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लोकतंत्र की कसौटी: जब मतदाता सूची से गायब होते हैं करोड़ों नाम

उत्तर प्रदेश: देश की राजनीतिक दिशा का केंद्र

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव को एक उत्सव माना जाता है। लेकिन इस उत्सव की पहली शर्त है मतदाता सूची (Electoral Roll)। हाल ही में उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के ‘विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision) के दौरान 2.89 करोड़ नामों का हटना केवल एक प्रशासनिक सफाई नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी परीक्षा है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत एक आम नागरिक का वोट है। लेकिन उस वोट की ताकत तब तक शून्य है, जब तक मतदाता का नाम सरकारी सूची में दर्ज न हो। जब हम कहते हैं कि “लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है”, तो वह “जनता” असल में उसी मतदाता सूची से पहचानी जाती है। 2.89 करोड़ नाम हटने का मतलब है कि करोड़ों संभावित आवाजों का खामोश हो जाना। क्या ये सभी नाम वाकई ‘फर्जी’ थे, या इस प्रक्रिया में कहीं न कहीं असली मतदाता भी पीछे छूट गए? यह एक ऐसा सवाल है जो हर नागरिक के मन में है।

उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य नहीं है, यह भारतीय राजनीति का हृदय स्थल है। यहाँ की मतदाता सूची में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव सीधे तौर पर देश की सत्ता और समीकरणों को प्रभावित करता है। यूपी में रोल रिवीजन का दांव बहुत ऊँचा है। यदि यहाँ मतदाता सूची में गड़बड़ी होती है, तो उसका असर केवल स्थानीय निकायों पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र की साख पर पड़ता है।

किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव आयोग (EC) को एक निष्पक्ष अंपायर की तरह देखा जाता है। जब इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाते हैं, तो चुनाव आयोग की पारदर्शिता ‘कटघरे’ में आ जाती है। मतदाता सूची को साफ करना (Cleanup) जरूरी है ताकि फर्जी वोटिंग न हो। लेकिन इस ‘सफाई’ और ‘अधिकार छीनने’ (Disenfranchisement) के बीच एक बहुत पतली लकीर होती है। आयोग को यह साबित करना होगा कि नाम हटाने की प्रक्रिया में किसी भी वर्ग, समुदाय या विचारधारा के साथ भेदभाव नहीं हुआ है।

इतने बड़े पैमाने पर नाम हटने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन मुख्य चिंता जवाबदेही की है। अक्सर सॉफ्टवेयर के जरिए ‘डुप्लीकेट’ नाम हटाते समय एक ही नाम के दो अलग व्यक्तियों के नाम भी कट जाते हैं। क्या बीएलओ (BLO) ने घर-घर जाकर सही सत्यापन किया? कई बार मतदाताओं को पता ही नहीं चलता कि उनका नाम सूची से बाहर हो गया है, और उन्हें यह जानकारी पोलिंग बूथ पर जाकर मिलती है। यह स्थिति किसी भी नागरिक के लिए अपमानजनक है।

यह एक संवैधानिक सवाल है। विशेष पुनरीक्षण के नाम पर जो जोखिम उठाए जा रहे हैं, उनके लिए पर्याप्त ‘सेफगार्ड्स’ (सुरक्षा उपाय) होने चाहिए। कानूनन, किसी का नाम हटाने से पहले उसे नोटिस देना और सुनवाई का मौका देना अनिवार्य है। यदि करोड़ों लोगों के नाम हटाए गए हैं, तो क्या इस कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ? प्रक्रिया की ‘पवित्रता’ (Purity) जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी ‘पद्धति’ (Process) भी है। अगर प्रक्रिया दोषपूर्ण है, तो परिणाम कभी भी न्यायपूर्ण नहीं हो सकता।

वोट डालने से पहले नागरिक का सिस्टम पर भरोसा होना जरूरी है। यदि मतदाता को यह डर सताने लगे कि उसका नाम ‘साजिश’ के तहत हटाया गया है, तो वह चुनाव प्रक्रिया से ही कटने लगता है। समावेशी लोकतंत्र (Inclusive Democracy) का मतलब है कि हर पात्र नागरिक का नाम सूची में हो, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि से आता हो। सूची को ‘शुद्ध’ करने की कीमत ‘समावेशिता’ को खोकर नहीं चुकानी चाहिए।

अंत में, हमें यह समझना होगा कि अंतिम मतदाता सूची केवल एक लिस्ट नहीं है, बल्कि यह तय करेगी कि हमारा आने वाला कल कैसा होगा। हर वह नाम जो बिना ठोस कारण के हटाया गया है, वह हमारे लोकतंत्र की सेहत पर एक चोट है। प्रशासन को चाहिए कि वह हटाए गए नामों की सूची सार्वजनिक करे और सुधार का पर्याप्त मौका दे। तकनीकी गलतियों को तुरंत सुधारे। जनता के बीच विश्वास पैदा करने के लिए जागरूकता अभियान चलाए।

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