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अरावली बचाओ: जब कानून बुलडोजर से ज़्यादा मज़बूत होंगे?

किनारे पर खड़ी अरावली: यह सिर्फ पेड़ों की नहीं, जन स्वास्थ्य की बात है

दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, अरावली, आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक फैली यह पर्वतमाला केवल पत्थरों और झाड़ियों का ढेर नहीं है। यह उत्तर भारत के लिए एक सुरक्षा कवच है। यह थार मरुस्थल की तपती रेत को दिल्ली-NCR की ओर बढ़ने से रोकती है, यह मानसून की हवाओं को थामकर बारिश लाती है, और यह करोड़ों लोगों को सांस लेने के लिए साफ हवा देती है।

लेकिन आज अरावली लहूलुहान है। विकास के नाम पर पहाड़ियों को समतल किया जा रहा है, अवैध खनन ने ज़मीन के सीने में गहरे ज़ख्म कर दिए हैं, और आलीशान फार्महाउसों ने वन्यजीवों के रास्तों को ब्लॉक कर दिया है। सवाल यह है कि क्या हमारी नीतियां और कानून इन विनाशकारी बुलडोजरों से मज़बूत हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार अरावली में निर्माण और खनन पर रोक लगाई है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। अरावली को बचाने के लिए कई नियम हैं, जैसे ‘वन संरक्षण अधिनियम’ और ‘अरावली अधिसूचना (1992)’। लेकिन इन कानूनों में ऐसी कई कमियां (Loopholes) छोड़ी गई हैं जिनका फायदा बिल्डर और खनन माफिया उठाते हैं। उदाहरण के लिए, हरियाणा के कई हिस्सों में अरावली की ज़मीन को ‘गैर-मुमकिन पहाड़’ या ‘बंजर’ बताकर उसे वन क्षेत्र की परिभाषा से बाहर रखने की कोशिश की गई है। जब कानून की परिभाषा ही अस्पष्ट हो, तो बुलडोजर अपना रास्ता खुद बना लेते हैं।

अरावली का पत्थर निर्माण उद्योग के लिए ‘सफेद सोना’ है। सैटेलाइट इमेज बताती हैं कि अरावली की कई पहाड़ियाँ पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। यह केवल चोरी नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों के संसाधनों की डकैती है। प्रशासन की नाक के नीचे रात के अंधेरे में पहाड़ तोड़े जाते हैं, और अक्सर राजनेताओं, पुलिस और माफिया के बीच का गठबंधन इन बुलडोजरों को मज़बूती देता है।

अक्सर पर्यावरण की चर्चा को केवल ‘पेड़ों और जानवरों’ तक सीमित मान लिया जाता है, लेकिन अरावली का मामला सीधे तौर पर इंसान की ज़िंदगी और मौत से जुड़ा है। दिल्ली-NCR दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में से एक है। अरावली का हरा-भरा जंगल धूल के कणों को सोखता है और ताजी ऑक्सीजन छोड़ता है। यदि अरावली खत्म हो गई, तो रेगिस्तानी धूल सीधे शहरों में घुसेगी और हवा इतनी ज़हरीली हो जाएगी कि सांस लेना नामुमकिन होगा। अरावली को बचाना दरअसल अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियों से बचना है।

अरावली उत्तर भारत का सबसे बड़ा ‘वॉटर रिचार्ज ज़ोन’ है। इसके पहाड़ और दरारें बारिश के पानी को ज़मीन के अंदर सोखती हैं, जिससे भूजल (Groundwater) स्तर बना रहता है। फरीदाबाद, गुरुग्राम और दिल्ली का जलस्तर पहले ही रसातल में जा चुका है। अरावली की पहाड़ियों को काटकर कंक्रीट के जंगल बनाने का मतलब है करोड़ों लोगों को प्यासा मारना। अरावली नहीं तो पानी नहीं।

बढ़ती गर्मी और ‘हीट वेव’ आज एक बड़ा खतरा है। अरावली के जंगल स्थानीय तापमान को 2 से 3 डिग्री तक कम रखने में मदद करते हैं। पहाड़ियों के गायब होने और कंक्रीट के बढ़ने से हमारे शहर ‘भट्टियों’ में तब्दील हो रहे हैं। यह अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि एक ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी’ है।

अरावली तेंदुओं, लकड़बग्घों, नीलगायों और सैकड़ों पक्षियों का घर है। जब हम अरावली को काटते हैं, तो जंगली जानवर शहरों और बस्तियों की ओर रुख करते हैं। हाल के वर्षों में गुरुग्राम और फरीदाबाद की सड़कों पर तेंदुओं के दिखने की घटनाएं बढ़ी हैं। यह उनके द्वारा हमला नहीं है, बल्कि यह हमारे द्वारा उनके घर पर किए गए हमले का परिणाम है। अरावली राजस्थान के सरिस्का से लेकर दिल्ली की रिज तक एक गलियारा (Corridor) बनाती है। यदि बीच में बड़े निर्माण या चौड़ी सड़कें बनाई गईं, तो यह गलियारा टूट जाएगा और जैव विविधता का अंत हो जाएगा।

हमारी सरकारों ने ‘विकास’ को केवल ऊंची इमारतों, एक्सप्रेस-वे और चमकते शहरों के चश्मे से देखा है। NCR की ज़मीन सोने से भी महंगी है। बिल्डरों का दबाव इतना अधिक है कि मास्टर प्लान में अक्सर अरावली की ज़मीन को ‘कमर्शियल’ या ‘रे रेजिडेंशियल’ ज़ोन में बदल दिया जाता है। अरावली को ‘ग्रीन ज़ोन’ के बजाय ‘गोल्डन ज़ोन’ समझा जा रहा है। अवैध खनन या निर्माण करने वालों पर जुर्माना इतना कम है कि वे इसे अपने व्यापार की लागत (Cost of doing business) मान लेते हैं। जब तक अपराधियों को जेल नहीं होगी और उनकी संपत्तियां कुर्क नहीं होंगी, तब तक बुलडोजर नहीं रुकेंगे।

अरावली अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, उसे वापस लौटाया जा सकता है। अरावली की हर इंच ज़मीन का डिजिटल सीमांकन (Digital Mapping) होना चाहिए। ‘वन’ की परिभाषा को स्पष्ट किया जाए ताकि कोई भी ज़मीन का टुकड़ा बिल्डर के हाथों न चढ़े। अरावली के लिए एक विशेष ‘टास्क फोर्स’ बनाई जाए जिसके पास अवैध खनन को मौके पर रोकने और गिरफ्तारी के अधिकार हों। बुलडोजर माफिया के नहीं, प्रशासन के चलने चाहिए अवैध निर्माणों को ढहाने के लिए।

केवल पेड़ों को बचाना काफी नहीं है, जहां पहाड़ तोड़े गए हैं वहां ‘मियावाकी’ पद्धति या स्थानीय प्रजातियों के साथ सघन वनीकरण करना होगा। अरावली को बचाना एक जन आंदोलन बनना चाहिए। जब तक नागरिक इसे अपने स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य से जोड़कर नहीं देखेंगे, तब तक सरकारों पर दबाव नहीं बनेगा।

अरावली पिछले ढाई अरब सालों से खड़ी है। इसने सभ्यताओं को बनते और बिगड़ते देखा है। आज यह हमारे लालच के कारण दम तोड़ रही है। हमें यह समझना होगा कि हम पत्थरों और कंक्रीट को खाकर या पीकर जीवित नहीं रह सकते। अरावली का विनाश केवल एक भौगोलिक क्षति नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की पूरी जीवनशैली और जन स्वास्थ्य पर एक घातक प्रहार है।

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