ओपिनियनखेल

खेलों में लैंगिक समानता: चुनौतियाँ और बदलाव

वेतन, पुरस्कार और पहचान में फर्क

हमारे देश में खेल के मैदान पिछले कुछ दशक में बड़े बदलाव के गवाह बने हैं। जहाँ कभी खिलाड़ी मतलब सिर्फ पुरुषों के नामों से पहचाने जाते थे, वहीं अब गाँव-शहर, स्कूल-कॉलेज से निकलकर लड़कियाँ भी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंच पर चमक रही हैं। पी.वी. सिंधु, मैरी कॉम, मिताली राज जैसी महिलाओं ने न सिर्फ मेडल जीते, बल्कि इस बात का संदेश भी दिया कि खेल का मैदान किसी एक लिंग का बपौती नहीं, बल्कि सबका मंच है। फिर भी, लड़कियों और महिलाओं के लिए खेल सम्भावनाओं और संघर्ष दोनों का मैदान है। आज ज़रूरत है न केवल उनकी उपस्थिति बढ़ाने की, बल्कि हर स्तर पर बराबरी, सुरक्षा और सम्मान की पहचान देने की।

इस बदलाव में सरकारों और समाज दोनों ने अपनी भूमिका निभानी शुरू कर दी है। “खेलो इंडिया” या टारगेट ओलंपिक पोडियम जैसी सरकारी योजनाओं ने लड़कियों को प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति जैसे अवसर दिये। ग्रासरूट स्तर पर भी लड़कियों के लिए स्कूल, गाँव के मैदान और जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं में भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है। हालिया बदलावों में क्रिकेट में महिला खिलाड़ियों को पुरुषों के बराबर मैच फीस देने का ऐतिहासिक फैसला नया मोड़ है। हॉकी, बैडमिंटन, टेबल टेनिस आदि में भी महिलाओं को अब ज़्यादा प्रोफेशनल मंच, कोचिंग और रोजगार मिलने लगे हैं।

इन सफलताओं के बावजूद, लैंगिक असमानता के कई चेहरे आज भी खेल जगत में मौजूद हैं। सबसे पहली चुनौती संसाधनों की उपलब्धता, वित्तीय सहायता और मीडिया कवरेज की है। अधिकतर खेल संघ पुरुष खिलाड़ियों को ही प्राथमिकता देते हैं फंडिंग, अभ्यास सुविधाएँ, प्रायोजन और बड़े टूर्नामेंटों का भार उन्हीं पर रहता है। उधर महिला खिलाड़ियों को कई बार सिर्फ प्रतीकात्मक रूप में बढ़ावा दिया जाता है, वास्तविक समाज और संस्थागत संस्कारों में उनकी उपस्थिति सीमित रह जाती है।

मीडिया में भी महिला खेलों की कवरेज बहुत कम है। टीवी चैनलों, अख़बारों, सोशल मीडिया व विज्ञापनों में पुरुष क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी छाये रहते हैं, जबकि महिला इवेंट्स की जीत भी अक्सर हाशिये पर चली जाती है। इसकी वजह से न सिर्फ स्पॉन्सरशिप का नुकसान होता है, बल्कि रोल मॉडल्स की कमी की वजह से भविष्य की लड़कियों में आत्मविश्वास भी कम होता है।

काफी समय तक खेल संघों, चयन समितियों, टीम कोचिंग और प्रशासनिक पदों पर पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है। महिला प्रशासकों की संख्या बहुत कम है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिला संवेदना और दृष्टिकोण अनचाहा रह जाता है। खेल कार्यक्रम, ट्रेनिंग की प्राथमिकता, बजट का आवंटन, और अनुशासन संबंधित फैसलों में महिला भागीदारी से नीति ज्यादा समावेशी हो सकती है, लेकिन ऐसा होते हुए कम ही दिखता है।

वेतन में भी असमानता की खाई गहरी है। भले ही कुछ बड़ी खेल बोर्ड्स ने मैच फीस में समानता लाई हो, पर वेतन, सालाना अनुबंध, प्रायोजन, पुरस्कार राशि और प्रमोशनल अफसरों में महिलाओं को अभी भी कम हिस्सा मिलता है। एक ओलंपिक पदक विजेता महिला खिलाड़ी या क्रिकेटर की आय और अवसर, उसी स्तर के पुरुष खिलाड़ी से कहीं पीछे रह जाती है। इसी वजह से कई बार प्रतिभावान लड़कियाँ आगे बढ़ने की बजाय पारिवारिक या आर्थिक दबाव में खेल छोड़ देती हैं।

लड़कियों के लिए खेल सिर्फ शारीरिक या मानसिक चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक परंपरा, पूर्वाग्रह और असुरक्षा से भी जूझने का नाम है। कई जगहों पर “लड़कियाँ क्रीड़ा के लायक नहीं,” “शादी के बाद खेलना बेकार है,” “खेलों से लड़की मर्दानी बन जाती है” ऐसी बातें आस-पास सामान्य मानी जाती हैं। फैमिली सपोर्ट, सामाजिक सुरक्षा, ट्रेवल की आज़ादी, और कोचिंग में लड़कियों की सुरक्षा इन सबका अभाव उन्हें बार-बार हतोत्साहित करता है। यौन उत्पीड़न, मानसिक शोषण, ट्रोलिंग और असम्मान की घटनाएँ उन्हें असुरक्षित भी बनाती हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला खिलाड़ियों की प्रायोजन राशि, ब्रांड एंडोर्समेंट और पुरस्कार राशि पुरुषों के मुक़ाबले आज भी काफी कम हैं। कंपनियां और ब्रांड आमतौर पर पुरुष खिलाड़ियों की लोकप्रियता को भुनाना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। इसका सीधा असर महिला खिलाड़ियों की आर्थिक आजादी, प्रोफेशनल ग्रोथ और करियर की निर्धारितता पर पड़ता है। कारगर नीति, मीडिया समर्थन और ब्रांड-समाज के उद्देश्यपूर्ण सहयोग के बिना महिला खिलाड़ियों की प्रोफेशनल क्षमता उभर नहीं पाती।

लैंगिक समानता तब सम्भव है जब हर स्तर पर नियम नीति, प्रशिक्षण, संसाधन, और सम्मान की आधारशिला मजबूत की जाए। खेल कार्यक्रमों, कोचिंग, संघों और अकादमियों में महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य-अंश की तरह होनी चाहिए। हर राज्य-केंद्र सरकार को खेल बजट में महिला खिलाड़ियों के लिए अलग आवंटन, गांव-कस्बे के स्तर पर सुविधाएँ और टैलेंट स्काउटिंग पर फोकस करना चाहिए। सेंटर, राज्य स्तर पर महिला कोच, प्रशासक, चयनकर्ता और नेताओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए कोटा या प्रोत्साहन मूलक नीति भी जरूरी है।

मीडिया को चाहिए कि महिला खेलों की कवरेज टीवी, वेब, प्रिंट और सोशल मीडिया को अधिक प्राथमिकता दें। सिर्फ बड़े टूर्नामेंट या पदक जीतने पर नहीं, बल्कि दिन-प्रतिदिन की उपलब्धियों का उत्सव मनाना युवतियों को प्रेरणा देता है। ब्रांड्स और विज्ञापन एजेंसियों को महिला खिलाड़ियों को भी “हीरो” की तरह प्रस्तुत करना चाहिए।

शिक्षा संस्थानों, स्कूलों और परिवारों में खेल की अहमियत, लड़कों लड़कियों दोनों के लिए हर स्तर पर समान हो, यह माहौल बनाना होगा। यौन शोषण, उत्पीड़न और भेदभाव के विरुद्ध शिकायत और त्वरित न्याय की प्रणाली अनिवार्य रूप से लागू हो, जिससे खिलाड़ियाँ बेहिचक अपनी समस्या रख सकें और उनकी सुरक्षा पक्की हो।

असली बदलाव तब आएगा जब खेल का मैदान लड़कों के लिए “अधिकार” और लड़कियों के लिए “अपवाद” नहीं, बल्कि दोनों के लिए प्रतिबद्ध अवसर बन जाएगा। नेतृत्व में महिलाओं की संख्या बढ़े, बोनस-मुलाकात, पुरस्कार मात्रा और आमदनी में बराबरी आए, ग्रामीण बालिकाएं भी महानगर की तरह बड़े सपनों के साथ मैदान में उतरें यही असली लैंगिक समानता है।

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