संपादकीयस्‍वास्‍थ्‍य

भारत – डाइबिटीज कैपिटल: विकास की रफ्तार के बीच बिगड़ता स्वास्थ्य संतुलन

 

भारत में मधुमेह (डायबिटीज़) ने न केवल स्वास्थ्य-परिस्थिति को बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिदृश्यों को भी इस कदर प्रभावित किया है कि देश को “डायबिटीज़ की राजधानी” कहने वाले उपनाम पर विचार करना अब कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती। आज हम इस विषय पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं — सांख्यिकीय डेटा, कारण-परिणाम और चुनौतियों सहित।

डायबिटीज़ का व्यापक रूप: आंकड़ों की तस्वीर

वैश्विक रूप से देखा जाए तो, 2022 में वयस्कों में डायबिटीज़ के कुल मामलों की संख्या लगभग 8 करोड़ (≈ 828 मिलियन) थी। (Source- The Economic Times)

इस आंकड़े में से भारत ही लगभग 2.12 करोड़ ( 212 मिलियन)  डायबिटीज़ के मामलों का घर बना हुआ है। ( Source- The Economic Times)

2021-22 की एक अध्ययन के अनुसार भारत में लगभग 11.4 % वयस्कों को डायबिटीज़ है अर्थात लगभग 1.01 करोड़ ( 101 मिलियन) लोग डायबिटीज़ से ग्रस्त हैं। (Source- Mint)

इसके अतिरिक्त लगभग 15.3 % यानी करीब 1.36 करोड़ ( 136 मिलियन) लोग पूर्व-डायबिटीज़ (प्री-डायबिटिक्स) की स्थिति में हैं — जिसका अर्थ है कि उनमें आगे चलकर डायबिटीज़ होने का खतरा काफी अधिक है। (Source- The Indian Express)

नेपाल, बांग्लादेश जैसी पड़ोसी देशों के मुकाबले भारत में यह दर तेजी से बढ़ रही है।

समय के साथ यह वृद्धि बहुत तीव्र रही है — उदाहरण के लिए, 2017 में अध्ययन से पता चला था कि डायबिटीज़ की दर लगभग 7.5 % थी। (Source- Mint)

राज्य-स्तर पर भी बहुत भिन्नता है: उदाहरण के लिए, गोवा में डायबिटीज़ का प्रचलन 26.4 % पाया गया है।

क्यों भारत में इतनी बड़ी समस्या? — कारण-विश्लेषण

जीवनशैली में बदलाव

शहरीकरण, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता और बदलती आहार-प्रथाएँ इस रोग को तेज़ी से बढ़ने में मदद कर रही हैं। उदाहरण के लिए, भारत में सामान्य मोटापे (जेनेरल ऑबेसिटी) की दर लगभग 28.6 %, और पेट के आस-पास जमा वसा (अब्डोमिनल ऑबेसिटी) लगभग 39.5 % पाई गई है।  (Source- The Times Of India)

आनुवंशिक व जातीय विशेषताएँ

दक्षिण एशिया की आबादी में इंसुलिन-प्रतिरोध (Insulin Resistance) और अधिक कठिनाई से सुधारने योग्य मेटाबॉलिक प्रोफाइल पाई गई है।

भूगोल व राज्य-स्तर की विविधता

कुछ राज्यों में यह समस्या और भी तीव्र है (उदाहरण के लिए गोवा, केरल), जबकि अन्य राज्यों में प्री-डायबिटिक्स की दर अधिक है — जो भविष्य में डायबिटीज़ का “सिलेंसर” बम बन सकती है। (Source- The Times Of India)

जागरूकता व उपचार में कमी

भारत में बहुत से लोग डायबिटीज़ से ग्रस्त हैं पर उन्हें इसकी जानकारी नहीं है, या नियमित रूप से उपचार नहीं ले पा रहे हैं

डायबिटीज़ का स्वास्थ्य-सामाजिक प्रभाव

शरीर के विभिन्न अंगों पर डायबिटीज़ के गंभीर प्रभाव हो सकते हैं — जैसे कि हृदयघात, स्ट्रोक, गुर्दे की विफलता, दृष्टि हानि, पैरों में अल्सर व विकलांगता।

जन-स्वास्थ्य और आर्थिक बोझ: बढ़ती संख्या में रोगियों के कारण अस्पतालों, चिकित्सकीय संसाधनों पर दबाव बढ़ा है।

सामाजिक रूप से: बीमारी ने जीवन-शैली, काम करने की क्षमता, परिवार की आर्थिक व्यवस्था और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है।

राजधानी” क्यों कहा जा रहा है?

जब एक देश में इतनी बड़ी संख्या में डायबिटीज़ के मामले हों (भारत में 212 मिलियन) तो यह दुनिया में सर्वाधिक है और इसलिए यह उपनाम “डायबिटीज़ की राजधानी” सार्थक हो जाता है।

बढ़ती दरें, विविध राज्य-प्रचलन और आगामी वर्षों में समय-कर्षण के कारण यह समस्या और तीव्र होने का अंदेशा है।

चुनौतियाँ और आगे की राह

चुनौतियाँ

पर्याप्त स्क्रीनिंग और निदान नहीं हो पाना — बहुत से लोग डायबिटीज़ के होने पर भी पता नहीं लगने के कारण समय पर इलाज नहीं लेते।

जीवनशैली-सम्बंधित कारकों (जैसे कम शारीरिक गतिविधि, अस्वस्थ आहार, अधिक तनाव) का व्यापक प्रभाव।

सामाजिक-आर्थिक असमानता — ग्रामीण व शहरी, धनी व गरीबी-रेखाएँ-खुदरा भारों में भिन्नता।

राज्य-स्तर पर नीति तथा कार्यक्रमों में विविधता — कुछ राज्यों में बेहतर स्थिति है, कुछ में हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं।

आगे की राहत-रणनीतियाँ

राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना, स्क्रीनिंग को आम करना और प्रत्येक व्यक्ति को समय-समय पर जांच कराने के लिए प्रेरित करना।

जीवनशैली में परिवर्तन: संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, धूम्रपान व शराब से परहेज, पर्याप्त नींद।

राज्य-विशिष्ट नीति-निर्माण: चुने गए राज्यों में जलद हस्तक्षेप, संसाधन-वितरण में प्राथमिकता।

स्वास्थ्य-प्रणाली में सुधार: ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकीय पहुँच बढ़ाना, मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करना।

समुदाय-आधारित कार्यक्रम: स्थानीय समूहों, स्वयं-सेवी संस्थाओं, स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता अभियान करना।

निष्कर्ष

भारत में डायबिटीज़ एक गंभीर सार्वजनिक-स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। इतने बड़े पैमाने पर प्रभावित आबादी, बढ़ती दरें, सामाजिक-और-आर्थिक प्रभाव — इन सभी को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत लगभग “डायबिटीज़ की राजधानी” की स्थिति में है। लेकिन यह कोई अवश्य-निराशा की कहानी नहीं है। समय रहते सक्रिय कदम उठाए जाएँ तो स्थिति को रोका जा सकता है। जीवनशैली-संवेदना, जन-जागरूकता, नीति-सुधार और ठोस संसाधन वितरण से इस “राजधानी” की चुनौती को कम किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

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