
नेपाल के युवाओं द्वारा सोशल मीडिया बैन के खिलाफ छेड़े गए हालिया आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी की ओर खींचा है। जब सरकार ने पिछले हफ्ते फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, X समेत 26 बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बिना स्थानीय पंजीकरण के प्रतिबंधित किया, तब सबसे ज़्यादा चोट वहां की पीढ़ी Gen Z को लगी।
सरकार ने तर्क दिया कि ये कदम “जनहित”, सोशल मीडिया पर गलत जानकारी, घृणा भाषण और साइबर अपराध रोकने के लिए उठाए गए हैं। प्लेटफॉर्म्स को नेपाल में ऑफिस, शिकायत व संपर्क अधिकारी नियुक्त करने के लिए एक सप्ताह का समय पहले दिया गया था, लेकिन ज्यादातर कंपनियों ने पालन नहीं किया। नतीजा देशभर के सबसे लोकप्रिय संचार व संवाद मंच कुछ घंटों में ऑफलाइन हो गए। युवाओं के लिए सोशल बल्कि व्यावसायिक, रचनात्मक, घरेलू और विश्व से जुड़ा रहना ये सब एक ही झटके में बंद हो गया।
8 सितंबर को हजारों युवा, अधिकतर छात्र, स्टार्टअप प्रोफेशनल और छोटे कारोबारी, संसद भवन के बाहर इकट्ठा हुए हाथों में पोस्टर थे “सेंसरशिप बंद करो”, “करप्शन हटाओ, सोशल मीडिया नहीं”। जैसे-जैसे भीड़ बढ़ी, पुलिस ने रोकने के लिए वॉटर कैनन, आंसू गैस और अंत में गोली चलाई। घटनाक्रम में कम-से-कम 14 – 17 मौतें और 100 से अधिक लोग घायल हुए। कई अस्पतालों में हालात बेकाबू रहे। कर्फ्यू, इंटरनेट बंदी और सांसद भवन के चारों ओर सुरक्षा के व्यापक प्रबंध भी सार्वजनिक आक्रोश को नहीं रोक सके।
प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया ये लड़ाई “डिजिटल अधिकार” के साथ-साथ भ्रष्टाचार, नौकरशाही और युवा उम्मीदों के दमन के खिलाफ है। करीब 90% आबादी इंटरनेट यूज़र है और देश के लाखों परिवार पलायन कर विदेश में कार्यरत हैं, जिनकी संचार लाइफलाइन सोशल मीडिया ही थी। बैन ने न सिर्फ अभिव्यक्ति, बल्कि रोज़मर्रा के रिश्ते, शिक्षा, रोजगार और आर्थिक गतिविधियां भी बाधित कर दीं।
मानवाधिकार संगठनों और कई राजनैतिक विशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम को असंवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करार दिया है। सरकार की दलील है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्ती ज़रूरी थी, लेकिन जनाक्रोश और मौतों ने पूरी नीति की नैतिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह उबाल टेम्पररी नहीं है युवा आंदोलनकारी सरकारी संवाद, अधिक पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की पैरवी कर रहे हैं। कई प्लेटफॉर्म अब पंजीकरण प्रक्रिया में लगे हैं, लेकिन सवाल वही है क्या इंटरनेट पर पाबंदी और बलप्रयोग लोकतांत्रिक समाज को स्थायी दिशा दे सकते हैं?
नेपाल में सोशल मीडिया बैन के खिलाफ युवा जनांदोलन केवल संवाद का हक, भविष्य और अधिकारों का संघर्ष नहीं, लोकतंत्र की ऊर्जा का प्रतीक बन गया है। जब नई पीढ़ी सवाल पूछती है, तब तंत्र को जवाबदेह और संवेदनशील होना ही पड़ता है।



