सपायर्ड (अवधि पार) दवाइयां और आवश्यक चिकित्सा सामग्री लावारिस अवस्था में फेंकी हुई पाई गईं।
प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार, नदी के पानी और किनारों पर बिखरी इन दवाओं और सर्जिकल सामान का कुल मूल्य करोड़ों रुपये आंका जा रहा है। नदी में फेंके गए कचरे के बड़े ढेरों में जीवनरक्षक एंटीबायोटिक्स (Antibiotics), डिस्पोजेबल सिरिंज (Syringes), सर्जिकल मास्क (Masks), रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्टिंग किट्स (Testing Kits), सलाइन बॉटल्स और जीवनरक्षक सिरप शामिल हैं।
इस घटना के उजागर होते ही स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों और डॉक्टरों में तीव्र आक्रोश फैल गया है। एक तरफ जहां जिले के दूरदराज और पिछड़े आदिवासी अंचलों में प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों को बुनियादी दवाओं और जांच सुविधाओं के लिए दर-दर भटकना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी खजाने से खरीदी गई करोड़ों रुपये की आवश्यक दवाइयों का यूं गोदामों में एक्सपायर होकर नदी में बहा दिया जाना स्वास्थ्य विभाग की खरीद नीति, भंडारण तंत्र और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
मामले की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद जिला प्रशासन पूरी तरह हरकत में आ गया। मयूरभंज के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (ADM) नेत्रानंद मल्लिक ने इस पूरी घटना को अत्यंत संवेदनशील और अस्वीकार्य बताते हुए जांच के कड़े निर्देश जारी किए:
“हाल ही में जिला मजिस्ट्रेट (DM) ने कलेक्ट्रेट में सभी चिकित्सा अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की थी। उस बैठक में सभी अधिकारियों को ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं, विशेष रूप से जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में निवासरत आदिवासी समुदायों को गुणवत्तापूर्ण दवाएं और उपचार उपलब्ध कराने के सख्त निर्देश दिए गए थे। यदि नदी में इस प्रकार दवाओं और चिकित्सा सामग्री को फेंकने की घटना सत्य पाई जाती है, तो मैं तुरंत जिला मजिस्ट्रेट को पूरी स्थिति से अवगत कराऊंगा। हम इस पूरे प्रकरण की विस्तृत और निष्पक्ष जांच करवाएंगे तथा कानून के सख्त प्रावधानों के तहत दोषियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”
— नेत्रानंद मल्लिक, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (ADM), मयूरभंज
प्रशासन ने औषधि निरीक्षकों (Drug Inspectors), प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारियों और स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अफसरों की एक संयुक्त जांच समिति गठित की है। यह समिति मौके पर जाकर बरामद दवाओं के बैच नंबर (Batch Numbers), निर्माण तिथि (MFG Date) और एक्सपायरी तिथि (Expiry Date) का अस्पताल के मुख्य दवा स्टॉक रजिस्टर से मिलान करेगी ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह खेप किस विशिष्ट वार्ड, गोदाम या अनुबंधित एजेंसी द्वारा नदी में फेंकी गई थी।
इस गंभीर लापरवाही के उजागर होने के बाद ओडिशा के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता संजीव राउत ने स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रशासन के कामकाज के तौर-तरीकों पर कड़ा प्रहार किया है:
संजीव राउत ने मीडिया के समक्ष अपने विचार रखते हुए कहा: “यह कोई पहली घटना नहीं है; मयूरभंज जिले में समय-समय पर सरकारी दवाओं को खुले में फेंकने या झाड़ियों में लावारिस छोड़ने के मामले सामने आते रहते हैं। हमें यह समझने में कठिनाई होती है कि स्वास्थ्य विभाग किस योजना के तहत काम कर रहा है। सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों को मुफ्त दवाएं मिलना एक सराहनीय नीति है, लेकिन जब विभाग के पास दैनिक ओपीडी और आईपीडी मरीजों का सटीक आंकड़ा होता है, तो फिर इतनी बड़ी मात्रा में दवाएं एक्सपायर होने के लिए कैसे बच गईं?”
“अस्पताल में दवाओं की खरीद एक औपचारिक आवश्यकता आदेश (Procurement Indent) के तहत की जाती है। यदि मांग के अनुरूप ही दवाएं मंगाई गई थीं, तो उनका समय पर वितरण क्यों नहीं किया गया? क्या अस्पताल के दवा भंडार में इस बात का कोई लेखा-जोखा नहीं रखा जाता कि किस विभाग को कितनी सलाइन बोतलों, सुइयों, मास्क या जीवनरक्षक एंटीबायोटिक्स की आवश्यकता है?” सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संदेह व्यक्त किया है कि ऑडिट और वित्तीय जांच से बचने के लिए एक्सपायर हो चुकी दवाओं को चोरी-छिपे नदी में बहा दिया गया, ताकि खरीद घोटाले और वितरण में हुई अनियमितताओं के साक्ष्य नष्ट किए जा सकें।
जब व्यापक स्तर पर एंटीबायोटिक्स नदी के पानी में घुलते हैं, तो जल में उपस्थित रोगाणु और जीवाणु उनके संपर्क में आकर अनुकूलन कर लेते हैं। धीरे-धीरे वे उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (Resistant) बन जाते हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में सुपरबग (Superbug) कहा जाता है। भविष्य में यदि कोई व्यक्ति इन प्रतिरोधी बैक्टीरिया से संक्रमित होता है, तो उस पर सामान्य एंटीबायोटिक्स पूरी तरह बेअसर साबित होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एएमआर को वैश्विक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा मूक खतरा माना है।
फार्मास्युटिकल यौगिकों में मौजूद सक्रिय रासायनिक तत्व (Active Pharmaceutical Ingredients – API) मछलियों, मेंढकों और जलीय वनस्पतियों के हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ देते हैं। इससे जलीय जीवों की प्रजनन क्षमता समाप्त हो जाती है और नदी की प्राकृतिक जैव विविधता नष्ट हो जाती है।
मयूरभंज जिले की बड़ी आबादी अपनी दैनिक आवश्यकताओं, स्नान, मवेशियों को पानी पिलाने और कई क्षेत्रों में घरेलू उपयोग के लिए सीधे नदी के जल पर आश्रित है। रासायनिक रूप से प्रदूषित पानी के संपर्क में आने से त्वचा रोग, यकृत व गुर्दे की विफलता और गंभीर पाचन तंत्र के संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
नदी के किनारों पर फेंकी गई खुली सिरिंज, नीडल्स और टेस्टिंग किट्स से कचरा बीनने वालों, मवेशियों और स्थानीय लोगों में हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी और एचआईवी जैसे संक्रामक रक्त जनित रोगों के फैलने की अत्यधिक संभावना बनी रहती है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा अधिसूचित बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के तहत स्वास्थ्य संस्थानों से निकलने वाले कचरे के सुरक्षित निस्तारण हेतु कड़े दिशानिर्देश तय किए गए हैं नियमों के अनुसार, एक्सपायर्ड, दूषित, साइटोटॉक्सिक और नष्ट की जाने वाली सभी दवाओं को अनिवार्य रूप से पीले रंग के गैर-क्लोरीनेटेड बैगों में सील किया जाना चाहिए।
ऐसी दवाओं को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) द्वारा प्रमाणित ‘कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी’ (CBWTF) में 1000°C से अधिक तापमान वाले इन्सिनरेटर में जलाकर पूरी तरह नष्ट किया जाना अनिवार्य है। कचरा परिवहन करने वाले वाहनों में जीपीएस और हर बैग पर बारकोड प्रणाली लागू होना जरूरी है ताकि कचरे की उत्पत्ति से लेकर उसके अंतिम निस्तारण तक का पूरा डिजिटल ऑडिट ट्रेल उपलब्ध रहे। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 15 के तहत नियमों की अनदेखी करने पर 5 वर्ष तक का कारावास और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
मयूरभंज की यह घटना देश भर के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में दवा प्रबंधन और इन्वेंटरी नियंत्रण की कमजोरियों को उजागर करती है। भविष्य में इस प्रकार के घोटालों और लापरवाही की रोकथाम के लिए निम्नलिखित सुधारात्मक उपाय आवश्यक हैं सभी जिला अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आधुनिक ई-औषधि (e-Aushadhi) सॉफ्टवेयर का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन हो, जिससे पहले एक्सपायर होने वाली दवाओं को प्राथमिकता के आधार पर पहले वितरित किया जाए।
यदि किसी अस्पताल में किसी विशेष दवा का अधिशेष (Surplus) स्टॉक है और उसकी एक्सपायरी में 6 महीने का समय बचा है, तो उसे तत्काल उन अस्पतालों या डिस्पेंसरियों में स्थानांतरित किया जाए जहां उसकी भारी कमी है। स्वास्थ्य विभाग और राज्य ड्रग कंट्रोलर द्वारा हर तीन महीने में अस्पतालों के दवा भंडारों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कराया जाए। अस्पतालों से बायो-मेडिकल कचरा उठाने वाली अनुबंधित कंपनियों की जवाबदेही तय हो और अस्पताल के डंपिंग यार्ड पर 24 घंटे सीसीटीवी निगरानी रखी जाए।
मयूरभंज के जिला मुख्यालय अस्पताल के पास नदी में करोड़ों रुपये की दवाओं का फेंका जाना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, गरीब जनता के स्वास्थ्य अधिकारों की उपेक्षा और पर्यावरण के प्रति आपराधिक संवेदनहीनता का स्पष्ट उदाहरण है।
इस मामले में गठित जांच समिति को अपनी रिपोर्ट में केवल निचले कर्मचारियों पर जिम्मेदारी डालने के बजाय खरीद आदेश जारी करने वाले शीर्ष अधिकारियों और दवा वितरण तंत्र की विफलता को भी उजागर करना होगा, ताकि दोषियों को कानून के कठघरे में खड़ा कर देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में जनता का विश्वास पुनः बहाल किया जा सके।



