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निपाह का पुनरागमन: पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य आपातकाल और वैश्विक सतर्कता की चुनौती

पश्चिम बंगाल: 19 साल का अंतराल और संवेदनशीलता

पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस (Nipah Virus) के दो मामलों की पुष्टि ने पूरे दक्षिण एशिया के स्वास्थ्य गलियारों में एक भयावह सिहरन पैदा कर दी है। 19 साल के लंबे अंतराल के बाद इस जानलेवा रोगजनक (Pathogen) की बंगाल की मिट्टी पर वापसी केवल एक राज्य की स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति के लिए एक अग्निपरीक्षा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा 196 संपर्क व्यक्तियों की पहचान और उन पर चौबीस घंटे की निगरानी यह स्पष्ट करती है कि हम एक ऐसे दुश्मन का सामना कर रहे हैं जिसकी मृत्यु दर (Fatality Rate) कोविड-19 से भी कई गुना अधिक है।

जब हम 2026 में कदम रख रहे हैं, तो हमें उम्मीद थी कि महामारी का दौर पीछे छूट गया है। लेकिन पश्चिम बंगाल के ताजा मामलों ने यह साबित कर दिया है कि प्रकृति के गुप्त कोनों में छिपे वायरस कभी भी लौट सकते हैं। थाईलैंड और नेपाल द्वारा भारतीय यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू करना इस बात का संकेत है कि ‘निपाह’ शब्द अब दक्षिण एशिया में दहशत का पर्याय बन चुका है।

निपाह वायरस (NiV) एक ‘ज़ूनोटिक’ वायरस है, जिसका अर्थ है कि यह जानवरों से मनुष्यों में फैलता है। इसका प्राकृतिक भंडार ‘टेरोपस’ (Pteropus) वंश के फल खाने वाले चमगादड़ (Fruit Bats) हैं। WHO के अनुसार, निपाह की मृत्यु दर 40% से 75% तक हो सकती है। तुलनात्मक रूप से, कोविड-19 की मृत्यु दर अधिकांश क्षेत्रों में 1-2% के आसपास थी। यह इसे ‘बायो-सेफ्टी लेवल 4’ (BSL-4) का रोगजनक बनाता है, जिसके लिए उच्चतम स्तर की प्रयोगशाला सुरक्षा की आवश्यकता होती है। यह वायरस दूषित भोजन (जैसे चमगादड़ द्वारा कुतरे गए फल या खजूर का कच्चा रस) के माध्यम से या संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक तरल पदार्थ (थूक, रक्त) के सीधे संपर्क से फैलता है।

पश्चिम बंगाल में निपाह का इतिहास पुराना और दर्दनाक रहा है। 2001 में सिलीगुड़ी में इसके प्रकोप ने 45 लोगों की जान ली थी, और 2007 में नादिया में भी इसने दस्तक दी थी। 19 साल बाद इसकी वापसी कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है क्या वायरस इतने वर्षों तक बंगाल के जंगलों में सुप्त अवस्था में था, या यह प्रवासी चमगादड़ों के माध्यम से आया है? जैसे-जैसे मानव बस्तियाँ जंगलों की ओर बढ़ रही हैं, चमगादड़ों और मनुष्यों के बीच का संपर्क (Spillover Event) बढ़ रहा है। खजूर के पेड़ों के पास बढ़ती मानवीय गतिविधियाँ इस जोखिम को और बढ़ा देती हैं।

पश्चिम बंगाल में मामलों की पुष्टि होते ही दक्षिण एशिया की कूटनीति और स्वास्थ्य नीति में हलचल मच गई। थाईलैंड, जो स्वयं ‘बैट-बोर्न’ (Bat-borne) वायरस के प्रति संवेदनशील रहा है, ने भारतीय हवाई अड्डों से आने वाले यात्रियों के लिए कड़े थर्मल स्कैनिंग नियम लागू किए हैं। नेपाल के साथ भारत की खुली सीमा एक बड़ी चुनौती है। नेपाल के स्वास्थ्य अधिकारियों ने सीमा चौकियों पर ‘हेल्थ डेस्क’ सक्रिय कर दिए हैं, जो यात्रा इतिहास की बारीकी से जांच कर रहे हैं। इस तरह की स्क्रीनिंग व्यापार और पर्यटन के लिए एक बड़ा झटका है, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से यह अनिवार्य कदम माना जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बार बहुत तेजी से प्रतिक्रिया दी है। 196 संपर्क व्यक्तियों (Contact Persons) की पहचान करना एक बहुत बड़ा लॉजिस्टिक कार्य था। हालांकि ये सभी 196 व्यक्ति वर्तमान में नेगेटिव हैं, लेकिन निपाह का ‘इन्क्यूबेशन पीरियड’ (संक्रमण से लक्षण दिखने का समय) 4 से 14 दिनों का होता है, और कुछ मामलों में यह 45 दिनों तक भी जा सकता है। इसलिए, ‘असिम्प्टोमैटिक’ (लक्षणहीन) होने के बावजूद उन्हें एकांत (Quarantine) में रखना अनिवार्य है। नमूनों को पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) जैसी उच्च-सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं में भेजना और उनकी सटीक जांच करना हमारी प्रतिक्रिया प्रणाली की रीढ़ है।

निपाह जैसे खतरों से लड़ने के लिए हमें पारंपरिक स्वास्थ्य नीतियों से ऊपर उठना होगा। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों में खजूर का कच्चा रस पीना एक परंपरा है। इसे पूरी तरह बंद करना या रस संग्रह करने वाले बर्तनों पर ‘बैट-प्रूफ’ जाली लगाना अनिवार्य होना चाहिए। वर्तमान में निपाह के लिए कोई मानव टीका (Vaccine) उपलब्ध नहीं है। यह वैश्विक फार्मा कंपनियों के लिए एक चुनौती है कि वे ‘प्रायोरिटी पैथोजन्स’ (Priority Pathogens) पर अपना शोध तेज करें। सार्क (SAARC) या बिम्सटेक (BIMSTEC) जैसे संगठनों को एक ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ विकसित करना चाहिए ताकि एक देश में मामला मिलने पर तुरंत पूरे क्षेत्र में समन्वित कार्रवाई हो सके।

पश्चिम बंगाल में निपाह की वापसी हमें यह याद दिलाती है कि हम एक “वैश्विक गांव” में रहते हैं जहाँ एक कोने में पनपा वायरस घंटों में दूसरे देश पहुँच सकता है। 196 लोगों की निगरानी हमारी तत्परता को दर्शाती है, लेकिन थाईलैंड और नेपाल की प्रतिक्रिया हमारी सामूहिक असुरक्षा को उजागर करती है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि जब तक हम जानवरों के प्राकृतिक आवासों का सम्मान नहीं करेंगे और अपनी निगरानी प्रणालियों को ‘हाइपर-लोकल’ स्तर पर मजबूत नहीं करेंगे, तब तक निपाह जैसे मूक शिकारी हमारे दरवाजे पर दस्तक देते रहेंगे। यह समय दहशत का नहीं, बल्कि विज्ञान-आधारित सतर्कता और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का है।

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