ओपिनियन
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जब शीत लहर बन जाए दुश्मन: उत्तर भारत की जमती सुबह और प्रशासनिक सुस्ती
उत्तर भारत में सर्दियों का आना कभी गुलाबी ठंड और गुनगुनी धूप का अहसास कराता था, लेकिन पिछले कुछ दशकों…
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सुरक्षा Vs करुणा: आवारा कुत्तों के मुद्दे पर समाज की उलझन
हाल के वर्षों में भारत के लगभग हर शहर और कस्बे से एक जैसी खबरें आ रही हैं कहीं किसी…
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लोकतंत्र की कसौटी: जब मतदाता सूची से गायब होते हैं करोड़ों नाम
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव को एक उत्सव माना जाता है। लेकिन इस उत्सव की पहली शर्त है मतदाता…
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भारत-न्यूजीलैंड व्यापार समझौता: रिश्तों की नई उड़ान और आर्थिक संभावनाओं का उदय
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी विदेश नीति और व्यापारिक दृष्टिकोण में एक बड़ा बदलाव दिखाया है। भारत अब…
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राष्ट्रपति महल से अमेरिकी अदालत तक: ताकत, न्याय और वैश्विक राजनीति का द्वंद्व
इतिहास गवाह है कि सत्ता की कुर्सियां कभी स्थाई नहीं होतीं, लेकिन कुछ नेताओं का पतन इतना नाटकीय होता है…
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सरेआम कत्ल, सरेआम सवाल: क्या बांग्लादेश में कानून का राज खत्म हो रहा है?
एक समय था जब बांग्लादेश की पहचान उसकी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुधारों से होती थी। लेकिन आज,…
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युद्ध नहीं, एक चेतावनी: कैसे अमेरिका-वेनेजुएला तनाव लैटिन अमेरिका को बदल रहा है
वेनेजुएला की राजधानी कराकस और अमेरिका के व्हाइट हाउस के बीच की दूरी हज़ारों मील हो सकती है, लेकिन इनके…
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पहचान की बहस और रोज़मर्रा की ज़िंदगी: जब संस्कृति विवाद का केंद्र बन जाए
कल्पना कीजिए कि आप सुबह की चाय पीते हुए सोशल मीडिया खोलते हैं और देखते हैं कि किसी विज्ञापन में…
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आस्था का सैलाब: भारतीय मंदिरों में उमड़ती भीड़ के पीछे का सामाजिक सच
पिछले कुछ वर्षों में भारत के धार्मिक परिदृश्य में एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। चाहे वह…
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अवैध प्रवासन का आर्थिक और सुरक्षा विश्लेषण
जब भी हम ‘अवैध प्रवासन’ की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में अक्सर सरहदों पर तैनात जवान और कटीली…
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जीरो विजिबिलिटी, जीरो तैयारी: आखिर क्यों कोहरे के आगे हर बार बेबस हो जाता है एनसीआर?
दिसंबर और जनवरी की सर्दियाँ उत्तर भारत के लिए सिर्फ कड़ाके की ठंड नहीं, बल्कि एक डरावनी धुंध लेकर आती…
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भारतीय सड़कों पर नस्लवाद: एंजेल चकमा की मौत और हमारा सामूहिक आत्म-मंथन
दिल्ली की व्यस्त सड़कों पर जब उत्तर-पूर्व भारत की एक युवा छात्रा, एंजेल चकमा, अपनी आँखों में ढेर सारे सपने…
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एक नाज़ुक ठहराव: क्या 72 घंटे का संघर्षविराम थाईलैंड-कंबोडिया के दशकों पुराने घाव भर पाएगा?
दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगलों और प्राचीन पत्थरों के बीच एक ऐसी लड़ाई छिड़ी हुई है जो जितनी ज़मीन की है,…
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अरावली बचाओ: जब कानून बुलडोजर से ज़्यादा मज़बूत होंगे?
दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, अरावली, आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है।…
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भीड़तंत्र का शिकार: दीपू चंद्र दास की हत्या और समाज का गिरता स्तर
मयमनसिंह, बांग्लादेश से आई एक खबर ने न केवल उस देश को, बल्कि पूरी दुनिया को दहला दिया है। दीपू…
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