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कोहरे में मौतें: हर सर्दी क्यों सड़कें बन जाती हैं काल?

हर साल वही चक्र: मौसमी हल, स्थायी उपेक्षा

सर्दी आते ही उत्तर भारत के मैदानों पर कोहरा छा जाता है। सुबह की धुंध में सड़कें रहस्यमयी लगने लगती हैं। लेकिन इस धुंध के साथ लौटती है एक दर्दनाक सच्चाई सड़क हादसों की भयानक खबरें। कहीं बस ट्रक से जा टकराई, कहीं कई कारें एक-दूसरे से ठोकर खा गईं, तो कहीं कोई पैदल यात्री या बाइक सवार कोहरा निगल गया। ये खबरें हर साल दोहराई जाती हैं। परिवार टूट जाते हैं, सपने बिखर जाते हैं। सवाल उठता है क्या ये सिर्फ कोहरे की मार है, या हमारी योजना, तैयारी और जिम्मेदारी की कमी? क्यों हर सर्दी मौतों का मौसम बन जाता है, जबकि समाधान हमारे हाथ में ही हैं?

कल्पना कीजिए एक ट्रक ड्राइवर रात के 2 बजे हाईवे पर है। सामने धुंध इतनी घनी कि 20 मीटर आगे भी कुछ दिखाई नहीं देता। पीछे से बस आ रही है, जिसमें 50 यात्री सो रहे हैं। ट्रक अचानक ब्रेक लगाता है, बस चालक को भनक भी नहीं लगती। ठोकर। चीखें। खून। सुबह अखबारों में खबर “कोहरे में 15 मरे”।

ऐसी घटनाएँ हर साल नवंबर से फरवरी तक दोहराती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा जैसे इलाकों में कोहरा सालाना 1000 से ज्यादा मौतें ले जाता है। लेकिन ये आंकड़े नहीं, कहानियाँ हैं। एक मजदूर जो गाँव लौट रहा था, एक छात्र जो परीक्षा देने जा रहा था, एक माँ जो बीमार बच्चे को डॉक्टर के पास ले जा रही थी। कोहरा प्राकृतिक है, लेकिन मौतें मानवीय चूक की देन हैं।

कोहरा तो हर साल आता है, फिर क्यों हादसे बढ़ जाते हैं? कारण कई हैं, लेकिन मुख्य रूप से हमारी कमी कोहरे में दृश्यता शून्य के करीब हो जाती है, फिर भी ड्राइवर स्पीड कम नहीं करते। समय पर पहुँचने का दबाव, ओवरटेकिंग की लत, या बस लापरवाही। फॉग लाइट का इस्तेमाल भूल जाते हैं। हाई बीम जलाते हैं, जो धुंध में चमक पैदा कर आँखें अंधा कर देता है। नतीजा चेन रिएक्शन। एक गाड़ी रुकी, बाकी सब आपस में टकराईं।

हमारे हाईवे दिखने में शानदार हैं, लेकिन कोहरे में वे जाल बन जाते हैं। लेन की लाइनें मिट चुकीं, रिफ्लेक्टर गायब, संकेतक बोर्ड टूटे। डिवाइडर के पास अवैध कट, फ्लाईओवर के नीचे खड़ी गाड़ियाँ। कोहरे में ड्राइवर पहले ही अंधेरे में है, सड़क और भ्रमित कर दे तो बचना नामुमकिन। ग्रामीण सड़कों पर तो बिजली ही नहीं पहुँचती।

कई ट्रक, बसें सालों पुरानी सर्विस के बिना चलती हैं। ब्रेक खराब, टेललाइट बंद, इंडिकेटर टूटा। कोहरे में ये अदृश्य हो जाते हैं। पैदल चलने वाले या बाइक सवार के पास तो कोई सुरक्षा भी नहीं। रिफ्लेक्टिव जैकेट या लाइट का चलन कहाँ? लंबे रूट पर ड्राइवर 18-20 घंटे स्टीयरिंग थामे रहते हैं। नींद आ रही हो, कोहरा घना हो, तो प्रतिक्रिया देर से होती है। ट्रेनिंग कहाँ? लाइसेंस तो पैसे से मिल जाता है, लेकिन असली स्किल नहीं सिखाई जाती।

हर हादसे पर पुलिस FIR लिखती है “तेज गति, लापरवाही”। लेकिन असली सवाल यह है सिस्टम कहाँ चूक गया? कोहरा आना तय है, फिर तैयारी क्यों अधूरी? स्पेशल पेट्रोलिंग, फॉग कंट्रोल रूम बस कागजों में? निर्माण के बाद मेंटेनेंस क्यों भूल जाते हैं? ब्लैक स्पॉट ठीक क्यों नहीं होते? ड्राइवर को समय देते हो या सिर्फ ट्रिप पूरा करने का दबाव? नियम तो जानते हो, पालन क्यों नहीं? जब तक चेन ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी साफ नहीं होगी, मौतें रुकेंगी नहीं।

सर्दी आते ही घोषणाएँ होती हैं “ट्रैफिक डायवर्जन”, “चेकपोस्ट”, “अवेयरनेस”। लेकिन ये अस्थायी हैं। कोहरा छँट गया, तो सब भूल गए। अगले साल फिर वही। डेटा कहाँ? कौन सा रूट सबसे घातक? क्यों विश्लेषण नहीं होता? उपेक्षा हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। समाधान मुश्किल नहीं, इच्छाशक्ति चाहिए। हर हाईवे पर रिफ्लेक्टिव पेंट, कैट्स आई अनिवार्य। फॉग जोन में स्पीड लिमिट साइन, वार्निंग बोर्ड। ब्लैक स्पॉट पर रंबल स्ट्रिप्स, बैरियर।

कमर्शियल गाड़ियों की मासिक फिटनेस चेक। फॉग लाइट, रिफ्लेक्टर अनिवार्य। पुराने वाहनों पर पाबंदी।लाइसेंस में कोहरा ड्राइविंग ट्रेनिंग। ड्यूटी घंटे सीमित, रेस्ट अनिवार्य। ऐप से अलर्ट  “कोहरे में स्पीड 40″। CCTV, सेंसर से रीयल टाइम मॉनिटरिंग।FM रेडियो, SMS अलर्ट। GPS ऐप में फॉग वार्निंग। स्कूलों में सेफ्टी क्लास। सोशल मीडिया पर कैंपेन  “कोहरे में धीमे चलो”। पैदल यात्रियों के लिए रिफ्लेक्टिव बैंड। ये कदम लागू हों तो मौतें 70% कम हो सकती हैं।

मीडिया हादसे दिखाता है, लेकिन समाधान पर बहस कम। समाज शोक करता है, बदलाव की माँग नहीं। समय है जागें।

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