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उड़ानों में देरी और विमानन अराजकता: यात्री अधिकार अब केवल माफी से आगे बढ़ने चाहिए

'माफी' से आगे: मजबूत उपभोक्ता संरक्षण की मांग

कल्पना कीजिए कि आपने महीनों पहले अपनी मेहनत की कमाई से एक छुट्टी की योजना बनाई है, या आप किसी ज़रूरी व्यापारिक बैठक या परिवार में किसी की अंतिम विदाई के लिए जा रहे हैं। आप समय पर हवाई अड्डे पहुँचते हैं, सुरक्षा जांच कराते हैं, और गेट पर पहुँचने के बाद अचानक घोषणा होती है “अपरिहार्य कारणों से आपकी उड़ान 4 घंटे की देरी से है।” कुछ घंटों बाद, वह देरी ‘रद्द’ (Cancellation) में बदल जाती है।

एयरलाइन स्टाफ मुस्कुराकर माफी मांगता है और आपको रिफंड या अगली उपलब्ध उड़ान का वादा करता है। लेकिन क्या उस माफी से आपकी वह ज़रूरी मीटिंग वापस आ जाएगी? क्या वह माफी उस मानसिक तनाव को कम कर सकती है जो आपने और आपके परिवार ने हवाई अड्डे की ठंडी कुर्सियों पर बैठकर काटा है?

हाल के महीनों में भारतीय आसमान में ‘विमानन अराजकता’ (Aviation Chaos) एक नया सामान्य (New Normal) बन गई है। कोहरे का बहाना हो, तकनीकी खराबी हो या क्रू स्टाफ की कमी—सफर करने वाला यात्री हमेशा सबसे ज़्यादा पिसता है। भारत को अब मजबूत उपभोक्ता संरक्षण कानूनों, कड़े मुआवजे के तंत्र और एयरलाइनों की परिचालन जवाबदेही (Operational Accountability) की सख्त ज़रूरत है।

विमानन क्षेत्र में आई इस हालिया मंदी और अव्यवस्था के पीछे कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण एयरलाइनों की ‘क्षमता’ से अधिक ‘महत्वाकांक्षा’ है। कोविड के बाद यात्रा की मांग में भारी उछाल आया है। एयरलाइंस अधिक से अधिक टिकटें बेचना चाहती हैं, लेकिन उनके पास पर्याप्त पायलट, केबिन क्रू या अतिरिक्त विमान (Standby Aircraft) नहीं हैं। जब एक भी विमान में खराबी आती है या कोहरे के कारण देरी होती है, तो उसका असर पूरे दिन की उड़ानों पर पड़ता है, जिससे एक ‘डोमिनो इफ़ेक्ट’ (Domino Effect) पैदा होता है।

सर्दियों में उत्तर भारत का कोहरा एक वार्षिक समस्या है। इसके बावजूद, हमारे पास श्रेणी-III (CAT-III) प्रशिक्षित पायलटों और लैंडिंग सिस्टम की कमी बनी रहती है। यह तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि एक योजनागत विफलता है। एयरलाइनों को पता है कि वर्तमान नियमों के तहत वे ‘कंट्रोल से बाहर’ (Force Majeure) कारणों का हवाला देकर भारी मुआवजे से बच सकती हैं। जब सजा का डर न हो, तो सुधार की गुंजाइश कम हो जाती है।

वर्तमान में डीजीसीए (DGCA) के जो नियम हैं, वे कागजों पर तो ठीक लगते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर वे ऊँट के मुँह में जीरा के समान हैं। अगर आपकी उड़ान रद्द होती है, तो एयरलाइन आपको खाना देने या अगली उड़ान में बिठाने का वादा करती है। लेकिन अगर आप खुद अपनी यात्रा रद्द करना चाहें, तो रिफंड पाने की प्रक्रिया किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं होती। ‘कैंसलेशन चार्ज’ के नाम पर एयरलाइन टिकट का एक बड़ा हिस्सा काट लेती है, जबकि अपनी गलती पर वे केवल मूल किराया वापस करने की बात करती हैं।

अक्सर देखा गया है कि एयरलाइंस को देरी के बारे में पहले से पता होता है, लेकिन वे यात्रियों को तब बताती हैं जब वे हवाई अड्डे पहुँच चुके होते हैं। यह पारदर्शिता की कमी जानबूझकर की जाती है ताकि यात्री रिफंड के बजाय अगली उड़ान का इंतजार करने को मजबूर हो जाए।

हवाई यात्रा अब अमीरों का शौक नहीं, बल्कि एक ज़रूरत है। इसलिए, इसके नियम भी अब ‘लग्ज़री’ नहीं बल्कि ‘ज़रूरी’ होने चाहिए।हमें यूरोपीय संघ (EU 261) जैसे कड़े नियमों की आवश्यकता है। यदि किसी एयरलाइन की गलती (जैसे स्टाफ की कमी या शेड्यूलिंग की गलती) के कारण उड़ान में 3 घंटे से अधिक की देरी होती है, तो यात्री को बिना किसी सवाल के एक तय नकद मुआवजा मिलना चाहिए। यह मुआवजा केवल टिकट की कीमत नहीं, बल्कि यात्री के समय और असुविधा की कीमत होनी चाहिए।

रिफंड की प्रक्रिया 7 से 10 दिनों की नहीं, बल्कि 24 घंटे की होनी चाहिए। डिजिटल इंडिया के दौर में, जब पैसे तुरंत कट सकते हैं, तो वे तुरंत वापस क्यों नहीं आ सकते? देरी होने पर केवल ‘सैंडविच और जूस’ देना काफी नहीं है। यदि देरी रात भर की है, तो एयरलाइन को बिना किसी बहस के यात्री को होटल और वहां तक जाने का साधन उपलब्ध कराना चाहिए। अक्सर यात्री को इसके लिए स्टाफ से ‘भीख’ मांगनी पड़ती है, जो बेहद अपमानजनक है।

हवाई सेवा प्रदाताओं को यह समझना होगा कि वे केवल एक ‘सीट’ नहीं बेच रहे, बल्कि वे एक ‘भरोसा’ बेच रहे हैं। एयरलाइनों को उतने ही टिकट बेचने की अनुमति दी जानी चाहिए जितने विमान और स्टाफ उनके पास वास्तव में उपलब्ध हैं। ‘ओवरबुकिंग’ और ‘काल्पनिक शेड्यूलिंग’ पर भारी जुर्माना लगना चाहिए। अक्सर अराजकता का कारण थके हुए पायलट और केबिन क्रू होते हैं। एयरलाइंस मुनाफे के चक्कर में स्टाफ से उनकी क्षमता से अधिक काम लेती हैं, जिससे न केवल उड़ानें प्रभावित होती हैं, बल्कि सुरक्षा पर भी खतरा मंडराता है।

भारत का विमानन नियामक (DGCA) अक्सर ‘एयरलाइन-फ्रेंडली’ दिखता है। उसे अब ‘पैसेंजर-फ्रेंडली’ बनना होगा। एयरलाइनों के समय-पालन (On-Time Performance) का डेटा स्वतंत्र रूप से ऑडिट किया जाना चाहिए, क्योंकि एयरलाइंस अक्सर आंकड़ों में हेरफेर करती हैं। हर हवाई अड्डे पर एक स्वतंत्र सरकारी ‘पैसेंजर शिकायत डेस्क’ होना चाहिए जो मौके पर ही यात्रियों की समस्या सुलझा सके और एयरलाइन को निर्देश दे सके।

इस पूरे विवाद में हम अक्सर यात्री के ‘मानवीय गरिमा’ को भूल जाते हैं। एक माँ जो अपने बच्चे के साथ ज़मीन पर बैठी है, एक बीमार बुजुर्ग जिसे अपनी दवा लेनी है और उसकी उड़ान का कोई पता नहीं है ये कोई ‘आंकड़े’ नहीं हैं। ये इंसान हैं जिन्होंने एक सेवा के लिए भुगतान किया है। हवाई अड्डों को ‘रणक्षेत्र’ में तब्दील होने से रोकना है, तो एयरलाइनों को अपने व्यवहार में मानवीय संवेदना लानी होगी।

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा विमानन बाजार बनने की राह पर है। लेकिन यह प्रगति तब तक अधूरी है जब तक यहाँ का यात्री खुद को असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस करेगा। उड़ानों में देरी होना एक तकनीकी घटना हो सकती है, लेकिन उस देरी को संभालने का तरीका एक नैतिक चुनाव है। अब समय आ गया है कि भारत सरकार और नियामक संस्थाएं एयरलाइनों के लिए ऐसे सख्त मानक तय करें कि ‘देरी करना’ उनके लिए ‘सुधार करने’ से ज़्यादा महंगा पड़े। यात्रियों का समय कीमती है, उनका पैसा मेहनत का है और उनकी गरिमा अटूट है।

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