मैत्री की नई ऊर्जा धारा: भारत-बांग्लादेश पाइपलाइन और दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति
भू-राजनीतिक महत्व: 'ऊर्जा कूटनीति' का प्रभाव

मार्च 2026 का यह सप्ताह दक्षिण एशिया के ऊर्जा मानचित्र पर एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बनकर उभरा है। जब असम की नुमालीगढ़ रिफाइनरी (NRL) से 5,000 टन हाई-स्पीड डीजल की पहली खेप बांग्लादेश-भारत मैत्री पाइपलाइन (BIFP) के माध्यम से सीमा पार भेजी गई, तो यह केवल ईंधन का प्रवाह नहीं था, बल्कि यह भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ (Neighborhood First) नीति की एक बड़ी कूटनीतिक जीत थी। पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी भीषण संघर्ष ने जहाँ वैश्विक तेल आपूर्ति को खतरे में डाल दिया है, वहीं भारत ने अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश के लिए एक सुरक्षित और निरंतर ‘ऊर्जा गलियारा’ सुनिश्चित किया है।
यह पाइपलाइन भारत और बांग्लादेश के बीच पहली सीमा पार ऊर्जा पाइपलाइन है। इसे दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों द्वारा क्षेत्रीय सहयोग को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के उद्देश्य से परिकल्पित किया गया था। यह पाइपलाइन भारत के पश्चिम बंगाल में स्थित सिलीगुड़ी (नुमालीगढ़ रिफाइनरी के मार्केटिंग टर्मिनल) को बांग्लादेश के दिनाजपुर जिले के पार्बतीपुर स्थित तेल डिपो से जोड़ती है।
इसकी कुल लंबाई लगभग 131.5 किलोमीटर है, जिसमें से करीब 126.5 किलोमीटर हिस्सा बांग्लादेश में और 5 किलोमीटर भारत में है। इसकी वार्षिक क्षमता 10 लाख मीट्रिक टन (1 MMTPA) डीजल परिवहन की है। असम स्थित यह रिफाइनरी उत्तर-पूर्व भारत का गौरव है। पाइपलाइन की मांग को पूरा करने के लिए इस रिफाइनरी की क्षमता को 3 एमएमटीपीए से बढ़ाकर 9 एमएमटीपीए किया गया है, जिससे यह क्षेत्र का एक प्रमुख ‘एनर्जी हब’ बन गया है।
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ समय से विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और बढ़ती वैश्विक महंगाई के कारण दबाव में रही है। मार्च 2026 में मध्य पूर्व के संघर्ष ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया लाल सागर और स्वेज नहर में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों का बांग्लादेश के चटगांव (Chittagong) बंदरगाह तक पहुँचना न केवल महंगा हो गया है, बल्कि असुरक्षित भी।
मध्य पूर्व से तेल की खेप आने में होने वाली देरी ने बांग्लादेश के कृषि क्षेत्र (सिंचाई के लिए डीजल की आवश्यकता) और औद्योगिक बिजली उत्पादन को ठप करने की चेतावनी दे दी थी। ऐसे समय में, भारत से जमीन के रास्ते पाइपलाइन द्वारा डीजल की आपूर्ति ने बांग्लादेश को “स्पॉट मार्केट” की अत्यधिक ऊंची कीमतों और अनिश्चितता से बचा लिया है।
इस पाइपलाइन से पहले, भारत से बांग्लादेश को डीजल का निर्यात मुख्य रूप से रेल के जरिए (हल्दबाड़ी-चिलाहाटी मार्ग) किया जाता था। पाइपलाइन में स्विच करने से क्रांतिकारी बदलाव आए हैं रेल द्वारा परिवहन में प्रति टन लागत काफी अधिक थी। पाइपलाइन के माध्यम से यह लागत लगभग 50-60% कम हो गई है। रेल वैगनों को सीमा पार करने, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं और अनलोडिंग में कई दिन लगते थे। अब, डीजल कुछ ही घंटों में सीधे पार्बतीपुर डिपो पहुँच जाता है। पाइपलाइन परिवहन कार्बन उत्सर्जन को कम करता है क्योंकि इसमें हजारों ट्रकों या सैकड़ों रेल इंजनों के धुएं की आवश्यकता नहीं होती।
दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका अब केवल एक बड़े भाई की नहीं, बल्कि एक ‘नेट सिक्योरिटी और रिसोर्स प्रोवाइडर’ (Net Security and Resource Provider) की हो गई है। श्रीलंका के आर्थिक संकट के समय मदद के बाद, अब बांग्लादेश को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान कर भारत ने यह साबित किया है कि संकट के समय पड़ोसी ही सबसे पहले काम आता है। चीन क्षेत्र में भारी निवेश के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। भारत का यह ‘कनेक्टिविटी’ मॉडल, जो प्रत्यक्ष रूप से जनता की बुनियादी जरूरतों (ईंधन और बिजली) को पूरा करता है, अधिक टिकाऊ और विश्वसनीय है। यह पाइपलाइन भविष्य में ‘बीबीआईएन’ (भूटान, बांग्लादेश, भारत, नेपाल) उप-क्षेत्रीय सहयोग के लिए एक प्रेरणा बनेगी, जहाँ ऊर्जा, जल और बिजली का साझा उपयोग किया जा सकेगा।
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, और मार्च-अप्रैल का समय वहां सिंचाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। पार्बतीपुर डिपो से उत्तरी बांग्लादेश के 16 जिलों को डीजल की आपूर्ति होती है। यह क्षेत्र बांग्लादेश का ‘अन्न भंडार’ माना जाता है। पाइपलाइन से मिलने वाला सस्ता और निरंतर डीजल वहां की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। बांग्लादेश के कपड़ा (Garment) उद्योग, जो देश के निर्यात का 80% हिस्सा है, को निरंतर बिजली की आवश्यकता होती है। डीजल की उपलब्धता से वहां के बैकअप पावर जनरेटर सुचारू रूप से चल सकेंगे।
मैत्री पाइपलाइन तो बस शुरुआत है। भारत और बांग्लादेश के बीच ऊर्जा सहयोग के अन्य आयाम भी तेजी से विकसित हो रहे हैं झारखंड के गोड्डा से बांग्लादेश को बिजली की आपूर्ति पहले ही शुरू हो चुकी है। भविष्य में भारत से बांग्लादेश को प्राकृतिक गैस (LNG) भेजने के लिए भी पाइपलाइन विस्तार पर विचार किया जा रहा है। वैश्विक डॉलर संकट को देखते हुए, दोनों देश अब ऊर्जा व्यापार का भुगतान रुपये (INR) और टका (BDT) में करने की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा।
5,000 टन डीजल की यह पहली पंपिंग केवल एक व्यावसायिक सौदा नहीं है; यह भारत और बांग्लादेश के बीच के “रक्त संबंधों” (जो 1971 के मुक्ति संग्राम से शुरू हुए थे) का आधुनिक और आर्थिक विस्तार है। जब दुनिया युद्ध और विभाजन की बात कर रही है, तब भारत और बांग्लादेश पाइपलाइनों और बिजली ग्रिडों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।



