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चीटिंग और राजनीति: विश्वविद्यालय के परीक्षा कक्ष में बैठा डर

भरोसे और संस्थानों की साख पर सवाल

भारत के विश्वविद्यालय प्राचीन काल से ही सत्य, न्याय और स्वतंत्र सोच के मंदिर माने जाते रहे हैं। लेकिन हाल की घटनाएँ, जैसे जोधपुर विश्वविद्यालय में वरिष्ठ छात्र संघ नेता का परीक्षा में नकल करते पकड़ा जाना, या उत्तराखंड के भर्ती घोटाले में राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप, एक गहरी चिंता का कारण हैं। इन विवादों ने हजारों मेहनती छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों की उम्मीद और विश्वास को झकझोर दिया है कि क्या विश्वविद्यालय आज भी ईमानदारी और योग्यता की कसौटी बन पा रहे हैं?

जोधपुर के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में ABVP से जुड़ी प्रांत मंत्री परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन से नकल करते पकड़ी गई। इसके बाद NSUI जैसे विरोधी छात्र संगठन के विरोध प्रदर्शन ने प्रशासन से सख्त कार्रवाई और निष्पक्ष जांच की मांग की। इसी क्रम में उत्तराखंड विधान सेवा चयन आयोग की परीक्षाओं में गड़बड़ियों, पेपर लीक और राजनीतिक संरक्षण को लेकर युवाओं में असंतोष और हलचल है। यह केवल दो इलाकों या संगठनों की समस्या नहीं बल्कि देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में अब राजनीतिक हस्तक्षेप और गुटबंदी की जड़ें गहरी होती जा रही हैं।

छात्रसंघ राजनीति, जो कभी नेतृत्व-निर्माण, विचार-विमर्श और सामाजिक आंदोलन का जरिया थी, आज कई जगह ‘बड़े दलों’ की शाखा जैसी व्यवहार करने लगी है। पदाधिकारी सिर्फ विचारधारा या आकस्मिक शक्ति पाने तक सीमित हो गए हैं, जिनसे अकादमिक अनुशासन, निष्पक्षता और परीक्षा के नियम कमजोर पड़ जाते हैं। खास बात यह है कि जब आरोपी किसी सत्ताधारी दल का हो या संगठन का चहेता, तब प्रशासनिक कार्रवाई अक्सर आधी-अधूरी, धीमी या दिखावटी हो जाती है। इससे छात्रों को लगता है कि ईमानदारी से अधिक जरूरी ‘सही गुट’ चुनना और प्रबंधन से नजदीकी बनाना है।

किसी नेता के परीक्षा में नकल के आरोप पर जब बड़ा संगठन या सत्ता पक्ष उसकी लज्जा छुपाने लगे, या प्रशासन उस पर लचीला रूख अपनाए, तब बाकी छात्रों का संस्थान और शिक्षा व्यवस्था से भरोसा हिल जाता है। ऐसे विद्यार्थियों की मेहनत और भविष्य संदिग्ध हो जाता है। जो अपनी पूरी ईमानदारी से प्रतियोगी परीक्षाओं या सेमेस्टर टेस्ट में बैठते हैं।

यह सिलसिला सिर्फ शिक्षा के स्तर को ही नहीं गिराता, बल्कि समूचे समाज में ‘सिस्टम से लाभ’ पाने का दोषपूर्ण आदर्श भी प्रसारित करता है। छात्रसंघ चुनौतियाँ उठाने, दूसरे की आवाज़ बनने के बजाय, जब खुद ही अपनी साख गंवाए तो देश का संपूर्ण लोकतांत्रिक और बौद्धिक भविष्य खतरे में पड़ता है।

हालिया मामलों में NSUI ने मांग की कि दोषी छात्र नेता को परीक्षा से निष्कासित किया जाए, निष्पक्ष जांच हो और संस्था की साख बचाई जाए। विरोध का यह स्वर आवश्यक है। लेकिन जब प्रतिक्रिया बवाल, नारेबाजी, या संगठनवाद में बदलने लगे, तब जनता के बीच संदेश जाता है कि छात्र राजनीति केवल सत्ता–लाभ, संरक्षण में उलझ गई है। ‘जनता’ शब्द यहाँ सिर्फ आम छात्रों के लिए नहीं, बल्कि उन लाखों शिक्षकों, प्रतियोगी अभ्यर्थियों और अभिभावकों के लिए भी है, जिनके लिए शिक्षा का मतलब मेहनत, अवसर और समाज में आगे बढ़ने की सीढ़ी है।

वास्तविक सुधार तभी संभव हैं, जब परीक्षा हॉल, प्रक्रिया और मूल्यांकन में हर स्तर पर सीसीटीवी, पारदर्शी ऑडिट और स्वतंत्र निगरानी हो। विश्वविद्यालय प्रशासन, चाहे कोई भी राजनीतिक दल या नेता हो, मामले की रिपोर्ट होते ही निष्पक्ष जांच करे, दोषी को निलंबित किया जाए और सभी को सार्वजनिक रूप से सूचना दी जाए। छात्रसंघों को केवल चुनाव-जीत, प्रदर्शन, या प्रेस विज्ञप्ति तक सीमित न करके, अकादमिक गुणवत्ता, अनुशासन और विद्यार्थियों की समस्याओं का समाधान केंद्र में रखा जाए। परीक्षाओं में गड़बड़ी पाए जाने पर संगठन भी जवाबदेह बने; हर अभियुक्त के साथ संगठन की जाँच अलग से हो। परीक्षार्थियों को विश्वास दिलाया जाए कि उनकी मेहनत और योग्यता सुरक्षित है, और शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया तत्काल, गोपनीय और सुलभ हो।

जब छात्रनेता, चाहे किसी भी रंगदारी के हों, परीक्षा या प्रतियोगी भर्ती को राजनीति का माध्यम बना लें, तब उस संस्था में सच, योग्यता और भविष्य का सम्मान कमजोर पड़ जाता है। यह भी अंततः पूरे समाज में भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता और बेईमानी के प्रसार के बीज बोता है। शिक्षा और राजनीति के संधि–क्षेत्र में सीमाएं और मर्यादा बने रहना बेहद जरूरी है। भारतीय विश्वविद्यालयों ने हमेशा नेताओं, आंदोलनकारियों, विचारशील नागरिकों की पूरी पीढ़ी गढ़ी है। अगर आज इसका सबसे कमजोर पक्ष उनका विश्वसनीयता और निष्पक्षता हो जाए, तो कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता।

आज जरूरत है कि NSUI, ABVP, SFI, AISF हर छात्र संगठन अपने व्यवहार और कार्यशैली में पारदर्शिता, जवाबदेही और अकादमिक नैतिकता को प्राथमिकता दें। उन्हें दिखाना होगा कि पद, विचारधारा या संगठन से ऊपर शिक्षा की साख, परीक्षा की पवित्रता और भविष्य का महत्त्व है। छात्र राजनीति को हस्तक्षेप या संरक्षण से ऊपर उठ कर, शिकायत समाधान, कोचिंग, करियर गाइडेंस, मानसिक स्वास्थ्य, लैंगिक न्याय, डिजिटल शिक्षा जैसी व्यापक विषयों पर फोकस करना चाहिए।

परीक्षा में नकल या गुटीय राजनीति कोई नया खतरा नहीं, लेकिन अब जब यह संस्थागत हो चला है, तो केवल दंड, निष्कासन या ‘नाम बड़े–काम छोटे’ के आरोप से बात न बनेगी। विश्वविद्यालय को नई टेक्नोलॉजी, स्वतंत्र पर्यवेक्षकों, बाहरी रेगुलेटर्स, और निगरानी मशीनरी की जरूरत है ताकि नकल या राजनीति का दखल हद में रहे। भारत के विश्वविद्यालयों को यह याद रखना चाहिए कि एक ईमानदार परीक्षा या निष्पक्ष नियोजन हजार घोषणाओं, भाषणों और आंदोलनों से ज्यादा मूल्यवान है।

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