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दिल्ली में बिजली संकट का गहराता साया: ₹30,000 करोड़ का बकाया और उपभोक्ताओं पर ‘टैरिफ शॉक’ का खतरा

APTEL के कड़े रुख और भविष्य की महंगी बिजली

20 अप्रैल, 2026 को दिल्ली के ऊर्जा क्षेत्र से आई एक बड़ी खबर ने राजधानी के लाखों उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) ने दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (DERC) की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें बिजली वितरण कंपनियों (Discoms) के पुराने बकाये, जो लगभग ₹30,000 करोड़ के आसपास है, के भुगतान की समयसीमा को बढ़ाने की मांग की गई थी।

यह फैसला दिल्ली की बिजली राजनीति और उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर डालने वाला है। अब दिल्ली सरकार और विनियामक आयोग के पास ‘सुप्रीम कोर्ट’ द्वारा पहले से तय किए गए कड़े भुगतान कार्यक्रम (Repayment Schedule) का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि आने वाले महीनों में दिल्लीवासियों को बिजली के बिलों में एक ऐसी भारी बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है, जिसकी कल्पना शायद उन्होंने नहीं की थी।

दिल्ली में बिजली की कीमतों और आपूर्ति के बीच एक दशक से भी अधिक समय से ‘वित्तीय असंतुलन’ बना हुआ है। इसे समझने के लिए ‘रेगुलेटरी एसेट’ (Regulatory Assets) को समझना अनिवार्य है। पिछले कई वर्षों में वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर कोयले, गैस और बिजली खरीद की लागत (Power Purchase Cost) में भारी वृद्धि हुई है। हालांकि, दिल्ली में ‘सस्ती बिजली’ की राजनीति के कारण डिस्कॉम्स (BYPL, BRPL, TPDDL) को बिजली दरों में उस अनुपात में बढ़ोतरी की अनुमति नहीं दी गई।

डिस्कॉम्स ने जो बिजली महंगी खरीदी और उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत सस्ती बेची, उस घाटे को ‘रेगुलेटरी एसेट’ के रूप में दर्ज किया गया। कंपनियों का तर्क है कि यह उनकी ‘कमाई’ है जिसे सरकार/आयोग ने अभी तक उन्हें वसूलने नहीं दिया है। यह बकाया राशि कोई स्थिर राशि नहीं है। ₹30,000 करोड़ के इस पहाड़ पर भारी ब्याज भी लग रहा है, जिससे यह आंकड़ा हर साल और भी विशाल होता जा रहा है।

अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए डिस्कॉम्स की वित्तीय स्थिति पर चिंता व्यक्त की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि डिस्कॉम्स को दिवालिया होने से बचाने के लिए राज्य विनियामक आयोगों को पुराने बकाये को चुकाना शुरू करना होगा। कोर्ट ने अप्रैल 2024 से अप्रैल 2028 तक की एक सख्त समयसीमा तय की थी।

DERC ने APTEL का दरवाजा खटखटाते हुए दलील दी कि यदि ₹30,000 करोड़ की वसूली 2028 तक ही करनी पड़ी, तो उपभोक्ताओं पर प्रति माह बिजली बिलों में अचानक भारी वृद्धि होगी। आयोग चाहता था कि इस अवधि को 2032 या 2035 तक बढ़ाया जाए ताकि बोझ को किस्तों में बांटा जा सके। न्यायाधिकरण ने DERC की इस दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि “उपभोक्ताओं के हितों की आड़ में डिस्कॉम्स की वित्तीय स्थिरता को और अधिक समय तक दांव पर नहीं लगाया जा सकता।” APTEL ने माना कि देरी से भुगतान का मतलब है अधिक ब्याज, जो अंततः उपभोक्ताओं को ही देना होगा।

विशेषज्ञों और ट्रेड एनालिस्ट्स के अनुसार, इस फैसले के बाद दिल्ली के टैरिफ ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।बिजली बिल का एक बड़ा हिस्सा पीपीएसी अधिभार होता है। पुराने बकाये को चुकाने के लिए DERC को इस अधिभार में 15% से 25% तक की बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।

दिल्ली के बिजली बिलों में पहले से ही पेंशन ट्रस्ट जैसे अधिभार शामिल हैं। अब ₹30,000 करोड़ की वसूली के लिए एक नया ‘रिकवरी सरचार्ज’ (Recovery Surcharge) लगाया जा सकता है। जो उपभोक्ता 200 यूनिट से अधिक बिजली खर्च करते हैं और वर्तमान में सब्सिडी का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं, उनके लिए मासिक बिजली बिल में ₹500 से ₹2000 तक की वृद्धि संभव है।

दिल्ली सरकार वर्तमान में ‘200 यूनिट तक मुफ्त’ और ‘400 यूनिट तक आधा बिल’ की लोकप्रिय योजना चला रही है। APTEL के फैसले ने इस योजना के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। यदि दिल्ली सरकार यह चाहती है कि टैरिफ बढ़ने के बाद भी उपभोक्ताओं पर बोझ न पड़े, तो उसे डिस्कॉम्स को मिलने वाली सब्सिडी की राशि को दोगुना करना होगा। वर्तमान वित्तीय स्थिति में यह दिल्ली के खजाने पर भारी बोझ होगा। दिल्ली में 2025-26 के चुनावी चक्र को देखते हुए, कोई भी सरकार बिजली महंगी करने का जोखिम नहीं लेना चाहती। लेकिन APTEL के आदेश के बाद अब ‘कानूनी रूप से’ बढ़ोतरी को रोकना असंभव होता जा रहा है।

तीनों प्रमुख बिजली कंपनियों (रिलायंस और टाटा के स्वामित्व वाली) का तर्क है कि उनकी वित्तीय हालत ‘कोमा’ जैसी है। डिस्कॉम्स को एनटीपीसी (NTPC) और अन्य उत्पादन कंपनियों (Gencos) को पैसा देना होता है। पैसा न होने के कारण वे बिजली खरीद के समझौते पूरे नहीं कर पा रही हैं। गर्मियों में पीक डिमांड (जो 2026 में 8500 मेगावाट को छूने की उम्मीद है) को संभालने के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार की जरूरत है, जिसके लिए निवेश रुक गया है।

चरण अपेक्षित कार्रवाई
मई-जून 2026 DERC द्वारा नया ‘टैरिफ ऑर्डर’ जारी किया जा सकता है।
जुलाई 2026 उपभोक्ताओं के बिलों में ‘रिकवरी सरचार्ज’ जुड़ना शुरू हो सकता है।
2027 बकाया भुगतान की दूसरी किस्त के कारण दरों में पुनः संशोधन।
अप्रैल 2028 सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई ₹30,000 करोड़ के भुगतान की अंतिम समयसीमा।

दिल्ली में बिजली का यह संकट केवल ‘वित्तीय’ नहीं बल्कि ‘प्रशासनिक और राजनीतिक’ भी है। APTEL के कड़े आदेश ने यह साफ कर दिया है कि डिस्कॉम्स के बकाये को अब और दबाया नहीं जा सकता। दिल्ली की जनता, जो एक दशक से ‘सस्ती बिजली’ की आदी हो चुकी है, उसके लिए यह एक कड़वा घूँट होने वाला है।

अब सबकी निगाहें दिल्ली सरकार पर हैं क्या वह केंद्र सरकार से सहायता मांगेगी, डिस्कॉम्स के साथ नए सिरे से बातचीत करेगी, या फिर उपभोक्ताओं को इस ‘₹30,000 करोड़ के वित्तीय ज्वालामुखी’ की गर्मी झेलने के लिए छोड़ दिया जाएगा? 2026 की गर्मियों की तपिश के साथ-साथ बिजली बिलों की गर्मी भी दिल्लीवासियों का पसीना छुड़ाने वाली है।

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