
उत्तर भारत में सर्दियों का आना कभी गुलाबी ठंड और गुनगुनी धूप का अहसास कराता था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। आज ‘सर्दियां’ आते ही हमारे जेहन में कोहरे की घनी चादर, रें7गती गाड़ियां, रद्द होती उड़ानें और कंपकपाते फुटपाथों की तस्वीरें उभरने लगती हैं। सवाल यह है कि क्या हम इस मौसम का आनंद ले रहे हैं, या बस किसी तरह इसके ‘Hostile’ यानी शत्रुतापूर्ण व्यवहार से बचने की कोशिश कर रहे हैं?
“Zero Visibility, Zero Margin for Error”
कोहरे की घनी चादर जब शहरों को अपनी आगोश में लेती है, तो वह केवल देखने में खूबसूरत लगती है, लेकिन सड़कों पर वह ‘मौत का जाल’ बन जाती है। ‘जीरो विजिबिलिटी’ का मतलब है कि आपके पास गलती की कोई गुंजाइश नहीं है। हाईवे पर गाड़ियों का एक-दूसरे से टकराना अब हर साल की कहानी बन चुकी है। यह कोहरा सिर्फ कुदरत का खेल नहीं है। जब कड़ाके की ठंड प्रदूषण (Smog) के साथ मिलती है, तो यह एक जहरीला और जानलेवा मिश्रण बना देती है। धुंध की इस परत के पीछे छिपे गड्ढे, सड़कों पर बिना लाइट के खड़े ट्रक और दिशा-निर्देशों की कमी—ये सब मिलकर आम आदमी के सफर को एक जुआ बना देते हैं।
शीत लहर (Cold Wave) सिर्फ हड्डियों को नहीं कंपाती, यह हमारी अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य को भी पंगु बना देती है। भारत में गर्मी से होने वाली मौतों पर तो बहुत चर्चा होती है, लेकिन ‘हाइपोथर्मिया’ और ठंड से होने वाली मौतों के आंकड़े अक्सर दब कर रह जाते हैं। दिल के दौरे (Heart Attacks) और सांस की बीमारियों के मामले इन महीनों में अचानक बढ़ जाते हैं। लोग आज भी खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं। रैन बसेरों की कमी या उनकी बदहाली इस ‘सभ्य समाज’ पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
हर साल नवंबर आते ही प्रशासन दावा करता है कि “तैयारियां पूरी हैं,” लेकिन पहली ही घनी धुंध इन दावों की पोल खोल देती है। हमारी विफलता के मुख्य बिंदु दिल्ली जैसे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कैट-III (CAT-III) लैंडिंग सिस्टम होने के बावजूद सैकड़ों उड़ानें रद्द या देरी से होती हैं। यह केवल तकनीक की नहीं, बल्कि प्रबंधन की भी विहार है।
एक्सप्रेसवे पर कोहरे के दौरान गति सीमा लागू करने और उसे मॉनिटर करने की कोई ठोस व्यवस्था आज भी गायब है। हीटिंग उपकरणों की वजह से बिजली की मांग बढ़ती है, जिससे कई इलाकों में ग्रिड फेल होने या लंबे पावर कट की नौबत आ जाती है।
हैरानी की बात यह है कि सर्दी कोई ‘अचानक’ आने वाली आपदा नहीं है। यह हर साल कैलेंडर के हिसाब से आती है। फिर भी, हमारा सिस्टम इसे किसी ‘आकस्मिक संकट’ की तरह क्यों लेता है?
उड़ानों और ट्रेनों की देरी से न केवल यात्रियों को परेशानी होती है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी करोड़ों का नुकसान होता है। सप्लाई चेन टूटने से सब्जियों और जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ जाती हैं। हमारे शहरों का बुनियादी ढांचा मुख्य रूप से गर्मी को ध्यान में रखकर बनाया गया है। सर्दी से निपटने के लिए न तो इमारतों में इंसुलेशन की व्यवस्था है और न ही सार्वजनिक स्थानों पर पर्याप्त हीटिंग की।
कोहरे से परे देखने की जरूरत
अगर हम वाकई चाहते हैं कि अगली सर्दी कम जानलेवा हो, तो हमें इन कदमों पर काम करना होगा कोहरे के दौरान ऑटोमैटिक सिग्नलिंग और थर्मल कैमरों का उपयोग हाईवे पर अनिवार्य होना चाहिए। रैन बसेरों को केवल एक ‘हॉल’ नहीं, बल्कि रहने लायक जगह बनाना होगा जहाँ गर्म पानी और प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध हो। मौसम विभाग (IMD) की चेतावनियों को जिला स्तर पर सक्रियता से लागू करना होगा, ताकि स्कूलों की छुट्टियां या ट्रैफिक डायवर्जन समय पर हो सके।
एक मानवीय दृष्टिकोण की दरकार
सर्दियां हमें याद दिलाती हैं कि प्रकृति के सामने हम कितने छोटे हैं। लेकिन वे यह भी याद दिलाती हैं कि एक समाज के रूप में हम कितने संवेदनहीन हो गए हैं। जब तक हम सर्दी को केवल ‘छुट्टियों का मौसम’ मानते रहेंगे और उन लोगों को भूल जाएंगे जो ठिठुर कर दम तोड़ देते हैं, तब तक हमारी तैयारी कभी पूरी नहीं होगी। “शीत लहर” से लड़ने के लिए सिर्फ कंबल बांटना काफी नहीं है, हमें एक ऐसा ‘विंटर प्रोटोकॉल’ चाहिए जो हवाई अड्डे से लेकर अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक, सबकी सुरक्षा सुनिश्चित करे।



