
कल्पना कीजिए कि आप सुबह की चाय पीते हुए सोशल मीडिया खोलते हैं और देखते हैं कि किसी विज्ञापन में इस्तेमाल किए गए कपड़े या किसी रेस्तरां के मेन्यू कार्ड पर लिखी एक डिश को लेकर हज़ारों लोग आपस में भिड़े हुए हैं। कभी ‘बिंदी’ को लेकर बहस होती है, कभी ‘हलाल या झटका’ को लेकर, और कभी इस बात पर कि किसी खास त्यौहार को मनाने का ‘सही’ तरीका क्या है।
आज हमारी पहचान (Identity) केवल इस बात तक सीमित नहीं रही कि हम कौन हैं, बल्कि यह इस बात का ‘बयान’ (Statement) बन गई है कि हम किसके पक्ष में हैं। संस्कृति, जो कभी हमें जोड़ने का सूत्र हुआ करती थी, आज एक ‘फ्लैशपॉइंट’ (विवाद का केंद्र) बनती जा रही है।
संस्कृति और पहचान पर होने वाली ये बहसें अचानक पैदा नहीं हुई हैं। इसके पीछे गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं। आज की भागदौड़ भरी दुनिया में, जहाँ सब कुछ एक जैसा (Globalized) होता जा रहा है, लोगों को डर है कि उनकी अपनी विशिष्ट पहचान कहीं खो न जाए। जब हमें लगता है कि हमारी परंपराओं पर ‘बाहरी’ हमला हो रहा है, तो हम और भी ज़्यादा रक्षात्मक (Defensive) हो जाते हैं। यही वजह है कि छोटी-छोटी चीज़ें भी आत्म-सम्मान का मुद्दा बन जाती हैं।
सोशल मीडिया के अल्गोरिदम हमें वही दिखाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। इससे हमारी सोच एकतरफा हो जाती है। जब हम किसी विवाद को देखते हैं, तो हम उसे अपनी ‘पहचान के चश्मे’ से देखते हैं और बिना सोचे-समझे बहस में कूद पड़ते हैं। डिजिटल दुनिया में ‘असहमति’ के लिए जगह कम होती जा रही है और ‘आक्रोश’ (Outrage) के लिए ज़्यादा।
पिछले कुछ सालों में हमारा भोजन और हमारे कपड़े सबसे बड़े विवाद के केंद्र रहे हैं। क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, यह अब केवल स्वाद का मुद्दा नहीं रहा। मांस के प्रकार, शाकाहार बनाम मांसाहार और भोजन की पवित्रता को लेकर होने वाली बहसें अक्सर पड़ोसियों के बीच की दीवार बन जाती हैं।
किसी विज्ञापन में मंगलसूत्र की डिजाइन हो या बिना बिंदी वाली महिला की तस्वीर इन पर होने वाला बवाल यह दर्शाता है कि हम प्रतीकों (Symbols) को लेकर कितने ज़्यादा सचेत और कभी-कभी अति-संवेदनशील हो गए हैं। संस्कृति को ‘बचाने’ के नाम पर अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निशाना बनाया जाता है।
त्यौहार हमेशा से खुशियाँ बांटने का ज़रिया रहे हैं, लेकिन अब ये ‘पहचान के प्रदर्शन’ का मंच बन गए हैं। दीवाली पर पटाखों की बात हो या होली पर पानी की ये चर्चाएं अब पर्यावरण से ज़्यादा ‘धार्मिक पहचान’ की बहस बन जाती हैं। ऐसा लगता है मानो हर सुझाव को एक ‘हमले’ के रूप में देखा जा रहा है। सड़कों पर निकलने वाले जुलूस और लाउडस्पीकर का शोर अब केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक बन गया है कि सार्वजनिक स्थान पर किसका ‘हक’ ज़्यादा मज़बूत है।
इन बड़ी-बड़ी सांस्कृतिक बहसों के बीच हम उस ‘मानवीय स्पर्श’ को खोते जा रहे हैं जो हमारे समाज की नींव था। परिवार और दोस्तों के व्हाट्सएप ग्रुप अब युद्ध के मैदान बन गए हैं। पहचान की इन बहसों के कारण बरसों पुराने रिश्ते टूट रहे हैं। लोग एक-दूसरे को उनकी ‘सोच’ और ‘पहचान’ के आधार पर जज करने लगे हैं, न कि उनके स्वभाव या उनके साथ बिताए समय के आधार पर। जब संस्कृति एक ‘हथियार’ बन जाती है, तो वह समाज में डर पैदा करती है। लोग खुलकर अपनी बात रखने से डरने लगते हैं कि कहीं उनकी बात को उनकी पहचान के खिलाफ न मान लिया जाए।
पहचान की एक बहस ‘सांस्कृतिक विनियोग’ को लेकर भी है। क्या एक संस्कृति के लोग दूसरी संस्कृति की चीज़ों का इस्तेमाल कर सकते हैं? इतिहास गवाह है कि संस्कृतियाँ हमेशा एक-दूसरे से सीखकर फली-फूली हैं। हमारा संगीत, हमारा खाना और यहाँ तक कि हमारी भाषा भी कई संस्कृतियों का मिश्रण है। अगर हम अपनी पहचान के चारों ओर बहुत ऊँची दीवारें खड़ी कर लेंगे, तो हमारी संस्कृति का विकास रुक जाएगा। ‘पवित्रता’ की तलाश अक्सर ‘कट्टरता’ की ओर ले जाती है।
पहचान की इन बहसों को खत्म करने का मतलब यह नहीं है कि हम अपनी पहचान छोड़ दें। इसका मतलब है कि हम दूसरों की पहचान के प्रति भी उतने ही उदार बनें। हमें केवल ‘बर्दाश्त’ (Tolerate) नहीं करना है, बल्कि एक-दूसरे की भिन्नताओं का ‘सम्मान’ (Respect) करना सीखना होगा। स्कूलों में बच्चों को यह सिखाना ज़रूरी है कि विविधता भारत की कमज़ोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। पहचान की बहसें तब खत्म होंगी जब हम एक-दूसरे की कहानियों को सुनना शुरू करेंगे। सोशल मीडिया पर किसी भी विवाद का हिस्सा बनने से पहले दो मिनट रुककर यह सोचना चाहिए कि क्या हमारा कमेंट किसी का दिल दुखा रहा है या समाज में ज़हर घोल रहा है।



