
10 अप्रैल, 2026 की दोपहर वृंदावन के आध्यात्मिक वातावरण में उस समय चीख-पुकार मच गई, जब यमुना की शांत लहरों के बीच एक भीषण नाव हादसा घटित हुआ। प्रसिद्ध केसी घाट (Kesi Ghat) के समीप श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों से खचाखच भरी एक नाव नदी के बीचों-बीच स्थित एक फ्लोटिंग (पीपा) पुल के अवशेषों से टकराकर पलट गई। इस हृदयविदारक घटना में अब तक 10 लोगों की मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई अभी भी लापता हैं।
मथुरा-वृंदावन में इन दिनों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। शुक्रवार की दोपहर करीब 3:15 बजे, पंजाब के लुधियाना और मुक्तसर से आए श्रद्धालुओं का एक जत्था केसी घाट से नाव के जरिए यमुना पार करने की कोशिश कर रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, नाव की क्षमता केवल 12 से 15 लोगों की थी, लेकिन उस पर 25 से अधिक लोग सवार थे।
जैसे ही नाव नदी के बीच पहुँची, तेज हवा के झोंके के कारण वह डगमगाने लगी। नाविक ने नियंत्रण खो दिया और नाव पानी के भीतर आंशिक रूप से डूबे हुए पीपा पुल (Pontoon Bridge) के एक लोहे के ड्रम से जोर से टकरा गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि नाव एक तरफ झुक गई और देखते ही देखते पलट गई। नाव पर सवार बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग गहरे पानी में समा गए।
हादसे का शिकार हुए अधिकांश लोग पंजाब के रहने वाले थे। वे वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर के दर्शन के बाद यमुना विहार के लिए निकले थे। अब तक बरामद 10 शवों में से 6 पुरुष और 4 महिलाएं हैं। इनमें से अधिकांश की आयु 30 से 55 वर्ष के बीच है। स्थानीय गोताखोरों की जांबाजी के कारण 17 लोगों को डूबने से बचा लिया गया है। बचाए गए लोगों को वृंदावन के संयुक्त चिकित्सालय और अन्य निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जहाँ कुछ की स्थिति गंभीर बनी हुई है।
हादसे की सूचना मिलते ही मथुरा जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया। जिलाधिकारी (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) तुरंत भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे। प्रशासन के पहुँचने से पहले ही घाट पर मौजूद स्थानीय ‘मल्लाहों’ और गोताखोरों ने पानी में छलांग लगा दी थी। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर कई बच्चों और महिलाओं को सुरक्षित बाहर निकाला।
वर्तमान में SDRF (State Disaster Response Force) और NDRF की टीमें यमुना की तलहटी में सर्च ऑपरेशन चला रही हैं। अंधेरा होने के बावजूद फ्लड लाइटों की मदद से लापता 3 से 4 लोगों की तलाश जारी है। यमुना का जलस्तर पिछले दो दिनों में हुई बारिश के कारण थोड़ा बढ़ा हुआ है और पानी का बहाव तेज होने के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में काफी बाधा आ रही है।
लखनऊ में मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) इस पूरी घटना पर पल-पल की नजर रख रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हादसे पर गहरा शोक व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को 4-4 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। साथ ही घायलों के मुफ्त और उच्च स्तरीय इलाज के निर्देश दिए हैं।
सीएम ने मथुरा प्रशासन से रिपोर्ट मांगी है कि आखिर पीपा पुल को हटाने के बाद उसके अवशेष नदी में क्यों छोड़े गए थे। उन्होंने लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं। मुख्यमंत्री ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को आश्वस्त किया है कि पीड़ितों के पार्थिव शरीरों को ससम्मान उनके पैतृक गांवों तक पहुँचाने की व्यवस्था उत्तर प्रदेश सरकार करेगी।
इस हादसे ने कई ऐसे सवाल खड़े किए हैं जिनका जवाब प्रशासन को देना होगा क्या नाव के पास फिटनेस सर्टिफिकेट था? अक्सर घाटों पर क्षमता से अधिक लोगों को बिठाया जाता है, लेकिन पुलिस और प्रशासन इसकी अनदेखी करते हैं। मानसून और जलस्तर को देखते हुए पीपा पुल को हटाया जाना था। लेकिन उसके ड्रम और लोहे की छड़ें नदी में ही छोड़ दी गईं, जो पानी के नीचे छिपे हुए ‘मौत के जाल’ की तरह काम कर रहे थे। नाव पर एक भी लाइफ जैकेट या लाइफ-रिंग उपलब्ध नहीं थी। यदि लाइफ जैकेट होती, तो शायद कई जानों को बचाया जा सकता था।
केसी घाट पर मौजूद एक तीर्थयात्री, जो लुधियाना के उसी जत्थे का हिस्सा थे, ने रोते हुए बताया “हम सब बांके बिहारी के दर्शन कर बहुत खुश थे। नाव में बैठते समय हमें डर लगा था, लेकिन नाविक ने कहा कि कुछ नहीं होगा। बीच लहरों में नाव अचानक पत्थर जैसी किसी चीज से टकराई और सब कुछ खत्म हो गया। मैंने अपनी आंखों के सामने अपने साथी को डूबते देखा।”
इस तरह के हादसों को रोकने के लिए विशेषज्ञ निम्नलिखित सुझाव दे रहे हैं हर नाव में यात्रियों की संख्या के बराबर लाइफ जैकेट होना अनिवार्य किया जाए। सभी नाविकों का पंजीकरण हो और समय-समय पर नावों की मजबूती की जांच की जाए। जल परिवहन वाले क्षेत्रों में नदी के भीतर डूबे हुए खंभों, पीपा पुल के अवशेषों और मलबे को तुरंत हटाया जाना चाहिए। सीसीटीवी कैमरों और तैनात जल पुलिस के जरिए यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी नाव ओवरलोड न हो।
वृंदावन की यमुना में हुआ यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का परिणाम है। 10 परिवारों के चिराग बुझ गए हैं और उनकी तीर्थयात्रा एक डरावने सपने में बदल गई है। प्रशासन को केवल मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी ठोस व्यवस्था बनानी चाहिए कि भविष्य में किसी भी श्रद्धालु का ‘आस्था का सफर’ इस तरह ‘जल समाधि’ में न बदले।



