ओपिनियनराजनीतिसंपादकीय

RSS- निस्वार्थ मानवता और देश प्रेम से सराबोर संगठन, अक्सर विपक्ष के निशाने पर क्यों..?

देश पर आये हर संकट में लोगों का दुःख-दर्द बाटते नजर आते हैं सफ़ेद कमीज और खाकी पैंट पहने संघ के स्वयंसेवक

देश के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS की स्थापना करीब 100 साल पहले 1925 में केशव बालीराम हेडगेवार द्वारा की गई। पचास लाख से भी अधिक स्वयंसेवकों वाला संघ इस वर्ष सितम्बर माह में पुरे 100 साल का हो जायेगा। देश में जब भी कहीं आपदा आए संघ के स्वयंसेवक तुरंत राहत पहुंचाने के काम में लग जाते हैं। कहीं बाढ़ आ जाए तो वहां आपको RSS के लोग लोगों का दुःख दर्द बांटते नजर आएंगे। कहीं भूकंप की विनाशलीला देखने को मिले तो संघ के स्वयंसेवक आपको राहत और बचाव कार्यों में भागीदारी करते हुए मिलेंगे। अहमदाबाद के प्लेन हादसे में बिना समय गंवाए RSS के स्वयंसेवक मानवता के सेवा में लगे रहे.

कश्मीर की बाढ़ हो या केरल में आई आपदा संघ के स्वयंसेवक निस्वार्थ मानव सेवा में तत्पर मिले। जिन आदिवासी इलाकों में सरकारी योजना के अंतर्गत स्कूल नहीं खुल पाए वहां भी संघ वनवासी कल्याण योजना के तहत लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनकर आया। वनवासी कल्याण के माध्यम से संघ आदिवासी इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास और उत्थान कार्यों में सक्रिय भूमिका में रहता है। 1962 के युद्ध के समय जब एक राजनैतिक दल के नेता ने घायल सैनिकों के लिए रक्तदान ना करने की अपील की तो संघ सीमा से सटे इलाकों में राहत कार्यों में शामिल रहा। जरूरत के समय संघ सीमा से सटे इलाके हों या फिर सुदूर जंगलों में रह रहे आदिवासी, सबके लिए उम्मीद और भरोसा बनकर आता है.

संकट काल में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा किये गए राहत और बचाव कार्य.

1 – दिसंबर 2004 में आई सुनामी के कारण भारी जान-माल का नुकसान हुआ। संघ के स्वयंसेवक बिना समय गवाये आपदा से पीड़ित लोगों के बीच पहुंचकर राहत और बचाव कार्यों में जुटे रहे.

2 – जनवरी 2001 में गुजरात में आये विनाशकारी भूकंप में संघ के 35000 से अधिक स्वयंसेवक स्तिथि सामान्य होने तक भूकंप प्रभावित क्षेत्र में कैम्प लगाकर लोगों की मदद में जुटे रहे। साथ ही सुनिश्चित किया कि भोजन-पानी और दवाइयों से लेकर तमाम जरूरी चीजें प्रभावित लोगों तक समय रहते पहुंचे.

3- अक्टूबर 1999 में सदी के सबसे विनाशकारी चक्रवात से जब तटीय उड़ीसा में 10000 लोगों की जान चली गयी तब संघ ने स्थानीय उत्कल बिपन्न सहायता समिति के माध्यम से राहत और बचाव कार्यों में सहभागिता की.

4- जून 1996 में हरियाणा के चरखी दादरी में विमान दुर्घटना में 350 प्रवासियों की मौत हो गयी। उस समय संघ द्वारा तत्काल पहुंचाई गयी सहायता की सराहना उस वक्त मीडिया द्वारा भी की गई.

5 – अक्टूबर 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिक्ख नरसंहार में संघ के स्वयंसेवकों ने पीड़ित सिक्ख समुदाय के लोगों को ना केवल अपने घरों में आश्रय दी बल्कि राहत शिविर चलाकर पीड़ित लोगों की सहायता भी की.

6- 1962 में चीन द्वारा भारत पर किये गए हमले के दौरान संघ के स्वयंसेवक सीमा पर संकट के काल में जवानों की सहायता की। इतना ही नहीं जनरल करियप्पा ने संघ की शाखा में जाकर स्वयंसेवकों से मुलाकात की.

7- 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ों आंदोलन में संघ की सक्रिय भूमिका रही और रामटेक के नगर कार्यवाह बालासाहब देशपांडे को फांसी की सजा भी सुनाई गयी। हालाँकि बाद में सामूहिक छूट में उनकी सजा रद्द हो गयी.

पर बावजूद इसके आपने अक्सर तथाकथित सेक्युलर जमात के स्वघोषित बुद्धिजीवियों और पत्रकारों को टीवी या अपने राजनैतिक कार्यक्रमों में संघ को निशाना बनाते देखा होगा। हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना से लबरेज संघ को देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के लिए खतरा बताते हुए दलीलें पेश करते हुए देखा और सुना होगा। ऐसे तमाम तथाकथित स्वघोषित बुद्धजीवियों और राजनैतिक विश्लेषकों की रोजी- रोटी सिर्फ संघ के विरोध पर टिकी रहती है। कांग्रेस की सरकारों ने ना जाने कितने ही पद्मश्री ऐसे दरबारियों पर लुटाए है। गूगल कीजिए संघ के स्वयंसेवक सफेद बुर्शट और खाकी पैंट में आपको हर संकट की घड़ी में उम्मीद और हौसले की किरण बनकर लोगों के बीच दिखेंगे.

इसलिए मन में अक्सर ये सवाल रहता है कि जो संघ देश की सेवा में समर्पित रहता है वो आखिर वो किसी को चुभता क्यों होगा..? आपके भी आस-पास अगर कोई संघ को गरियाने वाला मिले तो उससे जरूर पूछना कि उसके इस भाव के पीछे की आखिर वजह क्या है..? मुझे यकीन है कि वो गंगा-जमुनी तहज़ीब का राही झूठे सेक्युलरिज्म को बचाने की बेहद सांप्रदायिक वजह का हवाला देगा.

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