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Gen Z का मौन विद्रोह: संस्थाओं पर संकट, इन्फ्लुएंसर्स पर भरोसा क्यों?

सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर्स का उभार

आज के युवा विशेषकर जेनरेशन Z इतने शांत क्यों हैं, पर भीतर ही भीतर इतना असंतोष क्यों पनप रहा है? आखिर क्या वजह है कि वे सरकारों, स्कूलों, मीडिया या पुरानी संस्थाओं के बजाय, अब सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और ऑनलाइन समुदायों में ज्यादा भरोसा ढूंढते हैं? यह विद्रोह कैसी मानसिकता और हालात से निकला है, इसे समझना बेहद ज़रूरी है।

बीते दशक में युवाओं ने एक के बाद एक, संस्थाओं, नीतियों और बड़े-बड़े वादों का सच अपनी आँखों के सामने बिखरते देखा। भ्रष्टाचार, पक्षपात, रोजगार का संकट, शिक्षा में पुरानी सोच, राजनीतिक अराजकता इन सबने उनकी उम्मीदों को टूटने पर मजबूर कर दिया। उनसे बार-बार “इंतजार” या “समझौता” मांगा गया, लेकिन नतीजा वही रहा कुछ नहीं बदला। नतीजतन, युवा अब शक की नज़र से हर परंपरागत प्रणाली को देखने लगे हैं और भरोसे के लिए नए विकल्प खोज रहे हैं।

सोशल मीडिया ने युवाओं के लिए संवाद और पहचान का नया प्लेटफार्म तैयार किया। यहां न कोई औपचारिकता है, न ही किसी सत्ता की दहशत। यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर जैसे मंचों पर वे अपने पसंदीदा इन्फ्लुएंसर्स को अपनी समस्याएँ, भावनाएँ व विचार निडरता से सुनाते भी हैं और सलाह, मार्गदर्शन व प्रेरणा भी पाते हैं। इन इन्फ्लुएंसर्स की बातें, ठहाके, विफलताएं, परिश्रम या सामाजिक-राजनीतिक सोच उन्हें सच्ची लगती हैं क्योंकि वहाँ ‘दिखावा’ या झूठा आदर्श नहीं, बल्कि असली जीवन है।

ऐसी जगहें एक आभासी “सेफ स्पेस” बन जाती हैं, जहां युवा अपने मन की बात खुलकर कह सकते हैं और दूसरों के अनुभवों से सीख सकते हैं। पुराने संस्थानों से जहां ईमानदार संवाद और समानुभूति अक्सर गायब हो जाती है, वहीं डिजिटल स्पेस में हर किसी के संघर्ष और सफलता का अपना मूल्य और स्थान मिलता है।

हाल के नेपाल और श्रीलंका जैसे आंदोलनों से यह भी स्पष्ट है कि यह मन की क्रांति सिर्फ भारत में नहीं, पूरे दक्षिण एशियाई समाज में लहर बन रही है। जहां भी बेरोजगारी, नीतिगत असफलता या सरकारी सेंसरशिप बढ़ी, वहां युवाओं ने या तो जवाबी आंदोलन किए या फिर डिजिटल तरीकों से अपने विचारों व हक की आवाज़ बुलंद की। यहां वे किसी नेता के भाषण या घोषणा पत्र की जगह, ऑनलाइन समीक्षाओं, पर्सनल ब्लॉग्स और लाइव इंटरैक्शन को ज्यादा सच और भरोसेमंद मानते हैं।

ऐसा नहीं कि सभी संस्थाएं फेल हैं, पर वे जिस भाषा, रवैये और संवाद का इस्तेमाल करती हैं, वह युवाओं को अपना नहीं लगता। Gen Z चाहती है कि स्कूल, नीति, प्रसार या सामाजिक सेवाओं में पारदर्शिता, संवाद, गतिशीलता और सह-अनुभूति हो। वे प्रेरक नेतृत्व में “महानायक” नहीं, संघर्षरत, ईमानदार और आलोचना को स्वीकारने वाले “हमसफर” ढूंढते हैं। यही वजह है कि इन्फ्लुएंसर्स की बढती प्रभावशीलता के बावजूद, अगर संस्थाएं भी स्वीकार्यता, पारदर्शिता और संवाद स्वीकार करें तो वे फिर से भरोसा पा सकती हैं।

Gen Z की चुप्पी, पुराने ढांचों को तोड़ने का इशारा है एक नई सोच, ईमानदार संवाद और भरोसे की ओर लौटने का मांगपत्र भी। अगर समाज को टिकाऊ भविष्य चाहिए, तो उसे संस्थाओं और युवाओं के बीच डिजिटल और मानवीय पुल बनाना होगा। भरोसा, संवाद और सहभागिता से ही इसका हल निकल सकता है, नहीं तो सच्चाई अब स्क्रीन पर ही दिखती रहेगी।

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