
आजकल आप जहां भी सेहत और फिटनेस की चर्चा सुनेंगे ऑफिस के लंच ब्रेक में, जिम की लॉबी में, या सोशल मीडिया पोस्ट में वहां “इंटरमिटेंट फास्टिंग” का नाम जरूर आएगा। कुछ लोग इसे चमत्कारिक तरीका बताते हैं, तो कुछ इसे एक और फैशन की लहर मानते हैं जो समय के साथ गायब हो जाएगा। इस बहस के बीच यह समझना जरूरी है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग है क्या, इसका विज्ञान क्या कहता है, और इससे जुड़े फायदे और खतरे क्या हैं।
इंटरमिटेंट फास्टिंग (IF) खाने का एक पैटर्न है, न कि कोई तय भोजन सूची। इसमें समय के लिए भोजन को सीमित किया जाता है और बाकी समय उपवास रखा जाता है। इसके कई तरीके हैं: 16 घंटे उपवास, 8 घंटे भोजन। हफ्ते में 5 दिन सामान्य भोजन, 2 दिन बहुत कम कैलोरी। हफ्ते में एक या दो बार 24 घंटे का उपवास।
भारत में, धार्मिक उपवास और पारंपरिक भोजन पद्धतियां पहले से मौजूद हैं, जिससे यह तरीका अपनाना कई लोगों के लिए स्वाभाविक लगता है।
जब लंबे समय तक भोजन नहीं करते, तो शरीर ऊर्जा के लिए जमा वसा का उपयोग करने लगता है। इससे वजन घट सकता है और इंसुलिन संवेदनशीलता बेहतर होती है, जो टाइप-2 डायबिटीज़ के खतरे को कम कर सकती है।
कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग से खराब कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और सूजन के स्तर में कमी आ सकती है। साथ ही, “ऑटोफैजी” नामक प्रक्रिया (जिसमें खराब कोशिकाएं स्वयं नष्ट होकर नई कोशिकाओं को जगह देती हैं) भी सक्रिय होती है, जो लंबी उम्र और बीमारियों से बचाव में कारगर मानी जाती है।
कुछ रिसर्च यह भी बताती हैं कि सीमित समय पर भोजन करने से मस्तिष्क की कार्यक्षमता और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ सकती है, हालांकि इस क्षेत्र में और साक्ष्य की आवश्यकता है।पहले कुछ हफ्तों में ज़्यादा भूख लगना, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, और ऊर्जा की कमी महसूस हो सकती है।
मधुमेह के मरीजों में शुगर का स्तर बहुत कम हो सकता है। जिनका बॉडी वेट पहले से कम है, उनमें कुपोषण का खतरा। लंबे समय तक गलत तरीके से पालन करने पर हार्मोनल असंतुलन, खासकर महिलाओं में, हो सकता है। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएं, किशोर, बुजुर्ग, ईटिंग डिसऑर्डर के शिकार लोग, और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे व्यक्ति बिना चिकित्सकीय सलाह के इसे न अपनाएं।
भारत में इंटरमिटेंट फास्टिंग तेजी से लोकप्रिय हो रहा है कारण हैं शहरी जीवनशैली में मोटापा, डेस्क जॉब वाली दिनचर्या, और सेलेब्रिटी एंडोर्समेंट। पारंपरिक उपवास संस्कृति भी लोगों को इस पैटर्न को अपनाने में सहज बनाती है। हालांकि, कार्य समय, परिवार के साथ सामूहिक भोजन की आदतें, और त्योहार जैसी सामाजिक परिस्थितियां कई बार इसे सस्टेनेबल नहीं बनने देतीं।
इंटरमिटेंट फास्टिंग न ‘जादुई उपाय’ है, न ही केवल फैशन का हिस्सा। वजन घटाना, इंसुलिन संवेदनशीलता में वृद्धि, हृदय और कोशिकीय स्वास्थ्य में सुधार। हर किसी के लिए उपयुक्त नहीं, और लंबे समय के प्रभाव पर अभी पर्याप्त शोध नहीं। यह तभी कारगर है जब इसे संतुलित एवं पोषक भोजन, पर्याप्त जल सेवन, और अपनी क्षमता अनुसार अपनाया जाए।
हर व्यक्ति का शरीर, दिनचर्या और मानसिक स्थिति अलग होती है। कुछ लोग 16:8 पैटर्न में ऊर्जा से भरपूर और मानसिक रूप से बेहतर महसूस करते हैं, तो कुछ को थकान और चिड़चिड़ापन होता है। इसलिए “किसी पर जोर डालकर” नहीं, बल्कि “स्वयं के लिए उपयुक्त तरीके” से ही इसे आज़माना चाहिए।
इंटरमिटेंट फास्टिंग में विज्ञान भी है और ट्रेंड का असर भी। यह उन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है जो इसे सावधानी, विशेषज्ञ सलाह और उचित पोषण के साथ अपनाते हैं। लेकिन आंख बंद करके इसे अपनाना, सिर्फ वजन घटाने के लालच में, सेहत से खिलवाड़ हो सकता है।
भविष्य में, अधिक शोध, जागरूकता और व्यक्तिगत अनुकूलन के साथ, यह सेहतमंद जीवनशैली का स्थायी हिस्सा बन सकता है। तब इसे फैड नहीं, बल्कि स्वास्थ्य-केन्द्रित सोच का एक परिपक्व रूप कहा जाएगा।



