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मिथुन चक्रवर्ती बने पश्चिम बंगाल सरकार के मुख्य सांस्कृतिक सलाहकार: मिला कैबिनेट मंत्री का दर्जा
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी सरकार ने बंगाली सिनेमा, जात्रा व लोक संस्कृति के पुनरुद्धार की कमान 'महागुरु' को सौंपी

पश्चिम बंगाल के सांस्कृतिक, बौद्धिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक युगांतरकारी घटनाक्रम के तहत भारतीय सिनेमा के महानायक, तीन बार के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित मिथुन चक्रवर्ती (Mithun Chakraborty) को पश्चिम बंगाल सरकार का मुख्य सांस्कृतिक सलाहकार (Chief Cultural Advisor) नियुक्त किया गया है।
राज्य सचिवालय (नवान्न) के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग (Department of Personnel and Administrative Reforms – P&AR) द्वारा जारी आधिकारिक गजट अधिसूचना के अनुसार, 76 वर्षीय मिथुन चक्रवर्ती को राज्य के सूचना एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग (Information and Cultural Affairs Department) के अंतर्गत कैबिनेट मंत्री का दर्जा (Rank and Status of a Cabinet Minister) प्रदान किया गया है।
उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल की सत्ता संरचना में सूचना एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग का प्रभार स्वयं मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) के पास है। इस ऐतिहासिक नियुक्ति की औपचारिक घोषणा मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने बंगाली सिनेमा के ‘महानायक’ उत्तम कुमार के जन्मशताब्दी वर्ष (Uttam Kumar Centenary Year) के उपलक्ष्य में कोलकाता के प्रतिष्ठित रवींद्र सदन में आयोजित एक विशेष राजकीय सांस्कृतिक सम्मेलन के मंच से की।
इस कदम को पश्चिम बंगाल में भाजपा नीत सरकार द्वारा राज्य के सांस्कृतिक पुनर्जागरण (Cultural Renaissance), टॉलीवुड (बंगाली फिल्म उद्योग) के आधुनिकीकरण, ग्रामीण जात्रा व रंगमंच के संरक्षण और राज्य के बौद्धिक हलकों में वैचारिक व प्रशासनिक संवाद को एक नई गति देने के रूप में देखा जा रहा है।
“पश्चिम बंगाल की आत्मा उसकी कला, साहित्य, सिनेमा, संगीत और रंगमंच में बसती है। यह वह पावन भूमि है जिसने रवींद्रनाथ टैगोर, काजी नजरुल इस्लाम, स्वामी विवेकानंद, बंकिम चंद्र, सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन और महानायक उत्तम कुमार जैसी विभूतियां दुनिया को दीं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में राजनीतिक हस्तक्षेप, सिंडिकेट कल्चर, अव्यवस्था और बुनियादी ढांचे की उपेक्षा के कारण हमारा गौरवशाली बंगाली सिनेमा और रंगमंच अपने उस स्वर्णिम स्तर से पिछड़ गया।
हमें एक ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता थी जो न केवल सिनेमा और कला की बारीकियों को समझता हो, बल्कि जिसने उत्तर बंगाल से लेकर जंगलमहल तक आम जनता के दिलों पर राज किया हो। मिथुन दा केवल एक अभिनेता नहीं हैं, वे बंगाल की अस्मिता के जीवित प्रतीक हैं। उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा इसलिए दिया गया है ताकि उनके सुझाव केवल फाइलों में न घूमें, बल्कि सरकार उन्हें सीधे कानून और नीति के रूप में लागू कर सके।”
बहुत कम अभिनेता ऐसे हुए हैं जिन्होंने कला फिल्मों (Parallel Cinema) और विशुद्ध व्यावसायिक मसाला सिनेमा दोनों में समान महारत हासिल की हो। मिथुन चक्रवर्ती ने जहां मृणाल सेन की ‘मृगया’ (1976) और बुद्धदेव दासगुप्ता की ‘ताहादेर कथा’ (1992) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता, वहीं विवेक अग्निहोत्री की ‘द कश्मीर फाइल्स’ (2022) और बंगाली फिल्म ‘स्वामी विवेकानंद’ (1998) के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किया। दूसरी ओर, बंगाली जन-सिनेमा में उनकी ब्लॉकबस्टर फिल्मों जैसे ‘फाटक केष्टो’ (2006) और ‘एमएलए फाटक केष्टो’ के संवाद आज भी बंगाल की राजनीतिक और सामाजिक जुबान का हिस्सा हैं।
ग्रामीण बंगाल में मिथुन चक्रवर्ती को मात्र एक अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि अपने बीच के एक मसीहा के रूप में देखा जाता है।
टेलीविजन रियलिटी शो ‘डांस बांग्ला डांस’ में ‘महागुरु’ के रूप में उनकी उपस्थिति ने उन्हें बंगाल के हर घर का सदस्य बना दिया।उनका प्रशासनिक और सामाजिक अनुभव भी समृद्ध रहा है; वे 2014 से 2016 तक राज्यसभा सांसद रहे और बाद में एफटीआईआई सोसाइटी के सदस्य के रूप में भी योगदान दिया।
हाल के वर्षों में बंगाली फिल्म उद्योग ‘फेडरेशन ऑफ सिने टेक्नीशियंस एंड वर्कर्स ऑफ ईस्टर्न इंडिया’ (FCTWEI) और निर्माताओं/निर्देशकों के बीच आए दिन होने वाले विवादों और शूटिंग में अड़चनों से जूझता रहा है। कई बड़े निर्देशकों ने शूटिंग पर मनमाने प्रतिबंधों और तकनीशियनों की अनावश्यक संख्या थोपने के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठाई थी।
मिथुन चक्रवर्ती, जो स्वयं कई दशकों तक फिल्म निर्माण और सिने आर्टिस्ट्स एसोसिएशन (CINTAA) के कामकाज को करीब से देख चुके हैं, उनकी पहली प्राथमिकता टॉलीवुड में एक पारदर्शी ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (Ease of Doing Business) ढांचा तैयार करना होगी ताकि मुंबई, दक्षिण भारत और हॉलीवुड के बड़े प्रोडक्शन हाउस बिना किसी भय के बंगाल में आकर शूटिंग कर सकें।
टॉलीगंज स्थित सरकारी टेक्नीशियंस स्टूडियो और न्यू थिएटर्स की हालत दशकों पुरानी तकनीक पर टिकी हुई है। अधिकांश बंगाली फिल्मों को पोस्ट-प्रोडक्शन, वीएफएक्स, कलर-ग्रेडिंग (DI) और साउंड मिक्सिंग के लिए मुंबई या चेन्नई जाना पड़ता है, जिससे बजट बढ़ जाता है। मिथुन चक्रवर्ती की योजना एक पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत कोलकाता में एक अत्याधुनिक डिजिटल मीडिया पार्क और एनिमेशन हब स्थापित करने की है।
बंगाल की पारंपरिक लोक नाट्य शैली ‘जात्रा’ सदियों से ग्रामीण मनोरंजन और सामाजिक चेतना की रीढ़ रही है। चितपुर (कोलकाता) की जात्रा कंपनियों को आर्थिक तंगी और आधुनिक डिजिटल मीडिया के प्रसार के कारण भारी नुकसान हुआ है। मिथुन चक्रवर्ती ने घोषणा की है कि राज्य के हर जिले में जात्रा उत्सवों का आयोजन किया जाएगा और वरिष्ठ जात्रा कलाकारों के लिए विशेष पेंशन योजना लागू की जाएगी।
ग्रामीण बंगाल के छऊ (Chhau) नर्तकों, बाउल संगीतकारों, भादु-टुसू गायकों और पटुआ चित्रकारों को पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा दिए जा रहे भत्तों की प्रणाली में कई विसंगतियां थीं। मिथुन चक्रवर्ती इस पूरी योजना का एक डिजिटल डेटाबेस तैयार कराएंगे ताकि वास्तविक कलाकारों तक सीधा वित्तीय लाभ पहुंचे और बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो।
पश्चिम बंगाल में फिल्म कलाकार, लेखक, रंगमंच निर्देशक और संगीतकार केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे जनमत निर्माण (Public Opinion) में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। मिथुन चक्रवर्ती को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर भाजपा सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह संस्कृति को एक द्वितीयक विभाग नहीं, बल्कि अपनी प्रशासनिक प्राथमिकताओं का शीर्ष स्तंभ मानती है।
विपक्ष ने इस नियुक्ति पर प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि यह निर्णय आगामी स्थानीय चुनावों को ध्यान में रखकर और सांस्कृतिक संस्थानों का राजनीतिकरण करने के उद्देश्य से लिया गया है। हालांकि, सत्तारूढ़ भाजपा और राज्य सरकार के प्रवक्ताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि एक राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित लीजेंड्री अभिनेता से बेहतर इस पद का हकदार कोई दूसरा नहीं हो सकता।
“मैं यहां किसी पार्टी का एजेंडा चलाने नहीं आया हूं। कला और कलाकार की कोई पार्टी नहीं होती। चाहे कोई वामपंथी विचारधारा का हो, दक्षिणपंथी हो या किसी भी दल का यदि वह सच्चा बंगाली कलाकार है, तो उसके हक की लड़ाई मैं लडूंगा। किसी भी निर्माता को सेट पर धमकाया नहीं जाएगा और किसी भी तकनीशियन का पसीना बेकार नहीं जाएगा।”
उन्होंने घोषणा की कि वे अगले 60 दिनों के भीतर हितधारकों, निर्देशकों, वितरकों और सिनेमा हॉल मालिकों के साथ बैठक कर ‘पश्चिम बंगाल राज्य फिल्म एवं मनोरंजन नीति 2026’ का मसौदा तैयार करेंगे, जिसमें सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों को पुनर्जीवित करने के लिए टैक्स इंसेंटिव और सब्सिडी का प्रावधान होगा। सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI) और राज्य के विश्वविद्यालयों के प्रतिभाशाली फिल्म छात्रों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी लघु फिल्में प्रदर्शित करने के लिए विशेष राज्य फेलोशिप प्रदान की जाएगी।
मिथुन चक्रवर्ती का पश्चिम बंगाल सरकार के मुख्य सांस्कृतिक सलाहकार के रूप में कैबिनेट मंत्री पद संभालना राज्य के प्रशासनिक इतिहास में एक असाधारण मोड़ है। यह नियुक्ति इस बात की पुष्टि करती है कि बंगाल की नई सत्ता संरचना अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचानते हुए उसे आधुनिक 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। कांस और वेनिस के मंचों पर कभी सत्यजीत रे और मृणाल सेन के नाम का जो डंका बजता था, बीते वर्षों में वह चमक कहीं खो गई थी।
अब जब भारतीय सिनेमा के सबसे अनुभवी और लोकप्रिय चेहरों में से एक ‘महागुरु’ ने इस विभाग की कमान संभाली है, तो टॉलीवुड के फिल्मकारों से लेकर पुरुलिया के अंतिम छऊ नर्तक तक सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह नई प्रशासनिक व्यवस्था बंगाल के सांस्कृतिक क्षितिज पर किस प्रकार एक नया सवेरा लेकर आती है। मिथुन चक्रवर्ती की यह पारी केवल उनके निजी राजनीतिक जीवन का उत्कर्ष नहीं है, बल्कि यह बंगाल की कला, सिनेमा और संस्कृति के लिए खोई हुई गरिमा को पुनः प्राप्त करने का एक ऐतिहासिक अवसर भी है।



