
वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून की आधिकारिक विदाई और राज्यव्यापी वर्षा आंकड़ों के व्यापक विश्लेषण के बाद गुजरात सरकार ने राज्य के पश्चिमी छोर पर स्थित कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने के लिए एक बड़ा विनियामक और प्रशासनिक कदम उठाया है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने सोमवार को एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के उपरांत राज्य के चार प्रमुख तटीय और अर्ध-शुष्क जिलों देवभूमि द्वारका, कच्छ, पोरबंदर और जामनगर को आधिकारिक तौर पर ‘सूखाग्रस्त’ घोषित कर दिया है। यह विशेष विनियामक अधिसूचना और इसके तहत संचालित होने वाले राहत उपाय आगामी 1 नवंबर 2026 से प्रभावी होकर छह महीने की अवधि यानी 30 अप्रैल 2027 तक लागू रहेंगे। इस निर्णय के साथ ही राज्य सरकार ने इन प्रभावित क्षेत्रों के किसानों, ग्रामीण खेतिहर मजदूरों और लाखों पशुपालकों को भुखमरी और पलायन से बचाने के लिए एक बहुआयामी राहत पैकेज की घोषणा की है।
सरकारी घोषणा के अनुसार, राज्य में इस मानसूनी सत्र के दौरान कुल मौसमी औसत की 89 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई है। यद्यपि सतही तौर पर 89 प्रतिशत का यह आंकड़ा पूरे राज्य के पैमाने पर किसी भीषण अकाल का संकेत नहीं देता, किंतु भौगोलिक और क्षेत्रीय वर्षा वितरण के स्तर पर इसने सौराष्ट्र और कच्छ की कृषि पट्टी में एक गंभीर असंतुलन पैदा कर दिया है। दक्षिण और मध्य गुजरात के अधिकांश जिलों में जहां मानसूनी मेघों ने संतोषजनक वर्षा की और वहां के जलाशयों में जल स्तर 80 से 90 प्रतिशत तक भर गया, वहीं दूसरी ओर अरब सागर से सटे सौराष्ट्र के तटीय जिलों और कच्छ के मरुस्थलीय क्षेत्र में मानसून की लंबी बेरुखी ने हाहाकार मचा दिया। इन चारों जिलों में मानसूनी बारिश के लंबे समय तक रुकने और अनियमित बारिश के कारण खरीफ फसलों को भारी आघात पहुंचा है, जिसके बाद राजस्व विभाग और कृषि निदेशालय द्वारा किए गए गिरदावरी सर्वेक्षणों के आधार पर राज्य सरकार ने यह कठोर कदम उठाया है।
राहत पैकेज की वित्तीय रूपरेखा को समझाते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि प्रभावित चार जिलों के पंजीकृत किसानों को फसल क्षति और सूखे के प्रभाव से निपटने के लिए 8,500 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से इनपुट सब्सिडी यानी वित्तीय सहायता सीधे प्रदान की जाएगी। छोटे और सीमांत किसानों के हितों की रक्षा करने और सहायता राशि का पारदर्शी वितरण सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने प्रति किसान अधिकतम दो हेक्टेयर की सीमा निर्धारित की है। इसका सीधा अर्थ यह है कि एक पात्र किसान परिवार को अपने बैंक खाते में अधिकतम 17,000 रुपये तक की सीधी वित्तीय सहायता प्राप्त हो सकेगी। राजस्व विभाग के अधिकारियों के अनुसार यह राशि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी डीबीटी प्रणाली के माध्यम से सीधे आधार-लिंक्ड बैंक खातों में भेजी जाएगी ताकि किसी भी बिचौलिए या प्रशासनिक देरी के बिना पीड़ित अन्नदाताओं को तुरंत नकदी का संबल मिल सके।
किसानों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी पर आश्रित खेतिहर श्रमिकों, भूमिहीन परिवारों और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों की आजीविका को सुरक्षित करना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती थी। जब कृषि कार्य ठप हो जाते हैं, तो ग्रामीण आबादी के सामने जीवनयापन का संकट खड़ा हो जाता है और वे बड़े शहरों की ओर अनियंत्रित पलायन के लिए विवश होते हैं। इस विस्थापन को रोकने के लिए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने घोषणा की है कि इन चारों सूखाग्रस्त जिलों में मनरेगा और ग्रामीण रोजगार योजनाओं के तहत सामान्य रूप से मिलने वाले 100 दिनों के सुनिश्चित रोजगार को बढ़ाकर 150 दिन कर दिया गया है। रोजगार के इस 50 अतिरिक्त दिनों के विस्तार से लाखों ग्रामीण मजदूरों को अपने ही गांव और पंचायतों में काम के अवसर उपलब्ध होंगे। सरकार ने स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि इन रोजगार दिवसों का उपयोग मुख्य रूप से जल संरक्षण, पुराने तालाबों की गाद निकालने, चेकडैमों की मरम्मत और नई जल संचयन संरचनाओं के निर्माण में किया जाए ताकि सूखे के इस संकट को भविष्य के जल संरक्षण के अवसर में बदला जा सके।
सौराष्ट्र और कच्छ की अर्थव्यवस्था केवल खेती पर निर्भर नहीं है, बल्कि यहां का एक बहुत बड़ा वर्ग पशुपालन और डेयरी उद्योग से अपनी आजीविका चलाता है। कच्छ के विशाल बन्नी घास के मैदानों और सौराष्ट्र के मालधारी समुदाय के लिए मवेशी ही उनकी सबसे बड़ी जीवन पूंजी हैं। सूखे की स्थिति में सबसे पहला और सबसे गंभीर प्रहार चारे और पशुओं के पीने के पानी पर होता है। इस मानवीय और पशुधन संकट को भांपते हुए मुख्यमंत्री ने चारा आपूर्ति की स्थिति पर विस्तृत ब्योरा साझा किया। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने अब तक राज्य भर में 1.21 करोड़ किलोग्राम से अधिक हरा और सूखा चारा सफलतापूर्वक वितरित कर दिया है। इसके साथ ही आगामी छह महीनों की कठिन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अपने केंद्रीय और जिला स्तरीय चारा डिपो में 3 करोड़ किलोग्राम अतिरिक्त चारे का बफर स्टॉक सुरक्षित कर लिया है। सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि मवेशी पालकों को रियायती और नियंत्रित दरों पर घास की नियमित आपूर्ति मिलती रहे और पंजीकृत गौशालाओं व पांजरापोळ संस्थानों को विशेष दैनिक रखरखाव अनुदान दिया जाए ताकि कोई भी मवेशी चारे के अभाव में दम न तोड़े।
वर्षा की कमी के तकनीकी पहलुओं पर गौर करें तो देवभूमि द्वारका, पोरबंदर, जामनगर और कच्छ में दक्षिण-पश्चिम मानसून की चाल पूरे सत्र के दौरान अत्यंत असामान्य रही। मानसून की शुरुआत में जून माह में कुछ स्थानों पर हल्की बारिश हुई, जिसके बाद किसानों ने अपनी खरीफ फसलों, विशेषकर मूंगफली, कपास, तिल, अरंडी और बाजरे की बड़े पैमाने पर बुवाई कर दी। किंतु जुलाई और अगस्त के उन महत्वपूर्ण महीनों में, जब फसलों को वानस्पतिक वृद्धि और फलियों के विकास के लिए निरंतर पानी की आवश्यकता होती है, मानसून ने इन जिलों में लगभग चार से पांच सप्ताह का एक लंबा सूखा ब्रेक ले लिया। कड़कड़ाती धूप और नमी की भारी कमी के कारण खेत सूखने लगे और पौधे मुरझा गए। सितंबर के अंतिम दौर में जब मानसून लौटने लगा, तब भी इन तटीय क्षेत्रों में कोई उल्लेखनीय वर्षा नहीं हुई। परिणाम यह हुआ कि इन जिलों के प्रमुख मध्यम और लघु सिंचाई जलाशयों में जल भंडारण क्षमता 40 से 50 प्रतिशत के बेहद खतरनाक निचले स्तर पर ही सिमट कर रह गई।
जलाशयों में पानी की इस भीषण कमी ने न केवल खरीफ की वर्तमान उपज को 33 से 50 प्रतिशत तक नष्ट कर दिया, बल्कि आने वाले रबी सत्र के लिए भी गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया है। सामान्य वर्षों में किसान रबी के दौरान गेहूं, जीरा, चना और सरसों जैसी नकदी फसलों की बुवाई करते हैं, जिसके लिए उन्हें जलाशयों से नहरों के माध्यम से दो से तीन बार पानी की आवश्यकता होती है। लेकिन वर्तमान जल स्तर को देखते हुए जल संसाधन विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि नहरों से सिंचाई का पानी उपलब्ध कराना असंभव होगा क्योंकि शेष बचे जल भंडार को आगामी गर्मी के महीनों तक केवल इंसानों और मवेशियों के पीने के पानी के रूप में आरक्षित रखना अनिवार्य है। इसी जमीनी हकीकत को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों की संयुक्त समिति ने राज्य सरकार को सिफारिश की थी कि बिना किसी देरी के इन चार जिलों में सूखा राहत नियमावली को तत्काल लागू किया जाए।
गुजरात सरकार की यह छह महीने की राहत अवधि केवल कागजी आदेशों तक सीमित न रहे, इसके लिए एक मजबूत और उत्तरदायी निगरानी तंत्र भी स्थापित किया गया है। गांधीनगर स्थित राज्य सचिवालय से लेकर चारों जिलों के कलेक्ट्रेट मुख्यालयों में चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाले विशेष सूखा नियंत्रण कक्ष खोले जा रहे हैं। जिला कलेक्टरों को व्यापक वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सौंपे गए हैं ताकि वे जमीनी आवश्यकताओं के अनुसार बिना राज्य मुख्यालय की पूर्व अनुमति के तुरंत निर्णय ले सकें। जिला प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रतिदिन ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता, टैंकरों के संचालन, मनरेगा के तहत चल रहे मस्टरोल और चारा डिपो की स्थिति पर एक दैनिक बुलेटिन जारी करें।
पेयजल संकट से निपटने के लिए राज्य सरकार नर्मदा जल ग्रिड और सौराष्ट्र-नर्मदा अवतरण सिंचाई योजना यानी ‘सौनी योजना’ की पाइपलाइनों का अधिकतम उपयोग करने की योजना पर काम कर रही है। जिन गांवों और बस्तियों तक पाइपलाइन नेटवर्क नहीं पहुंच सका है, वहां जिला प्रशासन को तत्काल प्रभाव से अनुबंधित पानी के टैंकर तैनात करने के आदेश दिए गए हैं। टैंकरों के संचालन में किसी भी प्रकार की धांधली या पानी की कालाबाजारी को रोकने के लिए सभी अधिकृत जल टैंकरों में जीपीएस ट्रैकिंग उपकरण लगाना अनिवार्य किया गया है और प्रत्येक गांव में जल वितरण की निगरानी ग्राम पंचायत की जल एवं स्वच्छता समिति द्वारा की जाएगी। इसके अलावा, बिजली वितरण कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में ट्यूबवेलों और कृषि पंपों के लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति बनाए रखें ताकि किसान यदि भूजल उपलब्ध हो तो बची हुई फसलों को बचा सकें।
कृषि और ग्रामीण अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों ने सरकार द्वारा घोषित राहत पैकेज का विश्लेषण करते हुए इसे एक संतुलित और समयोचित कदम बताया है, हालांकि उन्होंने इसके त्वरित और पारदर्शी क्रियान्वयन पर विशेष बल दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि 8,500 रुपये प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता किसानों की वास्तविक फसल लागत और बाजार मूल्य के नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई तो नहीं कर सकती, लेकिन यह उन्हें आगामी महीनों में घरेलू खर्च चलाने और रबी के दौरान वैकल्पिक आजीविका तलाशने के लिए एक तात्कालिक आर्थिक सहारा अवश्य प्रदान करेगी। वहीं दूसरी ओर, 150 दिन का रोजगार विस्तार ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी के प्रवाह को बनाए रखने में रीढ़ की हड्डी साबित होगा, क्योंकि इससे स्थानीय बाजारों में क्रय शक्ति बनी रहेगी और छोटे व्यापारियों का कारोबार पूरी तरह ध्वस्त होने से बच जाएगा।
यह निर्णय इस बात का भी प्रमाण है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में चरम मौसमी घटनाओं और वर्षा की क्षेत्रीय अनिश्चितता का सामना करने के लिए राज्य सरकारों को अपनी आपदा प्रबंधन रणनीतियों में निरंतर लचीलापन लाना होगा। एक समय था जब सूखा घोषित करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल, लंबी और लालफीताशाही से भरी होती थी, जिसके कारण जब तक वास्तविक राहत धरातल पर पहुंचती थी, तब तक किसान और मवेशी भारी तबाही झेल चुके होते थे। इसके विपरीत, आधुनिक उपग्रह आधारित रिमोट सेंसिंग, स्वचालित मौसम केंद्रों के सटीक आंकड़ों और डिजिटल गिरदावरी सर्वेक्षणों के आधार पर अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में ही छह महीने के लिए सूखा घोषित करना प्रशासनिक परिपक्वता और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता को दर्शाता है।
आने वाले छह महीने देवभूमि द्वारका, कच्छ, पोरबंदर और जामनगर के स्थानीय प्रशासन, नागरिक समाज और निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए एक कठिन परीक्षा की घड़ी साबित होने जा रहे हैं। शीतकाल के बीतने के बाद जब मार्च और अप्रैल के महीनों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचेगा, तब इन तटीय और रेतीले क्षेत्रों में जल और चारे की मांग अपने चरम पर होगी। ऐसे समय में सरकार द्वारा आरक्षित किया गया 3 करोड़ किलोग्राम चारे का भंडार और अग्रिम पेयजल वितरण योजना ही इन क्षेत्रों के जीवन की जीवनरेखा बनेगी। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल द्वारा घोषित यह राहत कवच निश्चित रूप से सौराष्ट्र और कच्छ के लाखों संघर्षशील ग्रामीणों, किसानों और मालधारियों के आत्मबल को मजबूत करेगा और उन्हें इस प्राकृतिक आपदा के विरुद्ध पूरी मजबूती से खड़े रहने का संबल प्रदान करेगा।



