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डिजिटल युग में सुगमता: सुगम्य भारत ऐप

बदलाव का मानवीय पक्ष

तकनीकी प्रगति का असली अर्थ तभी पूरा होता है जब वह हर नागरिक के जीवन में एक समान अवसर और सम्मान का पुल बनाए। आज का भारत ‘डिजिटल इंडिया’ बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इस सफ़र का सबसे अहम आयाम लंबे समय से अधूरा था। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा “सुगम्य भारत ऐप (Sugamya Bharat App)” को नए रूप में लॉन्च किया गया है। यह केवल एक मोबाइल एप्लिकेशन नहीं, बल्कि ‘अभिगम्यता की आज़ादी’ की दिशा में एक ठोस कदम है।​

2021 में सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign) के हिस्से के रूप में शुरू यह ऐप दिव्यांगजन और वरिष्ठ नागरिकों को सार्वजनिक स्थलों की बाधाओं की रिपोर्टिंग और उन्हें दूर करने की सुविधा देता था। अब 2025 में इसका नया संस्करण पहले से कहीं अधिक सहज, सक्षम और संवेदनशील बना है।

इस बार ऐप का मकसद सिर्फ शिकायत दर्ज करना नहीं, बल्कि डिजिटल जगत में बराबरी का माहौल बनाना है। इसका नया रूप तकनीक और सहानुभूति के मेल से तैयार किया गया है, ताकि हर व्यक्ति चाहे वह दृष्टिबाधित हो, श्रवण बाधित, या किसी भी प्रकार से दिव्यांग डिजिटल दुनिया का सक्रिय और आत्मनिर्भर हिस्सा बन सके।​

ऐप को ‘ऍक्सेसिबिलिटी–फर्स्ट’ दृष्टिकोण से डिज़ाइन किया गया है। स्क्रीन रीडर, वॉइस नेविगेशन और कलर–कॉन्ट्रास्ट जैसे विकल्पों से इस प्लेटफॉर्म पर हर व्यक्ति सुगमता से नेविगेट कर सकता है। एक बुद्धिमान चैटबॉट हर उपयोगकर्ता को तत्काल मार्गदर्शन देता है चाहे वह किसी योजना की जानकारी मांगना हो या शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया समझानी हो। कोई भी यूज़र सार्वजनिक स्थल पर बाधा महसूस करे तो उसकी फोटो और लोकेशन सीधे अपलोड कर सकता है अधिकारियों तक यह जानकारी मिनटों में पहुँचती है।

दिव्यांगजन को अलग–अलग वेबसाइटों या दफ्तरों की जरूरत नहीं, सभी सरकारी व निजी नौकरी, शिक्षा अवसर और योजनाएं एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं। ऐप का सबसे अहम फीचर उपयोगकर्ता अब सार्वजनिक स्थानों को रेट कर सकते हैं कहाँ व्हीलचेयर की व्यवस्था है, कौन सी इमारत असुविधाजनक है ये सभी आंकड़े सामुदायिक भागीदारी से तैयार हो रहे हैं। देश की विविधता को ध्यान में रखते हुए यह ऐप 20 से अधिक भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है, ताकि हर प्रदेश का नागरिक इसे अपने मातृभाषाई सहजता से इस्तेमाल कर सके।​

इस ऐप का असली मूल्य इसकी तकनीक नहीं, यह दृष्टिकोण है जो इससे झलकता है। पहली बार किसी डिजिटल माध्यम ने दिव्यांग व्यक्ति को “शिकायतकर्ता” नहीं, बल्कि “परिवर्तन–निर्माता” की भूमिका दी है। अब कोई व्यक्ति किसी स्थान की अभिगम्यता की स्थिति दर्ज कर सकता है और वह जानकारी न केवल सरकार तक बल्कि बाकी समाज तक भी पहुंचती है।​

इस एप्लिकेशन को विकसित करने में सरकारी विभागों के साथ कई संस्थानों का साझा योगदान रहा SBI फाउंडेशन, NAB दिल्ली, Mission Accessibility और ISTEM जैसी संस्थाएं इसमें सहयोगी हैं। यह साझेदारी दिखाती है कि जब सार्वजनिक, निजी और सामाजिक क्षेत्र अपनी विशेषज्ञता जोड़ते हैं, तो तकनीक केवल उपकरण नहीं रह जाती वह सामाजिक न्याय का साधन बन जाती है।

2025 तक इस ऐप को 83,000 से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है और 14,000 से ज्यादा उपयोगकर्ता जुड़ चुके हैं। अब तक लगभग 2,700 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 1,800 से अधिक का सफल समाधान किया जा चुका है। ये आंकड़े इस अभियान के केवल औपचारिक नहीं, बल्कि जीवित प्रभाव को दर्शाते हैं जहाँ डिजिटल भारत में दिव्यांगजन केवल दर्शक नहीं, सक्रिय प्रतिभागी बन चुके हैं।​

इस ऐप का भविष्य केवल प्रशासनिक उपयोग तक सीमित नहीं। कई विश्वविद्यालय और स्कूल अब इसे डिजिटल साक्षरता और सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रम में शामिल कर रहे हैं। विद्यार्थियों को सिखाया जा रहा है कि तकनीक का वास्तविक उपयोग केवल सुविधा नहीं, बल्कि समानता और संवेदना के लिए होना चाहिए। अगर हर नया डिज़ाइनर, प्रोग्रामर और उद्यमी इस सोच के साथ तकनीक बनाए कि “हर कोई इसका उपयोग कर सके”, तब भारत सच में डिजिटली समावेशी हो जाएगा।

हालाँकि इस ऐप ने उम्मीदों के नए द्वार खोले हैं, मगर अभी भी रास्ता आसान नहीं है। कई सरकारी और निजी वेबसाइटें अब भी वेब एक्सेसिबिलिटी गाइडलाइंस का पालन नहीं करतीं। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की अधूरी पहुँच दिव्यांगजनों की भागीदारी सीमित करती है। समाज की सोच में “विकलांगता को दया का विषय” मानने का दृष्टिकोण अब भी बदला नहीं है। अगर इन बाधाओं पर सामूहिक स्तर पर काम किया जाए, तो सुगम्य भारत केवल ऐप नहीं, राष्ट्रीय संस्कृति बन सकता है।

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