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न्याय खतरे में: भारत में गवाहों की सुरक्षा की असली तस्वीर

लुधियाना की घटना और न्याय व्यवस्था की कमजोरी

लुधियाना शहर की अदालत में हत्या के मामले की सुनवाई के दौरान एक गवाह पर भीड़ हमला करती है, तो कोर्ट सिर्फ एक सबूत नहीं खोती, देश का पूरा न्यायतंत्र हिल जाता है। भारत में गवाह पर हमले, दबाव, धमकी और खरीद-फरोख्त की घटनाएं रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी हैं। हाल ही में दिल्ली में दोहरे हत्या कांड के गवाह की कार में गोली मारकर हत्या कर दी गई तीन साल में सैकड़ों ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें गवाह गंभीर धमकी, हिंसा या मौत का शिकार हुए। यही वजह है कि आज गवाह न्याय के सबसे कमजोर ‘कवच’ बन चुके हैं, और न्याय व्यवस्था ‘खतरे’ में है।

गवाहों की बुनियादी भूमिका मुकदमे में सच का आगे आना, अदालत को निष्पक्ष प्रमाण देना और न्याय प्रक्रिया को दिशा देना। सुप्रीम कोर्ट सहित सभी न्यायिक संस्थाएं मानती हैं कि गवाह बिना भय या लालच के अदालत में गवाही दें, तभी सच सामने आता है और अपराधी सजा पाते हैं। जब ऐसा नहीं होता, तो कानून का राज सिर्फ कागज पर रह जाता है।

गवाहों को डराना, धमकाना या खरीदना अब अपराधी गिरोह, राजनैतिक ताकत और यहां तक कि कई बार समाज की मिलीभगत से आसानी से हो जाता है। NCW के मुताबिक 2025 के शुरुआती महीनों में 989 से ज्यादा औपचारिक ‘क्रिमिनल इंटिमिडेशन’ की शिकायतें दर्ज हुईं। गवाहों पर हमला या धमकी केवल हाई-प्रोफाइल मामलों में नहीं, बलात्कार, घरेलू हिंसा, सामूहिक हत्या, जमीन विवाद और भ्रष्टाचार जैसे आम मामलों में भी रोज होती है।

गवाहों का डर तीसरे हाथ की धमकी से लेकर मोबाइल पर मैसेज, फोन कॉल, घर पर हमला, परिवार को धमकाने, या केस लौटाने की कूटनीतिक साजिशों तक जाता है। समाज कई बार अपराधी का पक्ष लेता है और गवाह को अलग-थलग कर देता है।

भारत में हत्या, बलात्कार, घोटाला जैसे गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि दर सिर्फ 40-55% तक रह गई है। अदालत की टिप्पणी है कि ‘गवाह पलट जाए तो मुकदमा दम तोड़ देता है’। लंबे समय तक ट्रायल, तारीख पे तारीख, पुलिस की कमजोर सुरक्षा और आरोपी के दबाव के कारण गवाह डर के मारे अपने बयान बदल देते हैं। जिससे अपराधी खुले घूमते हैं, और सिस्टम पर से आमजन का भरोसा उठ जाता है।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने Witness Protection Scheme लागू की जिसमें गवाह की पहचान बदलना, स्थानांतरण, सिक्योरिटी डिवाइस लगाना, केस दौरान विशेष कोर्टरूम, मनोवैज्ञानिक सहायता जैसी व्यवस्था होनी चाहिए थी। दिल्ली ने 2025 में नई स्कीम लागू की, जिसमें खतरे के स्तर के हिसाब से तीन श्रेणियाँ हैं सीधी हत्या की आशंका, उत्पीड़न या संपत्ति को नुकसान, और साधारण धमकी।

लेकिन सरकारी रिपोर्ट और कोर्ट की टिप्पणियों के अनुसार, इनमें से लगभग 80% मामलों में स्कीम लागू नहीं होती पुलिस कहती है। स्टाफ, बजट, मुकदमों की भीड़ कारण हर गवाह को सुरक्षा देना संभव नहीं है। असल में केंद्र या राज्य की कोई एकीकृत, मजबूत, गैर-राजनीतिक गवाह सुरक्षा एजेंसी है ही नहीं।

मॉब जस्टिस या “सामाजिक दबाव” कोर्ट के बाहर भी चलता है। आरोपी के समर्थकों की भीड़, पंचायत या गांव के दबंग, राजनीतिक शहसब गवाह को एकाकी बना देते हैं। ऐसे माहौल में गवाह न केस के लिए, न समाज के लिए खुद को सुरक्षित समझता है।

आईपीसी 195A के तहत गवाह को डराने या धमकाने पर 7 साल तक सजा का प्रावधान है; दिल्ली व सुप्रीम कोर्ट की स्कीमें भी हैं। मगर जमीनी स्तर पर न सुरक्षा लागू, न कंट्रोल रूम, न त्वरित कार्रवाई। न्यूनतम सजा, घिसी-पिटी पुलिस जांच, समाज में पहचान उजागर होने जैसे कारण मुकदमा कमजोर ही रहता है। महत्वपूर्ण मामलों में नाम छुपाकर के उपाय होते हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में गवाह को खुद ही बचना पड़ता है।

पुलिस व कानून-व्यवस्था का कहना है कि फंडिंग, स्टाफ, भौगोलिक-राजनीतिक जटिलता कारण हर गवाह को सुरक्षा देना असंभव है। उधर, कई गवाह दूरियां, फायदा, निजी झगड़े या रिश्वत के कारण भी पलट जाते हैं। अपराध नियंत्रण की प्राथमिकता, फारेंसिक कमी, धीमी प्रक्रिया जैसी चुनौतियाँ सरकारी पक्ष को मजबूर करती हैं।

भारत में न्याय की ताकत तब तक अधूरी है, जब तक गवाहों का डर ना मिटे। व्यवस्था को कड़े सुधार, आधुनिक रणनीति और सामाजिक सम्मान से गवाहों को सुरक्षित करना होगा। यह समय है जब देश गवाह की चीख-पुकार, दर्द और भय को सुन सके क्योंकि असली फैसला अदालत में नहीं, गवाह की सुरक्षा में होता है।

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