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पश्चिम एशिया में शांति की पुकार: यूएई की कूटनीतिक आक्रामकता और ईरान के साथ बढ़ता क्षेत्रीय तनाव

भविष्य की चुनौतियां और डी-एस्केलेशन (De-escalation) का मार्ग

भारत में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राजदूत अब्दुलनासिर जमाल अलशाली द्वारा ईरान को लेकर दिया गया हालिया बयान केवल एक औपचारिक राजनयिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया (West Asia) के बदलते शक्ति समीकरणों का एक स्पष्ट प्रतिबिंब है। राजदूत अलशाली ने ईरान द्वारा “बिना शर्त युद्धविराम” (Unconditional Ceasefire) की मांग करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि अब शब्दों का समय समाप्त हो चुका है और दुनिया को “जमीनी कार्रवाइयों” के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब पूरा क्षेत्र एक बड़े युद्ध की कगार पर खड़ा है। यूएई, जो अपनी पहचान एक वैश्विक व्यापारिक और पर्यटन केंद्र के रूप में बना चुका है, इस अस्थिरता को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में देख रहा है।

राजदूत अलशाली ने अपने संबोधन में जिस “कार्रवाई बनाम बयान” (Actions vs Statements) के सिद्धांत पर जोर दिया है, वह ईरान की पारंपरिक ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ पर एक सीधा प्रहार है। “बिना शर्त” शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्सर युद्धविराम वार्ताओं में पक्षकार कई तरह की पूर्व-शर्तें रखते हैं, जिससे प्रक्रिया जटिल हो जाती है। यूएई का तर्क है कि मानवीय आधार पर और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए हिंसा का तुरंत रुकना ही एकमात्र विकल्प है। यूएई का मानना है कि ईरान शांति की बात तो करता है, लेकिन उसके समर्थित समूह (जैसे हुथी, हिजबुल्लाह) क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहे हैं। अलशाली का बयान अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह याद दिलाने की कोशिश है कि वे ईरान के शब्दों के बहकावे में न आएं।

राजदूत ने एक बहुत ही कड़ा संदेश दिया कि यूएई “अपनी संप्रभुता की रक्षा करने का अधिकार सुरक्षित रखता है।” इसके कई गहरे रणनीतिक मायने हैं पिछले एक दशक में यूएई ने अपनी सैन्य क्षमता और वायु रक्षा प्रणाली (जैसे THAAD और पैट्रियट मिसाइल प्रणाली) में भारी निवेश किया है। अलशाली का बयान संकेत देता है कि यूएई अब केवल कूटनीति पर निर्भर नहीं रहेगा। यूएई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी सीमाओं या उसके आर्थिक हितों (जैसे तेल टैंकर और बुनियादी ढांचे) पर कोई भी हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करने के बाद, यूएई की सुरक्षा चिंताओं ने एक नया आयाम ले लिया है। वह अब इस क्षेत्र में ईरान के बढ़ते ‘ड्रोन और मिसाइल प्रभाव’ के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन का हिस्सा है।

राजदूत अलशाली ने UNSC से केवल “निंदा” करने से आगे बढ़कर “निवारक कार्रवाई” करने का आग्रह किया है। यूएई चाहता है कि सुरक्षा परिषद ईरान के हथियारों के प्रसार और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों में बाधा डालने की कोशिशों को रोकने के लिए कड़े प्रतिबंधों या प्रस्तावों का उपयोग करे। चूंकि यूएई एक प्रमुख वैश्विक शिपिंग हब है, इसलिए वह जानता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य या लाल सागर में कोई भी व्यवधान वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर धकेल सकता है।

भारत में यूएई के राजदूत द्वारा यह कड़ा संदेश देना एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। भारत और यूएई के बीच ‘व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता’ (CEPA) और ‘I2U2’ (भारत, इजरायल, यूएई, अमेरिका) जैसे गठबंधन यह दर्शाते हैं कि दोनों देश क्षेत्रीय स्थिरता के लिए समान हित रखते हैं। भारत के लिए पश्चिम एशिया में शांति अनिवार्य है क्योंकि उसकी ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा हिस्सा यहाँ से आता है और लाखों भारतीय नागरिक यूएई और खाड़ी देशों में रहते हैं।

अलशाली जानते हैं कि भारत की आवाज वैश्विक मंच पर (खासकर ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में) बहुत वजन रखती है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) की सफलता पूरी तरह से इस क्षेत्र में शांति पर निर्भर है। ईरान की आक्रामकता इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए सबसे बड़ा अवरोध है।

पश्चिम एशिया में इस समय दो अलग-अलग विजन (Vision) टकरा रहे हैं:

पहलू यूएई का विजन (Vision 2030) ईरान का विजन (प्रतिरोध का धुरी)
प्राथमिकता आर्थिक विकास, पर्यटन और तकनीक वैचारिक प्रसार और सैन्य प्रभाव
दृष्टिकोण वैश्विक एकीकरण और शांति समझौते क्षेत्रीय समूहों (Proxies) के जरिए दबाव
कूटनीति बहुपक्षीय और समझौतावादी प्रतिशोधात्मक और आक्रामक

राजदूत अलशाली का बयान इसी टकराव का परिणाम है। यूएई को डर है कि ईरान की कार्रवाइयां पूरे क्षेत्र को ‘अंधकार युग’ में वापस ले जा सकती हैं, जहाँ आर्थिक विकास के बजाय केवल युद्ध की चर्चा होगी।

राजदूत के आह्वान के बावजूद, शांति का मार्ग चुनौतियों से भरा है यूएई और ईरान के बीच दशकों पुराने मतभेद हैं। बिना किसी ठोस अंतरराष्ट्रीय गारंटी के, ईरान द्वारा युद्धविराम की संभावना कम दिखाई देती है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरे क्षेत्र के लिए एक अनसुलझा खतरा बना हुआ है, जो कूटनीतिक वार्ताओं को अक्सर पटरी से उतार देता है। यूएई का मानना है कि वास्तविक शांति केवल तभी आ सकती है जब ईरान अपने क्षेत्रीय विस्तारवादी एजेंडे को छोड़े और एक सामान्य राष्ट्र के रूप में पड़ोसियों के साथ व्यवहार करे।

राजदूत अब्दुलनासिर जमाल अलशाली का बयान केवल ईरान की आलोचना नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। यूएई ने स्पष्ट कर दिया है कि वह शांति के लिए अपना हाथ बढ़ाने के साथ-साथ अपनी संप्रभुता के लिए तलवार उठाने में भी संकोच नहीं करेगा।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यूएई के इस आग्रह पर कोई कड़ा कदम उठाती है। यदि क्षेत्र में “बिना शर्त युद्धविराम” नहीं होता है, तो संघर्ष का दायरा बढ़ने की आशंका बनी रहेगी, जिसका असर केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ेगा। भारत के लिए यह समय अपनी ‘ऊर्जा कूटनीति’ को सक्रिय करने और यूएई जैसे मित्रों के साथ मिलकर क्षेत्र में संतुलन बनाने का है।

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