अंतरराष्ट्रीयओपिनियनराजनीति

होर्मुज का महासंग्राम: ब्रिटेन-अमेरिका का नया सैन्य गठबंधन और ईरान के विरुद्ध ‘ऑपरेशन डेजर्ट शील्ड 2.0’ का शंखनाद

संकट की जड़ें: होर्मुज में 'मैरीटाइम टेरर' और ईरान की घेराबंदी

20 मार्च, 2026 की शाम लंदन के डाउनिंग स्ट्रीट (Downing Street) से निकले एक संक्षिप्त प्रेस वक्तव्य ने दुनिया की भू-राजनीतिक धुरी को हिलाकर रख दिया है। ब्रिटिश सरकार ने एक ऐतिहासिक और जोखिम भरे नीतिगत बदलाव (Major Policy Shift) के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका को अपने विदेशी सैन्य ठिकानों (Sovereign Bases) का उपयोग ईरानी मिसाइल साइटों पर प्रत्यक्ष हमलों के लिए करने की आधिकारिक अनुमति दे दी है।

यह निर्णय न केवल ईरान के लिए एक सैन्य चेतावनी है, बल्कि यह संकेत है कि वैश्विक शक्तियां अब होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यापारिक जहाजों पर हो रहे हमलों को और बर्दाश्त नहीं करेंगी। यहाँ इस जटिल सैन्य समझौते, इसमें शामिल रणनीतिक ठिकानों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके संभावित प्रलयकारी प्रभावों का 2000 शब्दों में विस्तृत विश्लेषण दिया गया है:

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की सबसे संवेदनशील ‘ऊर्जा धमनी’ है। वैश्विक कच्चे तेल का 20% और एलपीजी का 25% इसी 33 किलोमीटर चौड़े रास्ते से गुजरता है। 2026 की शुरुआत से ईरान ने ‘एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलों’ और आत्मघाती ड्रोनों का उपयोग कर पश्चिमी देशों और उनके सहयोगियों के टैंकरों को निशाना बनाना शुरू किया था। इसका उद्देश्य पश्चिम पर आर्थिक दबाव बनाना था। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के बीच हुई आपातकालीन वार्ताओं में यह निष्कर्ष निकला कि केवल ‘एस्कॉर्ट मिशन’ (जहाजों के साथ युद्धपोत भेजना) पर्याप्त नहीं है।

अब ‘सोर्स’ (मिसाइल लॉन्च पैड) को नष्ट करना अनिवार्य है। यूके ने अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुच्छेद 51 का हवाला देते हुए कहा है कि यह हमला “आक्रामक” नहीं बल्कि “रक्षात्मक” है, ताकि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) बनी रहे।

अमेरिका के पास अपने ठिकाने हैं, लेकिन ब्रिटेन के ठिकानों का भौगोलिक स्थान ईरान के मिसाइल नेटवर्क को ‘सर्जिकल’ सटीकता से भेदने के लिए सर्वोत्तम है। यह भूमध्य सागर में ब्रिटेन का सबसे महत्वपूर्ण संप्रभु बेस है। यहाँ से लंबी दूरी के मारक विमान (जैसे F-35 और टायफून) ईरान के पश्चिमी और उत्तरी मिसाइल ठिकानों तक आसानी से पहुँच सकते हैं। यह बेस लेबनान और सीरिया में ईरान के समर्थित समूहों पर भी नज़र रखने के लिए आदर्श है।

यद्यपि यह मॉरीशस के साथ विवादित है, लेकिन वर्तमान में यह ब्रिटेन के नियंत्रण में है और अमेरिका इसे ‘अजेय विमान वाहक’ की तरह उपयोग करता है। यहाँ से भारी बी-52 (B-52) और बी-2 (B-2) स्टील्थ बॉम्बर उड़ान भर सकते हैं, जो ईरान के भूमिगत (Underground) मिसाइल साइलो और बंकरों को नष्ट करने में सक्षम हैं। ब्रिटेन की रॉयल नेवी का बहरीन में स्थायी बेस (HMS Juffair) अमेरिकी नौसेना के 5वें बेड़े के साथ मिलकर ‘लॉजिस्टिक्स और इंटेलिजेंस’ का केंद्र बनेगा।

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (Pentagon) ने ‘टारगेट लिस्ट’ तैयार कर ली है। हमले का मुख्य उद्देश्य ईरान की “अटैक कैपेबिलिटी” को पंगु बनाना है तटीय क्षेत्रों में स्थित मोबाइल लॉन्चर जो जहाजों को निशाना बनाते हैं। वे ठिकाने जहाँ से ‘कामिकेज़ ड्रोन’ (Kamikaze Drones) को नियंत्रित किया जाता है। जो खाड़ी में जहाजों की सटीक लोकेशन अमेरिकी और ब्रिटिश जहाजों को ट्रैक करने के लिए उपयोग की जाती है। जो इन ऑपरेशनों का नेतृत्व कर रहे हैं।

जैसे ही लंदन से यह खबर आई, वैश्विक शेयर बाजारों और कमोडिटी मार्केट में हड़कंप मच गया ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें रातों-रात $125 प्रति बैरल के स्तर को छू गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष शुरू हुआ, तो यह $180 तक जा सकता है।व्यापारिक जहाजों के लिए ‘वॉर रिस्क इंश्योरेंस’ 400% तक बढ़ गया है। इसका सीधा असर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा।दुनिया भर में ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और खाद्यान्न की कमी हो सकती है क्योंकि कंटेनर जहाजों को अब अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ से होकर जाना पड़ेगा, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ेंगे।

ईरान के सर्वोच्च नेता और आईआरजीसी (IRGC) के कमांडरों ने इस समझौते को “सीधा युद्ध का आह्वान” बताया है। ईरान पूरी तरह से जलडमरूमध्य को ‘समुद्री सुरंगों’ (Sea Mines) से पाट सकता है, जिससे व्यापार पूरी तरह ठप हो जाएगा। ईरान समर्थित समूह (हिजबुल्लाह, हूतियों और इराक के मिलिशिया) सऊदी अरब, यूएई और इजरायल के तेल क्षेत्रों और शहरों पर रॉकेट हमला कर सकते हैं। अमेरिका और ब्रिटेन के वित्तीय संस्थानों और पावर ग्रिड्स पर बड़े पैमाने पर साइबर हमलों की आशंका जताई गई है।

भारत के लिए यह स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा करता है। ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ जैसे एलपीजी जहाजों का आना सफल रहा, लेकिन भविष्य के कार्गो अब युद्ध की भेंट चढ़ सकते हैं। खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय इस युद्ध की चपेट में आ सकते हैं। उनकी सुरक्षा और संभावित ‘निकासी’ (Evacuation) भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। भारत के ईरान (चाबहार पोर्ट) और अमेरिका (रक्षा साझेदारी) दोनों के साथ गहरे संबंध हैं। भारत को एक बार फिर ‘गुटनिरपेक्षता 2.0’ का परिचय देना होगा।

यूके में इस फैसले पर आम सहमति नहीं है लेबर पार्टी और लिबरल डेमोक्रेट्स ने सरकार से पूछा है कि क्या इसके लिए संसद (House of Commons) में वोटिंग कराई जाएगी? ‘स्टॉप द वॉर’ जैसे संगठनों ने लंदन की सड़कों पर प्रदर्शन शुरू कर दिया है, उनका मानना है कि ब्रिटेन एक और ‘इराक या अफगानिस्तान’ जैसे लंबे और निरर्थक युद्ध में फंस सकता है।

यूके द्वारा अमेरिका को अपने ठिकानों के उपयोग की अनुमति देना इस बात का प्रमाण है कि कूटनीति अब अपने अंतिम छोर पर है और बंदूकों ने बात करना शुरू कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य अब केवल एक जलमार्ग नहीं, बल्कि विश्व की नियति तय करने वाला ‘कुरुक्षेत्र’ बन गया है। अगले 48 घंटे यह तय करेंगे कि दुनिया एक बड़े आर्थिक संकट और युद्ध की ओर बढ़ेगी या कोई अंतिम क्षण की कूटनीति इस महाविनाश को टाल पाएगी।

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