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स्वतंत्रता दिवस पर मानवीय अपील: “हमारे मछुआरों को वापस लाएं”
14 और 15 अगस्त को रिहाई के लिए भारत-पाकिस्तान सरकार से गुहार

भारत और पाकिस्तान अगले सप्ताह क्रमशः 15 अगस्त और 14 अगस्त को अपने-अपने स्वतंत्रता दिवस के जश्न की तैयारियां कर रहे हैं। इस ऐतिहासिक अवसर से ठीक पहले, दोनों देशों की जेलों में बंद निर्दोष मछुआरों के परिवारों, किसान-मछुआरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले नागरिक संगठनों और शांति कार्यकर्ताओं ने एक स्वर में दोनों सरकारों से भावुक मानवीय अपील की है।
शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को अहमदाबाद में आयोजित एक संयुक्त पत्रकार वार्ता में विभिन्न नागरिक मंचों के प्रतिनिधियों और पाकिस्तानी जेलों में कैद भारतीय मछुआरों की रोती-बिलखती माताओं, पत्नियों व बहनों ने भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से गुहार लगाई कि वे स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर का उपयोग एक “मानवीय पहल” (Humanitarian Gesture) के रूप में करें। संगठनों ने विशेष रूप से उन मछुआरों की तत्काल बिना शर्त रिहाई और स्वदेश वापसी की मांग की है, जो अदालत द्वारा तय की गई अपनी सजा की अवधि पहले ही पूरी कर चुके हैं।
अहमदाबाद में आयोजित इस प्रेस वार्ता को भारत और पाकिस्तान के प्रमुख मछुआरा कल्याण संगठनों और शांति कार्यकर्ताओं ने संयुक्त रूप से संबोधित किया नेशनल फिशवर्कर्स फोरम (National Fishworkers Forum – NFF); समस्त मच्छीमार परिवार (Samast Machhimar Parivar); पाकिस्तान-इंडिया पीपुल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी (PIPFPD); पाकिस्तान फिशरफोक फोरम (Pakistan Fisherfolk Forum – PFF) पत्रकार वार्ता में गुजरात के तटीय जिलों सोगनाथ (वेरावल), पोरबंदर, ऊना और केंद्र शासित प्रदेश दीव से आईं उन पीड़ित परिवारों की महिलाओं ने अपना दर्द साझा किया, जिनके घर के इकलौते कमाने वाले पुरुष सदस्य वर्षों से सीमाओं के पार जेलों में बंद हैं।
पत्रकार वार्ता में मौजूद परिवारों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि उनके संबंधी कोई अपराधी या जासूस नहीं हैं, बल्कि वे अपनी आजीविका के लिए अरब सागर में उतरे गरीब और निरक्षर मछुआरे हैं।
“मेरा 22 साल का बेटा मयूर और मेरे दो भाई (कमलेश और मुकेश चावड़ा) साल 2020 से पाकिस्तान की मलीर (कराची) जेल में बंद हैं। हमारे गांव के 10 लोग वहाँ कैद हैं। अदालत ने उन्हें 1 साल की सजा सुनाई थी, जो सालों पहले खत्म हो चुकी है। वे 5 साल से ज्यादा समय से अवैध रूप से जेल में सड़ रहे हैं। वे समुद्र में पेट पालने गए थे, जासूसी करने नहीं। हमने केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और गुजरात सरकार से कई बार गुहार लगाई है। इस 15 अगस्त पर हमें हमारा बेटा वापस चाहिए।”
“मेरे पति महेश पिछले 6 साल से पाकिस्तान की जेल में बंद हैं। घर में दो छोटे बच्चे और बीमार ससुर हैं। घर में कमाने वाला कोई नहीं है। मैं दूसरों के घरों में काम करके किसी तरह बच्चों का पेट पाल रही हूँ। सरकारों की दुश्मनी की सजा गरीब परिवारों के बच्चे क्यों भुगतें?”
पीपुल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी (PIPFPD) से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और शांति कार्यकर्ता जतिन देसाई (Jatin Desai) ने कानूनी पहलुओं को रेखांकित करते हुए दोनों देशों के प्रशासनिक रवैये पर सवाल उठाए
भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 2008 में हुए द्विपक्षीय ‘कॉन्सुलर एक्सेस एग्रीमेंट’ (Consular Access Agreement) के तहत यह स्पष्ट प्रावधान है कि जिस कैदी की राष्ट्रीयता सत्यापित हो जाती है और जो अदालत द्वारा दी गई अपनी सजा पूरी कर लेता है, उसे सजा पूरी होने के 1 महीने के भीतर उसके देश वापस भेजा जाना अनिवार्य है। परंतु 178 भारतीय मछुआरे अपनी सजा खत्म होने के बाद भी सालों से जेल में हैं, जो इस अंतर्राष्ट्रीय द्विपक्षीय संधि का सीधा उल्लंघन है।
दोनों देशों के सेवानिवृत्त जजों को मिलाकर बनी ‘संयुक्त न्यायिक समिति’ की आखिरी बैठक वर्ष 2013 में हुई थी। पिछले 13 वर्षों से यह समिति पूरी तरह निष्क्रिय है। नागरिक संगठनों ने मांग की कि दोनों देश इस न्यायिक समिति को तुरंत बहाल करें ताकि वे समय-समय पर जेलों का दौरा करके मछुआरों की मानवीय स्थिति का जायजा ले सकें। महामारी के दौर से ही बंदियों और उनके परिवारों के बीच होने वाला डाक पत्राचार बंद पड़ा है, जिससे परिवारों को यह भी नहीं पता चल पाता कि उनके परिजन जेल में जीवित और स्वस्थ हैं या नहीं।
दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भेजे गए संयुक्त ज्ञापन में निम्नलिखित प्रमुख मांगें रखी गई हैं स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन सभी 178 भारतीय और सजा पूरी कर चुके पाकिस्तानी मछुआरों को तुरंत रिहा कर स्वदेश भेजा जाए।
समुद्र में स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा (IMBL) न होने और जीपीएस (GPS) या तकनीक के अभाव में मछुआरे गलती से सीमा पार कर जाते हैं। अतः सीमा पार करने पर सीधे गिरफ्तार कर जेल भेजने के बजाय उन्हें चेतावनी देकर या नौसेना/कोस्ट गार्ड द्वारा खदेड़कर वापस भेजने की ‘नो-अरेस्ट’ नीति अपनाई जाए।
गुजरात और महाराष्ट्र सरकार द्वारा जेल में बंद मछुआरों के आश्रित परिवारों को दी जाने वाली दैनिक वित्तीय सहायता राशि को ₹300 से बढ़ाकर ₹500 प्रति दिन किया जाए ताकि परिवार भुखमरी से बच सकें। रिहाई के साथ-साथ कोस्ट गार्ड द्वारा जब्त की गई करोड़ों रुपये मूल्य की मछली पकड़ने वाली नौकाओं (Boats) को भी नीलाम या नष्ट करने के बजाय उनके स्वामियों को वापस लौटाया जाए।
14 और 15 अगस्त का दिन दोनों देशों के लिए अपनी-अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता के जश्न का दिन है। ऐसे समय में सीमाओं के दोनों ओर जेलों में बंद निर्दोष मछुआरों और उनके बिलखते परिवारों के लिए वास्तविक स्वतंत्रता तभी होगी जब वे अपने घरों में अपनों से गले मिल सकें।
नागरिक संगठनों की यह पहल दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व को यह याद दिलाती है कि कूटनीतिक तनावों और राजनीतिक मतभेदों के बीच भी ‘मानवीय संवेदनाओं’ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस स्वतंत्रता दिवस पर नई दिल्ली और इस्लामाबाद से एक सकारात्मक और मानवीय संदेश आएगा और सैकड़ों परिवार सालों के इंतजार के बाद पुनः एक हो सकेंगे।



