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भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे ने पीएम नरेंद्र मोदी को बताया ‘भगवान विष्णु का अवतार’
25 वर्षों के निरंतर शासन और लोक-सेवा पर जारी किया ऐतिहासिक लेख

भारत और भूटान के अद्वितीय राजनयिक संबंधों और हिमालयी सांस्कृतिक साझेदारी में बुधवार को उस समय एक अत्यंत भावुक, आध्यात्मिक और दार्शनिक अध्याय जुड़ गया, जब भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे (Tshering Tobgay) ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संवैधानिक और प्रशासनिक नेतृत्व के 25 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर एक विशेष लेख साझा किया।
सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ (X) पर “एन अवतार फॉर अवर टाइम्स” (An avatar for our times – हमारे समय का एक अवतार) शीर्षक से प्रकाशित इस आलेख में शेरिंग तोबगे ने वर्ष 2019 की एक अत्यंत व्यक्तिगत मुलाकात का संस्मरण साझा करते हुए खुलासा किया कि उन्होंने पीएम मोदी से कहा था कि वे उन्हें “भगवान विष्णु का अवतार” (Avatar of Vishnu) मानते हैं।
7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। गुजरात में लगभग 13 वर्ष (2001-2014) और केंद्र में प्रधानमंत्री के रूप में 12 वर्षों (2014-2026) से अधिक के निरंतर कार्यकाल के साथ, 7 अक्टूबर 2026 को लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार के प्रमुख के रूप में उनके सिल्वर जुबली (25 वर्ष) पूरे हुए हैं। इस अवसर पर भूटानी प्रधानमंत्री का यह लेख अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के औपचारिक प्रोटोकॉल से परे हटकर दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच व्यक्तिगत स्नेह, सांस्कृतिक समरसता और साझा बौद्ध-वैदिक मूल्यों की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
तोबगे ने लिखा कि राजनीति की दुनिया में यह एक आम दस्तूर है कि जब कोई नेता सत्ता से बाहर हो जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी अहमियत और संबंध समाप्त हो जाते हैं। 2018 के चुनावों में हार के लगभग 10 महीने बाद जब वे नई दिल्ली में थे, तो उन्होंने केवल एक निजी नागरिक (Private Citizen) के रूप में पीएम मोदी से मिलने का समय मांगा था। वे केवल अपने 2013-2018 के कार्यकाल के दौरान भारत द्वारा भूटान को दिए गए अभूतपूर्व सहयोग के लिए आभार जताना चाहते थे।
तोबगे ने याद किया कि नरेंद्र मोदी ने उनका स्वागत किसी पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक परिवार के सदस्य की तरह किया। तोबगे ने उनसे कहा, “आप हमेशा मेरे बड़े भाई रहेंगे।” उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल उम्र के अंतर की वजह से नहीं था, बल्कि उस गहरे स्नेह, सम्मान और संरक्षण की भावना के कारण था जो मोदी ने हमेशा उनके और भूटान के प्रति प्रदर्शित किया।
तोबगे ने अपने लेख में समझाया कि हमारे इस भौगोलिक और सांस्कृतिक अंचल (भारतीय उपमहाद्वीप और हिमालयी क्षेत्र) में एक अत्यंत प्राचीन और आदरणीय परंपरा रही है, जहां न्यायप्रिय, धर्मपरायण और लोक-कल्याणकारी शासकों को दैवीय शक्ति या भगवान विष्णु का रूप माना जाता रहा है। हिंदू परंपरा में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता, व्यवस्थापक और ‘धर्म का रक्षक’ (Preserver of Dharma) माना जाता है। जब-जब समाज में अव्यवस्था, जड़ता या पतन होता है, तब धर्म की पुनर्स्थापना और जन-कल्याण के लिए एक प्रबुद्ध शक्ति का प्राकट्य होता है।
तोबगे ने बेहद ईमानदारी से स्वीकार किया:
“उस समय मेरे अपने शब्दों ने मुझे चौंका दिया था। उस मुलाकात के बाद मैंने कई बार सोचा कि क्या मैं उस क्षण भावनाओं के अतिरेक में बह गया था? क्या मेरा ऐसा कहना गलत था? लेकिन बाद में, जब मैंने वर्षों तक शांति से विचार किया और प्रधानमंत्री मोदी के काम करने के तरीके को देखा, तो मुझे इसका स्पष्ट उत्तर मिल गया। मुझे विश्वास हो गया कि मैं बिल्कुल सही था। सार्वजनिक पद पर नरेंद्र मोदी के ट्रैक रिकॉर्ड ने मुझे आश्वस्त किया कि यह तुलना उनके नेतृत्व, शासन शैली और जनसेवा के प्रति मेरी सच्ची और स्वाभाविक समझ को दर्शाती है।”
तोबगे ने लिखा कि भूटानी बौद्ध परंपरा में ‘रिगसुम गोनपो’ (Rigsum Gonpo) यानी तीन महान बोधिसत्वों की त्रयी की पूजा की जाती है। प्रबुद्ध नेतृत्व केवल शक्ति से नहीं आता; यह तब प्रकट होता है जब मंजुश्री का विवेक (Wisdom), अवलोकितेश्वर की करुणा (Compassion) और वज्रपाणि का साहस (Courage) एक साथ मिलते हैं और इन तीनों को ‘निःस्वार्थ सेवा’ (Selfless Service) का धागा आपस में पिरोता है।
भारतीय ग्रंथों में भगवान विष्णु के दसवें अवतार ‘कल्कि’ का उल्लेख आता है, जो अंधकार और जड़ता को समाप्त कर धर्म का पुन प्रवर्तन करते हैं। तोबगे ने स्पष्ट किया कि उनकी उपमा किसी रूढ़िवादी पौराणिक भविष्यद्वाणी के बजाय एक ऐसे नेता की ऊर्जा और कर्मठता को समर्पित है, जो 140 करोड़ भारतीयों के भीतर आत्मगौरव और कर्मण्यता का नया संचार कर रहा है।
तोबगे ने याद दिलाया कि जब 2001 में मोदी ने गुजरात की कमान संभाली थी, तो राज्य भीषण भूकंप और आर्थिक संकट से जूझ रहा था। अपने 13 वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने गुजरात को बुनियादी ढांचे, औद्योगिक निवेश, 24 घंटे बिजली और प्रशासनिक निष्पादन (Execution) का राष्ट्रीय पैमाना बना दिया। 2014 के बाद उन्होंने इसी मॉडल को भारत के 140 करोड़ नागरिकों के लिए लागू किया। तोबगे ने विशेष रूप से जनधन योजना (वित्तीय समावेशन), स्वच्छ भारत मिशन (स्वच्छता क्रांति), मेक इन इंडिया, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI/UPI) और अत्याधुनिक एक्सप्रेसवे व रेलवे के अभूतपूर्व नेटवर्क का उल्लेख किया।
तोबगे ने रेखांकित किया कि सड़कें और कारखाने बनाना महत्वपूर्ण है, लेकिन मोदी का सबसे ऐतिहासिक और युगांतरकारी योगदान भारतीयों के भीतर यह अटूट विश्वास जगाना है कि वे दुनिया में किसी से कम नहीं हैं। “उन्होंने भारतीयों के मन में अपने देश और अपने सामर्थ्य के प्रति एक अदम्य और शक्तिशाली विश्वास जाग्रत किया है।”
तोबगे ने लिखा, “एक विजन बनाना आसान होता है, लेकिन जमीन पर आमूलचूल परिवर्तन (Transformation) लाना अत्यंत कठिन। विकसित भारत किसी एक नेता या एक चुनावी चक्र का विषय नहीं है। यह वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का संकल्प है।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ से आगे बढ़कर ‘सबका प्रयास’ का जो आह्वान किया है, वह दुनिया के लोकतंत्रों के लिए एक नया सबक है, जहां नागरिक केवल सरकार के लाभार्थी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के सक्रिय शिल्पी बनते हैं।
तोबगे ने एक अत्यंत आत्मीय और कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बात कही: “मेरे लिए यह विषय अत्यंत व्यक्तिगत है। विकसित भारत का सीधा और सच्चा अर्थ है एक विकसित भूटान।” उन्होंने याद दिलाया कि जून 2014 में प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही हफ्तों के भीतर मोदी ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भूटान को चुना था। तब उन्होंने हवाई अड्डे पर उतरकर ‘B4B: Bharat for Bhutan and Bhutan for Bharat’ का कालजयी मंत्र दिया था, जिसे उन्होंने पिछले 12 वर्षों में अपने हर कर्म से जीकर दिखाया है।
तोबगे ने गर्व के साथ उल्लेख किया कि भूटान के महामहिम राजा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भूटान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द ड्रुक ग्यालपो’ (Order of the Druk Gyalpo) से अलंकृत किया था। वे इस सम्मान को प्राप्त करने वाले दुनिया के पहले और एकमात्र विदेशी नेता हैं। यह सम्मान भूटान के लोगों के दिलों में उनके प्रति अगाध प्रेम और कृतज्ञता का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि भूटान की 11वीं पंचवर्षीय योजना को सफल बनाने में भारत की सहायता निर्णायक रही, जिसे मोदी सरकार ने 12वीं और अब 13वीं पंचवर्षीय योजना में और अधिक उदारता के साथ जारी रखा है।
भूटान के दक्षिणी सीमा पर बन रही अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और आध्यात्मिक नगरी ‘गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी’ को सफल बनाने के लिए भारत ने सीमा-पार बुनियादी ढांचे, असम के कोकराझार से गेलेफू तक पहली अंतरराष्ट्रीय रेलवे लाइन और हाइड्रोपावर ट्रांसमिशन में पूर्ण सहयोग देकर इस मैत्री को 21वीं सदी का सबसे सुरक्षित मॉडल बना दिया है।
भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के नेतृत्व पर लिखा गया यह आलेख केवल एक विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की औपचारिक बधाई नहीं है। यह आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के उस दुर्लभ पहलू का प्रकटीकरण है, जहां कूटनीति केवल व्यापार, संधियों और सीमाओं के सौदों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह साझा सांस्कृतिक चेतना, भ्रातृ-भाव और आध्यात्मिक विश्वास की ऊंचाइयों को छूती है।
एक छोटे हिमालयी राष्ट्र के नेता द्वारा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधान सेवक को ‘विष्णु का अवतार’ और ‘बड़ा भाई’ कहना इस बात का प्रमाण है कि भारत ने अपने ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति के तहत शक्ति का प्रदर्शन करके नहीं, बल्कि करुणा, सम्मान, निःस्वार्थ सेवा और सतत सहयोग के जरिए अपने पड़ोसियों का दिल जीता है।
जब 2001 में गुजरात की धरती से शुरू हुई एक नेता की लोक-कल्याणकारी यात्रा 2026 में 25 वर्ष पूरे करती है, तो थिम्पू की वादियों से गूंजा यह संस्मरण यह सिद्ध करता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो सीमाओं के पार भी मानवता के लिए आशा, संबल और प्रकाश का पर्याय बन सके।



