इजराइल-ईरान जंग – भारत का रुख घरेलु राजनीति के दबाव से निर्धारित नहीं हो सकता…
दोनों मित्र देशों में से किसी एक का समर्थन करने की बजाय शांति स्थापित करने के प्रयासों को आगे बढ़ाना में भारत भूमिका निभाए.
इजराइल और ईरान दोनों भारत के मित्र देश हैं। ईरान उन गिने-चुने मुस्लिम देशों में शामिल है जिसने भारत के लिये कभी मुसीबत खड़ी नहीं की। ऐसे में ईरान और इजरायल की जंग में भारत का किसी एक पक्ष में खड़ा होना मुश्किल है और खड़ा होना भी नहीं चाहिए। पर भारत में तमाम विपक्षी पार्टियां सरकार पर ईरान के समर्थन में बयान देने का दबाव बना रही हैं और खुद ईरान के पक्ष में और इजराइल के विरोध में खुलकर आवाज बुलंद कर रही हैं। दरअसल भारत की घरेलू राजनीति ही नेताओं का रुख तय करती है और चूंकि सवाल 10-15 करोड़ वोटों का है तो इसलिए जाहिर सी बात है कि एक तबका कोशिश करेगा की ईरान के पक्ष में भारत सरकार अपना रुख कायम करे। जबकि सरकार के रुख से साफ है कि संतुलन बनाए रखना चाहती है और विदेश निति को घरेलु राजनीति में होने वाले नफे- नुकसान से देखने की वजाय एक समयमित और संतुलित रुख अपना रही है। क्यूंकि भारत के दोनों देशों से मित्रवत सम्बन्ध है और समय-समय पर दोनों ही देशों ने भारत के साथ उस मित्रता को निभाया भी है.
अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किये गए हमले के विरोध में रमजान के पवित्र महीने की दलील दी जा रही है पर वही दूसरी ओर ऐसी दलील देने वाले भूल रहे है कि 07 अक्टूबर का दिन जो इजराइल के लिए भी उतना ही पवित्र था जितना की मुसलमानों के लिए राजमन का महीना। उस रोज हमास ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए 1200 से अधिक इजरायली नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। महिलाओं के साथ बलात्कार किया, ओवन में मासूम बच्चों को जलाया गया पर तब किसी भी मुस्लिम संगठन और भारत की विपक्षी पार्टियों की तरफ से कोई गुस्सा, रैली या बयान नहीं आए जैसे अब आ रहे हैं। फिर ये हमदर्दी सिर्फ एक तरफ ही क्यों ? क्या इजरायली नागरिकों को जीने का हक नहीं था..? क्या मानवता वाला एंगल सिर्फ मुस्लिम देशों पर ही लागू होता है..? जो हमास इसके लिए जिम्मेदार हैं उसकी पूरी बैक-बोन ईरान ही था या यूं कह लें कि हमास, खामनेई की तीन ताकतों में से एक है। बाकी दो ताकतें हुती और हिजबुल्लाह है.
तो कुल मिलाकर बात यह है कि इजराइल के मरने वाले भी थे तो इंसान ही पर वो भारत में बोट बैंक नहीं है इसलिए उनका दर्द यहां किसी का नहीं। जबकि भारत का विपक्ष जानता है कि मुसलमान कही का भी हो, भारत का मुसलमान उससे स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ रहता है इसलिए तमाम विपक्षी पार्टियां इजराइल के विरोध में हरदम खड़ी रहती है क्यूंकि सवाल बहुत बड़े और समर्पित वोट-बैंक का है। अगर मानवता से इन राजनैतिक दलों का संबंध होता तो इजराइल छोड़ो बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हो रही हिंसा पर कम से कम कुछ तो कहते.
इसमें कोई संदेह नहीं है की अमेरिका द्वारा ईरान में किया गया हमला साफ-साफ़ अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संप्रभुता का उल्लंघन है। पर यह भी उतना ही सच है की ईरान में खामनेई शासन भी खुले तौर पर डेथ टू इजराइल और डेथ टू अमेरिका की नीति को अपनाता रहा है। तो फिर दोष सिर्फ अमेरिका-इजराइल का ही क्यों ? ईरान की तरफ से किये जा रहे जवाबी हमले ईरान की छटपटाहट को साफ़ तौर पर दिखाते हैं। ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमले पूरी खाड़ी के देशों में असुरक्षा और अशांति का भाव पैदा कर रहे हैं। ईरान ने सऊदी अरब, बहरीन, UAE, क़तर और जॉर्डन सहित ओमान पर भी मिसाइल हमले किये हैं। अकेले UAE में ईरान द्वारा दागी गयी 150 से अधिक मिसाइलें और 500 से अधिक ड्रोन इंटरसेप्ट किये जाने की खबर है। ऐसे में ईरान का यह कदम तनाव को बढ़ाने और मध्य-पूर्व में ईरान के नये दुश्मन पैदा करने के साथ ही मुस्लिम देशों की एकता में खलल डालने का काम कर सकता है.
ईरान युद्ध से भारत बुरी तरह प्रभावित हो सकता है , क्यूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बहुत हद तक ईरान और खाड़ी के देशों पर निर्भर है। साथ ही युद्ध की वजह से होर्मुज स्ट्रीट बंद होने से व्यपार बुरी तरह ठप हो सकता है जिससे भारत और पूरी दुनिया को आर्थिक नुक्सान होना तय है। ऐसे में भारत का शांति की वकालत करना उसके अपने निजी हितों के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय हितों के लिये भी लाभकारी है और किसी एक तरफ खड़े होने की बजाय युद्ध को रुकवाने के कूटनीतिक और राजनयिक प्रयासों की वकालत करना अभी सबके हित में है। लेकिन भारत के विपक्ष का यह मानना की भारत सरकार को ईरान का समर्थन करना चाहिए महज एक और वोट-बैंक को साधने की कोशिश के अतिरिक्त और कुछ नहीं है.



